यूपी-एमपी दो प्रदेशों में चर्चित पूर्व मंत्री बादशाह सिंह ने सक्रिय राजनीति से संयास लेने का किया ऐलान
पीयूष त्रिपाठी
रियल मीडिया न्यूज नेटवर्क/लखनऊ। चार दशकों तक राजनीति में अपना परचम लहराकर उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में खास पहचान बनाने वाले, अपनी कार्यशैली से लोगों के दिलों में छाप छोड़ने वाले गरीबों बेसहारों के सहारा बन कर ज़मीन से जुड़ी जीवनशैली और जनता के बीच जनप्रिय नायक की तरह चार बार के विधायक व यूपी कैबिनेट में मंत्री रहे कुंवर बादशाह सिंह ने अब सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया, इस फैसले को लेकर उनके समर्थकों शुभचिंतकों व जान पहचान वालों के बीच मायूसी का माहौल बन गया है। लोग अभी उनसे रिक्वेस्ट कर रहे है कि अपने फैसले पर पुनर्विचार करें, मगर बादशाह सिंह नाम है उनका बात वचन और कौल शपथ के पूरे पक्के हैं। एक बार जो कमिटमेंट कर दी तो फिर किसी की नहीं सुनते, फैसला सोच समझ कर करते। इस लिए उनके अब सक्रिय राजनीति में लौटने की उम्मीद बिल्कुल नहीं है। हां राजनीतिक गलियारों में शोरगुल के साथ कानाफूसी का दौर शुरू हो चुका है क्योंकि बादशाह सिंह काफी दिनों से समाजवादी पार्टी में थे लोगों को लग रहा था कि वह हमीरपुर सदर विधानसभा सीट से सपा के प्रत्याशी होंगे। उनका यह अचानक फैसला राजनीतिज्ञों को अवाक कर गया है।
बादशाह सिंह अब जनपद महोबा (पूर्व में हमीरपुर) के खरेला गांव के निवासी है। साधारण कृषक परिवार की पृष्टभूमि वाले बादशाह सिंह के पिता की कुछ लोगों ने हत्या कर दी थी, पिता फौज में थे दुश्मन परिवार के अन्य लोगों पर भी नज़रे गड़ाये थे, उसी दौरान लोगों के विशेष आग्रह पर बादशाह सिंह ने राजनीति का रास्ता अख्तियार किया और यूथ कांग्रेस व इसके बाद सेवादल से शुरूआत की उनका व्यवहार और आचरण कुछ ऐसा था कि 1988 में नगर पंचायत खरेला के चेयरमैन निर्वाचित हो गये। 1991 में भाजपा से विधायक हुए फिर 1996, 2002, 2007 में विधायक चुने गये इसी 2007 में ही पहले राज्यमंत्री फिर कैबिनेट मंत्री श्रमविभाग बनाये गये। श्रमविभाग में भी उन्होंने एतिहासिक काम किये। बुंदेलखंड में श्रम अदालत की स्थापना और श्रमिकों के लिए उपकर लगाने का काम किया। जिससे लाखों मजदूर उनके मुरीद हुए। बादशाह सिंह से मेरा व्यक्तिगत परिचय 1999 में हुए तब से बराबर संपर्क बना हुआ है। मेरी जानकारी के अनुसार विधायक निधि में कमीशन, नौकरियां लगवाने में उगाही किसी भी बात के लिए चंदा लेना, ठेकेदारों से कमीशन लेना, लाइसेंस व अन्य काम कराने के एवज में धन लेने की एक भी घटना कभी सूनने में नहीं आईं, क्योंकि वह ऐसा कभी करना तो दूर सोचते भी नहीं। बुंदेलखंड की संस्कृति, परमपरा, जीवनशैली, इसके इतिहास की रक्षा के लिए उनकी तत्परता और समर्पण, अद्भुत और अद्वितीय है। लोकप्रियता का आलम यह कि 2007 में अपने चुनाव प्रचार के दौरान वह गांव-गांव वोट मांग रहे थे, मैं भी साथ में था तमाम ऐसे महिला पुरूष सामने आकर नाराज़गी जताने लगे, बोले कि बादशाह सिंह आपने हमारे यहां वोट मांगने आ कर हमारा अपमान कर दिया। आपको हमारे यहां आना ही नहीं चाहिए था इस का मतलब है कि आपको हम पर भरोसा नहीं है। बादशाह सिंह हंसते हुए सबको संतुष्ट करते रहे। उनकी एक आवाज़ पर 10 हजार की भीड़ जुट जाना चुटकियों का खेल था। बिरादरी से राज परिवार के क्षत्रिय होने के बावजूद जातिवाद की राजनीति कभी नहीं की। पिछड़ों, दलितों, अतिदलितों के बीच उनकी लोकप्रियता इसका सबूत है।
वह राजनीति के मेले में ऐसे शख्स रहे जो अलग दिखते रहे, देश के बड़े-बड़े नेताओं तक उनकी सीधी पहुंच फिर मीडिया द्वारा उन्हें बाहुबली का खि़ताब दिया जाना उनके अलग स्वभाव की पहचान बना। जनता के लिए तन-मन-धन का सहयोग देने में आगे बढ़कर हाथ बढ़ाने वाले बादशाह सिंह यूपी और एमपी की राजनीति में चर्चित हस्तियों में से गिने जाते रहे। राजसी बू-बास उन्हें छू नहीं गई। लेकिन उन्होंने किसी की बू-बास बर्दाश्त भी नहीं की। सत्य के पक्ष में उनका कोई भी नुकसान हो जाये तो मंज़ूर लेकिन असत्य के पक्ष में कभी खड़े नहीं हुए। भाजपा, बसपा, कांग्रेस, सपा कोई भी दल हो अपनी तरफ से तो सम्मान में कसर नहीं रखी लेकिन किसी की तरफ से अगर रत्ती भर भी उपेक्षा या कमतरी का एहसास हुआ तो कतई बर्दाश्त नहीं किया। किसी के छतरी के नीचे सीना तान के ही खड़े हुए, सामाजिक क्षेत्र में उनके द्वारा किये गये कार्यों की बड़ी लम्बी सूची है। कन्याओं का विवाह से लेकर लोगों को जागरूक करने के लिए तमाम ऐसे प्रयास वह हमेशा करते रहे जिससे लोकहित हो। उनपर कभी भी जघन्य अपराधों से संबंधित कोई शिकायत कभी नहीं कायम हुई। एक बातचीत में उन्होंने कहा कि मैं अपने जीवन में आये और मेरे साथ खड़े हुए हर उस प्रत्येक व्यक्ति का एहसानमंद हुए जिसने कभी मुझे रास्ता दिखाया हो। राजनीति से संयास क्यों लिया इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि युग बदल चुका है राजनीति अब अंधी सुरंग हो गई है जो जनता हमें चुनकर जनप्रतिनिधि बनाती है हम उसके लिए खरे नहीं उतर पा रहे है। राजनीति मेरी पहचान नहीं है बल्कि जनता मेरी पहचान है इस लिए मैं बिना राजनीति के भी जनसेवा कर सकता हूं, इसी लिए जनसेवा करता रहूंगा।
राजनीति के बादशाह ने छोड़ा ‘राजनीति का सिंहासन’
