पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी (सपा) 5 अगस्त को अपने दिवंगत वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्र की जयंती बड़े पैमाने पर मनाने जा रही है। पार्टी ने लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क सहित प्रदेशभर में कार्यक्रमों की तैयारी की है। हाल के सप्ताहों में विभिन्न जिलों में बैठकों और कार्यकर्ताओं की लामबंदी के जरिए इस आयोजन को संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन और चुनावी संदेश के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। समाजवादी आंदोलन के स्तंभः जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया के करीबी सहयोगी रहे। आपातकाल में जेपी आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। सांसद और मंत्रीः इलाहाबाद से कई बार सांसद चुने गए। केंद्र में वीपी सिंह और देवगौड़ा सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे। राज्यसभा सदस्य भी रहे। सपा के संस्थापक नेताः मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर 1992 में समाजवादी पार्टी बनाने में प्रमुख भूमिका। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और मुख्य विचारक माने जाते थे। विचारधाराः सादगी, ईमानदारी और धर्मनिरपेक्षता उनकी पहचान थी। वो कुर्ता-धोती और झोला वाले नेता थे। जातिवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ हमेशा मुखर रहे। 22 जनवरी 2010 को उनका निधन हो गया।
समाजवादी आंदोलन में भूमिका
जनेश्वर मिश्र ने समाजवादी आंदोलन को केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रखा। वे किसानों, मजदूरों, गरीबों और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लगातार उठाते रहे। समाजवादी पार्टी के गठन के बाद वे उसके प्रमुख वैचारिक स्तंभों में शामिल रहे और पार्टी के भीतर विभिन्न वर्गों को जोड़ने की भूमिका निभाई। जनेश्वर मिश्र ब्राह्मण समुदाय से आते थे, लेकिन उनकी पहचान जातीय राजनीति से ऊपर समाजवादी विचारधारा के नेता के रूप में बनी। यही कारण है कि सपा आज भी उन्हें अपने वैचारिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है। समाजवादी पार्टी के नेता मनोज कुमार शुक्ल बबलू, अशोक पाण्डेय अतर्रा सहित तमाम राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बार जयंती कार्यक्रम केवल श्रद्धांजलि नहीं बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा भी है। सपा इस आयोजन के माध्यम से विशेष रूप से ब्राह्मण समाज तक अपनी पहुंच बढ़ाने और व्यापक सामाजिक गठजोड़ का संदेश देना चाहती है। पार्टी ने कई सांसदों और नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों को जोड़ने की जिम्मेदारी भी दी है। यदि कार्यक्रम सफल रहता है, तो सपा को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है। भाजपा के पारंपरिक समर्थन आधार माने जाने वाले ब्राह्मण मतदाताओं के एक हिस्से तक पहुंच बनाने का अवसर। बड़े आयोजन से संगठन में उत्साह और चुनावी तैयारी को गति मिल सकती है। सपा स्वयं को केवल जातीय दल नहीं, बल्कि समाजवादी परंपरा की उत्तराधिकारी पार्टी के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर सकती है। 2027 का चुनावी संदेश देने केलिए कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एक मंच पर लाकर चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत जैसा माहौल बनाया जा सकता है। यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी। किसी भी राजनीतिक आयोजन का वास्तविक प्रभाव चुनाव के समय मतदाताओं के व्यवहार, उम्मीदवारों के चयन, स्थानीय मुद्दों और अन्य दलों की रणनीति पर भी निर्भर करता है। जनेश्वर मिश्र की वैचारिक विरासत सपा के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीक है, लेकिन केवल जयंती आयोजन से चुनावी सफलता तय नहीं होती है। 5 अगस्त का आयोजन समाजवादी पार्टी के लिए श्रद्धांजलि से अधिक राजनीतिक महत्व रखता है। एक ओर यह पार्टी को अपने समाजवादी इतिहास और वैचारिक विरासत से जोड़ता है, वहीं दूसरी ओर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरणों, विशेषकर ब्राह्मण मतदाताओं के बीच संवाद बढ़ाने और संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन का अवसर भी प्रदान करता है। इसकी चुनावी सफलता का आकलन आने वाले महीनों में पार्टी की व्यापक रणनीति और मतदाताओं की प्रतिक्रिया के आधार पर ही किया जा सकेगा। समाजवादी पार्टी हर साल 5 अगस्त को जनेश्वर मिश्र का जन्मदिवस ‘‘समाजवादी चिंतन दिवस’’ के रूप में मनाती है। इस बार लखनऊ में पार्टी मुख्यालय, जिला और ब्लॉक स्तर पर गोष्ठियों, रक्तदान शिविरों और विचार गोष्ठियों का आयोजन होगा। अखिलेश यादव कार्यकर्ताओं को ‘‘लोहिया और जनेश्वर मिश्र के समाजवाद’’ को घर-घर तक पहुंचाने का संकल्प दिलाएंगे। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक इस आयोजन से सपा को 3 बड़े फायदे मिल सकते हैं। जनेश्वर मिश्र समाजवाद, गरीब-किसान और पिछड़ों की राजनीति का चेहरा थे। उनके नाम पर कार्यक्रम करके सपा अपने पुराने कार्यकर्ताओं और बूढ़े वोटर को याद दिलाती है कि पार्टी की जड़ें क्या हैं। इससे पार्टी कैडर में जोश आता है। भाजपा के खिलाफ नैतिक जमीन बनाना क्यों कि जनेश्वर मिश्र की छवि बेदाग और सादगी भरे नेता की है। उनके नाम पर कार्यक्रम करके सपा खुद को ‘‘सिद्धांत वाली राजनीति’’ और भाजपा को ‘‘सत्ता की राजनीति’’ के रूप में पेश करने की कोशिश करती है। इससे पार्टी को नैतिक बढ़त मिलती है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता का कहना है, जनेश्वर जी ने हमें सिखाया कि राजनीति सेवा है, धंधा नहीं।
‘‘छोटे लोहिया’’ के सहारे 2027 की बिसातः जनेश्वर मिश्र जयंती से ब्राह्मणों और समाजवादियों को साधने की सपा की रणनीति
