महापौर ने तालाबों पर कब्जे के लिए राजस्व विभाग को घेरा, सवाल—नाले-नालियां किसने साफ कराईं?
कानपुर। बारिश ने कानपुर की पोल खोल दी। शहर की सड़कें जलमग्न हुईं, नाले-नालियां उफनाईं, घरों और दुकानों में पानी पहुंचा और कई इलाकों में सड़कें टूटने के साथ बिखरी बजरी ने राहगीरों की मुश्किलें बढ़ा दीं। जनता परेशान हुई तो सरकारी महकमों में जिम्मेदारी तय करने के बजाय एक-दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़ने का खेल शुरू हो गया। जलभराव को लेकर महापौर प्रमिला पाण्डेय ने नगर निगम की भूमिका पर सवाल खारिज करते हुए शहर के कई तालाबों की सूची जारी की और आरोप लगाया कि राजस्व विभाग द्वारा तालाबों का संरक्षण नहीं किए जाने के कारण भूमाफियाओं ने कब्जे कर लिए। नतीजा यह हुआ कि बारिश का पानी तालाबों में जाने के बजाय सड़कों पर बह रहा है। लेकिन महापौर के इस आरोप ने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—अगर तालाबों पर वर्षों से कब्जे होते रहे तो चार तहसीलों का पूरा राजस्व अमला कहां था? लेखपाल, कानूनगो, नायब तहसीलदार, तहसीलदार और एसडीएम से लेकर जिलाधिकारी, मंडलायुक्त, कानपुर विकास प्राधिकरण और आवास विकास परिषद तक सरकारी तंत्र की लंबी-चौड़ी फौज मौजूद है। इसके बावजूद यदि तालाब कब्जे में चले गए तो यह केवल एक विभाग की नाकामी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सामूहिक विफलता का सवाल है।
राजस्व पर आरोप, निगम से भी सवाल
तालाबों पर कब्जे निश्चित तौर पर जलनिकासी के लिए गंभीर संकट हैं, लेकिन क्या नगर निगम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है? शहर के कई इलाकों में बारिश के बाद नालियां और नाले पानी से भरे नजर आए। सवाल है कि मानसून से पहले नालों की सफाई कितनी प्रभावी ढंग से हुई? अगर सफाई पूरी हुई थी तो पहली बड़ी बारिश में जलनिकासी व्यवस्था क्यों चरमरा गई? तालाब कब्जे में हैं तो जिम्मेदार कौन? नाले बंद हैं तो जिम्मेदार कौन? सड़कें टूटी हैं तो जिम्मेदार कौन? जनता जवाब चाहती है। नदी किनारे कब्जे और पांडु की बाढ़ भी बड़ा सवाल: कानपुर की प्रमुख नदियों के किनारों पर अतिक्रमण और प्राकृतिक जलप्रवाह में बाधा का मुद्दा भी लंबे समय से उठता रहा है। पांडु नदी के आसपास बाढ़ की समस्या का खामियाजा दक्षिण कानपुर के लोग वर्षों से भुगत रहे हैं। नदी का रास्ता सिकुड़ेगा, तालाबों पर कब्जे होंगे और नाले अवरुद्ध होंगे तो बारिश का पानी आखिर जाएगा कहां? पानी को विभागों की सीमा नहीं पता। उसे सिर्फ बहने का रास्ता चाहिए। और जब रास्ते कब्जे में मिलते हैं तो पानी सड़क, खेत और घर में घुसता है। शिकायत करने वाला ही बन जाता है कटघरे में विडंबना यह भी है कि जब कोई नागरिक तालाब, नाले, नदी या अतिक्रमण की शिकायत करता है तो कई बार समस्या पर कार्रवाई करने के बजाय शिकायतकर्ता की नीयत पर ही सवाल उठने लगते हैं। अगर शिकायत गलत है तो जांच कराकर खारिज कीजिए। अगर सही है तो कार्रवाई कीजिए। लेकिन शिकायत को दबा देने से समस्या खत्म नहीं होती। विभागों की ‘फुटबॉल’ में आम आदमी बना गोलपोस्ट, नगर निगम राजस्व की ओर देख रहा है, राजस्व दूसरे विभागों की ओर, विकास प्राधिकरण अपनी सीमाएं बता सकता है और सिंचाई विभाग नदी की जिम्मेदारी गिना सकता है। लेकिन इस पूरी ‘विभागीय फुटबॉल’ में गोल कौन खा रहा है? आम आदमी। उसकी सड़क पानी में है। उसकी गाड़ी बजरी पर फिसल रही है। उसका घर जलभराव से परेशान है। उसका कारोबार प्रभावित है। किसान की फसल खतरे में है।
जनता का सीधा सवाल—आखिर जिम्मेदार कौन?
कानपुर को अब आरोप-प्रत्यारोप नहीं, जवाब और कार्रवाई चाहिए। तालाबों की सूची जारी करने से आगे बढ़कर यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि किस तालाब पर किसका कब्जा है, कब्जा कब हुआ, किस अधिकारी के कार्यकाल में हुआ और अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। साथ ही नगर निगम को भी बताना होगा कि मानसून से पहले कितने नाले साफ किए गए, कितनी नालियां साफ हुईं और जलभराव रोकने के लिए क्या स्थायी इंतजाम किए गए। बारिश को रोका नहीं जा सकता, लेकिन जलभराव को आपदा बनने से रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी जरूर है। कानपुर की जनता अब सिर्फ यह नहीं पूछ रही कि दोष किस विभाग का है? जनता पूछ रही है— “जब विभाग इतने हैं, तो जिम्मेदारी लेने वाला कौन है?”
