पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ। कभी अस्पतालों में डॉक्टर की सलाह पर कुछ दिनों की एक्सरसाइज तक सीमित मानी जाने वाली फिजियोथेरेपी अब तेजी से बदलते हेल्थकेयर सेक्टर का हिस्सा बन रही है। कमर और गर्दन के दर्द से लेकर स्ट्रोक, दुर्घटना, रीढ़ की चोट, ऑपरेशन के बाद पुनर्वास और बुजुर्गों की गतिशीलता तक—फिजियोथेरेपी की जरूरत का दायरा लगातार बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में करीब 2.6 अरब लोग ऐसी स्वास्थ्य स्थितियों के साथ जी रहे हैं, जिन्हें रिहेबलिटेशन की जरूरत से लाभ हो सकता है। बढ़ती गैर-संचारी बीमारियों और वृद्ध होती आबादी के कारण पुनर्वास सेवाओं की मांग आगे भी बढ़ने का अनुमान है। उत्तर प्रदेश में फिजियोथेरेपी का बाजार केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है। निजी क्लीनिक, मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल, रिहैब सेंटर, स्पोर्ट्स इंजरी क्लीनिक, न्यूरो-रिहैब सेंटर और अब होम फिजियोथेरेपी सेवाएं भी इस क्षेत्र को विस्तार दे रही हैं। राज्य में फिजियोथेरेपी शिक्षा का विस्तार भी इस बढ़ती मांग का संकेत है। उत्तर प्रदेश राज्य चिकित्सा संकाय के रिकॉर्ड में विभिन्न संस्थानों में बीपीटी पाठ्यक्रम और स्वीकृत सीटें दर्ज हैं।फिजियोथेरेपी की मांग बढ़ने की सबसे बड़ी वजह इसका बदलता स्वरूप है। अब इसका इस्तेमाल सिर्फ कमर या घुटने के दर्द के लिए नहीं होता। बल्कि कमर और गर्दन का दर्द,घुटने और कंधे की समस्या, स्पोर्ट्स इंजरी,फ्रैक्चर या ऑपरेशन के बाद पुनर्वास,स्ट्रोक के बाद हाथ-पैर की कमजोरी,रीढ़ की हड्डी की चोट, न्यूरोलॉजिकल बीमारी,बुजुर्गों में चलने और संतुलन की समस्या, बच्चों में कुछ डेवलपमेंट की समस्याएं, हृदय रोग के बाद, स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन जल्द शुरू करना महत्वपूर्ण है और फिजियोथेरेपी का उद्देश्य मोबिलिटी मसल्स स्ट्रेस सुधारने में मदद करना है। यूपी के शाहजहांपुर में बीते दो दशक से फिजियोथेरेपी कर रहे डा अमित सिंह व डा नमिता सिंह दम्पति के अनुसार लाइफस्टाइल ने बढ़ाई मरीजों की संख्या बढ़ाई है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, कंप्यूटर और मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल, शारीरिक गतिविधि में कमी, मोटापा और गलत पोस्चर जैसी समस्याएं जोखिम बढ़ाती हैं।अपर्याप्त शारीरिक गतिविधि से हृदय रोग, स्ट्रोक और डायबिटीज सहित कई गैर-संचारी रोगों का खतरा बढ़ता है। यही कारण है कि फिजियोथेरेपी अब इलाज के बाद की सेवा से आगे का भी हिस्सा बन रही है।फिजियोथेरेपी के विस्तार में न्यूरो और कार्डियक रिहैबिलिटेशन तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं।

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज कानपुर के प्राचार्य डा संजय काला के अनुसार 2021 में दुनिया में स्ट्रोक के अनुमानित 9.38 करोड़ मामले थे और स्ट्रोक मृत्यु एवं विकलांगता के प्रमुख कारणों में शामिल रहा। स्ट्रोक के बाद rव्यक्ति को कार्यक्षमता और स्वतंत्रता वापस पाने में मदद कर सकती है। हृदय रोगों के मामले में भी भूमिका महत्वपूर्ण है। कारडियो वैस्कुलर दुनिया में मृत्यु का प्रमुख कारण हैं और 2022 में उनसे करीब 1.98 करोड़ मौतें हुईं। इससे अस्पतालों और रिहेबलीटेशन के लिए फिजियोथेरेपी की भूमिका और बड़ा बाजार तैयार कर रही है।फिजियोथेरेपी कारोबार का नया मॉडल यह है कि ऐसे मरीज जो चलकर क्लीनिक नहीं पहुंच सकते—जैसे स्ट्रोक मरीज, बुजुर्ग, फ्रैक्चर के बाद बिस्तर पर रहने वाले मरीज या गंभीर समस्या वाले लोग—उनके घर जाकर थेरेपी देने की सेवाएं बढ़ रही हैं।इस मॉडल में मरीज को अस्पताल ले जाने की जरूरत कम होती है। इससे परिवारों के लिए समय की परेशानी भी कम होती है।भारत में एडवांस्ड रोबोटिक आर्म्स ,एकसोसकेलटनस, सेंसर बेस्ड सिस्टम्स औरमोशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ रहा है। बढ़ती मांग का असर शिक्षा पर भी दिखाई दे रहा है। बीपीटी अब कई मेडिकल और एलाइड संस्थानों का महत्वपूर्ण पाठ्यक्रम बन चुका है।

