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दृश्य, श्रव्य व पाठ्य। यही माध्यम है एक दूसरे को भाषा, भाव तथा अर्थ संप्रेषण के। जिसे अंग्रेजी में मीडिया कहा जाता है और हिंदी में पत्रकारिता। मात्र बीते तीस वर्षो में यह पत्रकारिता जिस मुकाम पर पहुंच गई है उसके सुखद व दुखद दोनों पहलू और मजबूत होकर सामने है। उत्तर भारत में पत्रकारिता लगातार सवालों के घेरे में है। राजनीति उससे संचालित व्यवस्थाओं के साथ सामाजिक बदलाव के कारण पत्रकारिता एक अजीब से मोड पर आ खडी हुई है। कहीं पर यह उनके निशाने पर है जो इसे अपने अनुकूल चलाना चाहते है। कहीं पर इसलिए निशाने पर है कि कुछ लोग इसे अपने प्रतिकूल मानते है। कारण बहुत से हैं जिनका विश्लेषण शार्ट में नहीं किया जा सकता है लेकिन इस परिणाम पर पहुंचने पर कोई संशय नहीं है कि पिछले तीस वर्षो के मुकाबले पत्रकारिता को भ्रष्ट साबित किया जा रहा है। बहुधा लोग इस बात से मुतमइन है कि पत्रकारिता पहले की तरह अब नहीं रही। वे चाहते है कि पत्रकारिता पुराने ढर्रे पर चले तो ज्यादा अच्छा है इसका सीधा सा अर्थ हुआ कि पहले अच्छी थी अब खराब हो गई है। 1982 से पूरी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। हमारा यही रोजगार है। व्यवसाय है। शौक है और मजबूरी भी है। पूरी तरह बदलाव के दौर में पुरानी पत्रकारिता अब वापस नहीं आ सकती क्योंकि कभी समाचार पत्र व अन्य माध्यम तय करते थे कि अपने पाठक या दर्शक को क्या पढ़ाना या दिखाना है। अब समाज तय करता है कि उसे क्या पढ़ना या देखना है यानी पत्रकारिता का एजेंडा बाजार तय करता है। इसी बीच कुछ बेवकूफी की बातें भी होती रहती है जैसे कि पत्रकारिता बिक गई है। बदचलन हो गई है। मूल्यों से हट गई है। व्यवसायिक हो गई है आदि आदि। यह सच तो है लेकिन यही सच है कि व्यवसाय किए बिना पत्रकारिता हो ही नहीं सकती। जिस कंप्यूटर पर यह टाइप हो रहा है उसमें सबसे कम कीमत का कंप्यूटर 20 हजार रूपये का है। यह रूपया कौन इंवेस्ट करेगा। वही तो जिसके पास होगा। वह जब रूपया लगाएगा तो वापसी कहां से लाएगा। रोटी कहां से खाएगा। इसलिए बेवकूफी की बातें करना पहले तो समाज बंद करें। वस्तु स्थिति को समझे तब पत्रकारिता से उम्मीद करें। अब आते हैं अपनी बात पर।
रियल मीडिया नेटवर्क यानी वेबसाइट व रियल मीडिया डिजिटल यानी वीडियो सहित समाचार प्रसारण। यह दोनो काम इसके माध्यम से कर रहा हूं। बल्कि शुरू कर रहा हूं। मैं प्रिंट का पत्रकार हूं। फिर भी मेरे साथ डिजिटल की मास्टर टीम है। लागत की बात करें तो हमारे कुछ मित्रों ने अपने ईमान की गाढ़ी कमाई इसमें इंवेस्ट की है। हमने न तो चंदा, अनुदान, भीख, किसी की मेहरबानी ली है और न ही लेंगे। न किसी धनवान को अपना गाडफादर या संरक्षक टाइप नियुक्त किया है। हमारे साथ विशु़द्ध, खांटी पत्रकार ही है। आज चारों तरफ प्रिंट व डिजिटल की भारी भीड़ है। हम कभी भी भीड़ का हिस्सा न रहे है न रहेंगे। इसी भीड़ में से चुनिंदा लोग हमारा हिस्सा रहेंगे। एक स्लोगन आप लोग लगातार पढ़ते चले आ रहे है कि निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकारिता। यहां बता दें कि हम न निष्पक्ष है और न ही निर्भीक। हम पीड़ित, दुखी, सच्चे, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, देशभक्त, समतावादी, दयालु व मानवीय गुणों से परिपूर्ण लोगों के पक्ष में है। साथ ही हमे हमेशा भय रहता है कि हमारे समाचार माध्यम से किसी की मानहानि न हो, किसी को दुख न पहुंचे, किसी का अपमान न हो, मर्यादा न भंग हो। संविधान की अवहेलना न हो। अन्य भी। जब हम किसी के पक्ष में है, किसी चीज से डरते है तो सीधी सी बात है कि हम निष्पक्ष व निर्भीक नहीं है। हां यह जरूर है कि छेड़ेंगे भी नहीं और छोड़ेंगे भी नहीं। अपने बारे में एक बात और कि हमारे इन्हीं आचरणों की वजह से अभी हमारे साथ में खुल कर इटावा निवासी वरिष्ठ पत्रकार हरिश्चंद्र तिवारी व कानपुर बसंत बिहार निवासी सुशील कुमार साथ में हैं। अन्य लोगों से उम्मीदें है। देखते है क्या होता है। हमने घोषणा कर दी कि जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ। तो फिर लोग कितने आएगें कुछ कह नहीं सकते। मगर इतना वादा है कि आपको पुरानी पत्रकारिता का आनंद एक बार फिर आएगा जरूर। जैसे मिलेट्स यानी ज्वार, बाजरा, रागी लौट कर आ गए है वैसे ही। अपने बारे में अभी फिलहाल इतना ही कहना है। मेरे पास व्यक्तिगत तौर पर हिंदी के तथाकथित बड़े अखबारों, मैगजीनों में काम करने का 42 साल का अनुभव है। यह अनुभव लोगों पर कितना भारी पड़ेगा वक्त बताएगा।

पीयूष त्रिपाठी
प्रधान संपादक – रियल मीडिया नेटवर्क
रियल मीडिया न्यूज डिजिटल
आर-10, रवींद्र नगर, यशोदा नगर, कानपुर, उत्तर प्रदेश
फिलहाल दीर्घायु मार्केटिंग भवन बसंत विहार कानपुर
मो – 7518839758