
जगदीश श्रीवास्तव
हमीरपुर—–उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू होते ही गांवों और कस्बों में राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है। जगह-जगह ‘नवोदित समाजसेवियों’ की सक्रियता अचानक बढ़ गई है, जो अपने-अपने क्षेत्र में जनसेवा की आड़ में जनसंपर्क बढ़ाने में जुटे हैं।
स्थानीय राजनीति में ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और अध्यक्ष जैसे पदों को बेहद प्रभावशाली और संसाधनयुक्त माना जाता है। यही कारण है कि इन पदों पर काबिज होने की होड़ में कई उम्मीदवार अपनी चल-अचल संपत्ति तक दांव पर लगाने को तैयार दिखते हैं। चुनावी मैदान में उतरते ही साम-दाम-दंड-भेद जैसे सभी रास्ते अपनाए जाते हैं — और ग्रामीण क्षेत्रों में तो शराब व भोज का वितरण भी एक आम हथकंडा बन चुका है।
चुनावी मौसम में उम्मीदवारों की विनम्रता और व्यवहारकुशलता देखते ही बनती है। घर-घर जाकर हाल-चाल पूछना, ज़रूरतें पूरी करने का वादा करना, और हर वर्ग को साधने की कोशिश इन दिनों आम हो गई है। मतदाता भी अब सजग हो गए हैं — कोई प्रचार में साथ चलता है, तो वोट कहीं और देता है; तो कोई वादा पूरा न होने पर चुनाव के बाद तकाज़ा करता है।
हालांकि, यह व्यवहार चुनाव परिणाम घोषित होते ही बदल जाता है। जो जीतते हैं वे अक्सर आम लोगों को पहचानना भूल जाते हैं, और जो हारते हैं वे नाराजगी लेकर वापस लौटते हैं। सबसे दिलचस्प यह है कि हर चुनाव से पहले उम्मीदों की बुनियाद पर जो सपनों का महल खड़ा किया जाता है, वह परिणाम आते ही ढहता सा प्रतीत होता है।
फिर भी, इस बार के पंचायत चुनाव को लेकर दावेदार अभी से सक्रिय हो गए हैं — हर गली-मोहल्ले में बैठकी, चाय-पानी और ‘जनसेवा’ का दौर ज़ोरों पर है। लोकतंत्र का यह स्थानीय पर्व जहां जनभागीदारी की मिसाल हो सकता है, वहीं कई बार यह अवसरवाद और दिखावे की राजनीति का चेहरा भी उजागर करता है।

कोई हारे या जीते हम तो फायदे में ही रहते हैं भाभी प्रधान हमारे यहां अपने नाम का खाता खुलवाकर कुछ मुद्रा एडवांस में जमा कर देते हैं और फिर गांव गली में घूम कर देखा कि किसी का सिर दर्द हो रहा है किसी को कांटा लग गया हो, किसी को खूनी पेचिश पढ़ रही हो कसम उसे वैलेट पेपर की उनसे ज्यादा इनके पेट में ठंड होने लगती है और तुरंत हमारे यहां भेज देते हैं और फोन करके कहते हैं कि डॉक्टर साहब अच्छा इलाज कर देना