सबसे बड़ा सवाल: मरीज बढ़े, लेकिन फिजियोथेरेपिस्ट कितने? राज्य में फिजियोथेरेपी का बढ़ता कारोबार सिर्फ स्वास्थ्य क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह रोजगार, निजी स्वास्थ्य सेवाओं, मेडिकल शिक्षा और मरीजों की जेब पर बढ़ते खर्च—चारों को जोड़ने वाली कहानी है।“फिजियोथेरेपी अब दर्द की एक्सरसाइज नहीं, पूरा हेल्थकेयर कारोबार बन रही है। यूपी में बीपीटी शिक्षा से लेकर निजी क्लीनिक, होम विजिट और आधुनिक रिहैब सेंटर तक इसका बाजार फैल रहा है। लेकिन बाजार के विस्तार के साथ सबसे बड़ा सवाल यही है—कितने प्रशिक्षित फिजियोथेरेपिस्ट उपलब्ध हैं और मरीजों तक गुणवत्तापूर्ण सेवा वास्तव में कितनी पहुंच रही है?

हर साल 8 सितंबर को विश्व फिजियोथेरेपी दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 में इस दिवस की थीम हृदय संबंधी बीमारियों और स्ट्रोक की रोकथाम, प्रबंधन तथा पुनर्वास में फिजियोथेरेपी और शारीरिक गतिविधि की भूमिका है। फिजियोथेरेपी को अक्सर कमर, गर्दन, कंधे या घुटने के दर्द तक सीमित समझा जाता है, लेकिन इसका दायरा इससे कहीं व्यापक है। फिजियोथेरेपिस्ट चोट, ऑपरेशन, स्ट्रोक, हृदय रोग, मांसपेशियों की कमजोरी और चलने-फिरने में परेशानी के बाद व्यक्ति की कार्यक्षमता वापस लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विश्व फिजियोथेरेपी के मुताबिक फिजियोथेरेपी का उद्देश्य लोगों को स्वस्थ, गतिशील और स्वतंत्र बनाए रखने में मदद करना है। विश्व स्तर पर संगठन 129 राष्ट्रीय सदस्य संगठनों के माध्यम से छह लाख से अधिक फिजियोथेरेपिस्टों का प्रतिनिधित्व करता है। इस साल की थीम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शारीरिक निष्क्रियता हृदय रोग और स्ट्रोक समेत कई गैर-संचारी रोगों के जोखिम से जुड़ी है। पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं होने से हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और कुछ कैंसर का जोखिम बढ़ता है। डबलू एच ओ दक्षिण-पूर्व एशिया के अनुसार अपर्याप्त शारीरिक गतिविधि इन बीमारियों के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल है। फिजियोथेरेपिस्ट व्यक्ति की उम्र, बीमारी, शारीरिक क्षमता और जोखिम के आधार पर सुरक्षित व्यायाम तथा गतिविधि कार्यक्रम तैयार कर सकते हैं। विश्व फिजियोथेरेपी के 2026 अभियान में भी हृदय रोग के जोखिम वाले लोगों की पहचान, व्यक्तिगत व्यायाम कार्यक्रम और नियमित शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। स्ट्रोक के बाद कई मरीजों में हाथ-पैर की कमजोरी, संतुलन की समस्या, चलने में परेशानी और दैनिक गतिविधियों में कठिनाई हो सकती है। ऐसे मामलों में पुनर्वास उपचार का उद्देश्य मरीज को उसकी अधिकतम संभव कार्यक्षमता वापस दिलाना होता है।फिजियोथेरेपी में मरीज की स्थिति के अनुसार चलने का प्रशिक्षण, संतुलन अभ्यास, मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम और दैनिक गतिविधियों से जुड़े प्रशिक्षण शामिल किए जा सकते हैं। इसका लक्ष्य केवल शरीर की ताकत बढ़ाना नहीं, बल्कि मरीज को अधिक स्वतंत्र बनाना भी है। उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की ताकत, संतुलन और गतिशीलता प्रभावित हो सकती है। इससे गिरने का खतरा बढ़ सकता है। नियमित और व्यक्ति की क्षमता के अनुरूप शारीरिक गतिविधि मांसपेशियों तथा संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकती है। इसीलिए फिजियोथेरेपी अब अस्पतालों के अलावा वृद्ध देखभाल, पुनर्वास केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं में भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। डा अमित सिंह व डा नमिता सिंह के अनुसार विश्व फिजियोथेरेपी के अनुसार 2026 का अभियान लोगों को यह समझाने पर केंद्रित है कि फिजियोथेरेपी केवल चोट के बाद की सेवा नहीं, बल्कि हृदय स्वास्थ्य और स्ट्रोक से जुड़े जोखिमों के प्रबंधन तथा बीमारी के बाद बेहतर जीवन की ओर लौटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
