जगदीश श्रीवास्तव विशेष संवाददाता
रियल मीडिया नेटवर्क

कानपुर। अब तो लगभग सभी लोगों का ही मानना है कि वामपंथियों की विचारधारा विकास को अवरुद्ध करती है। हालांकि पूरे देश में संकुचित हो गए वामपंथियों की विचारधारा का जहर अभी भी जिंदा है।देश का पांचवे नंबर का शहर माने जाने वाला कानपुर अब दर्जनों शहरों से पीछे है। यहां विकास समय की गति के साथ नहीं बढ़ा और जो दिखाई देता है, वह यहां के स्वयं के व्यापारियों और बहुत दिन बाद वामपंथियों से मुक्ति के बाद दिखाई दे रहा है।
कानपुर से लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले वामपंथी एस एम बनर्जी, सुभाषिनी अली आदि ने यहां की मिलों के मजदूरों को कम काम कर अधिक मेहनताना हेतु भड़काया। समस्या न सुलझती देख कई उद्योगपतियों ने कानपुर को छोड़कर अन्यत्र अपना नया ठिकाना ढूंढ लिया। स्वदेशी जूट मिल, म्योर मिल,स्वदेशी कॉटन मिल, एल्गिन मिल,लाल इमली आदि दर्जनों मिलों में ताला लग गया और उनके मजदूर आज भी रोजनदारी को विवश हो गए। हालांकि संबंधित उद्योगपति नई जगह पर अपना आर्थिक विकास जारी रखे हुए हैं और यहां की उस समय की कम कीमत की मिलें आज गुणात्मक रूप से बहुत महंगी हो गई हैं। जिनका भूभाग भी काफी बड़ा है। जब से वामपंथियों को छोड़ अन्य लोग यहां से लोकसभा के सदस्य चुने गए, कानपुर का कुछ विकास तो हुआ ही है। कुछ वर्षों पूर्व यहां से सांसद श्री प्रकाश जायसवाल ने कानपुर के प्रति काफी विकासोन्मुख सकारात्मक कार्य किया। उसके बाद डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी, जगतवीर सिंह द्रोण आदि में सामान्य गति ही दिखाई दी।
पिछले लोकसभा चुनाव में कानपुर के आसपास के कई लोकसभा क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी की पराजय हो गई थी, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। अब कानपुर की कई योजनाओं के लोकार्पण एवं शिलान्यास करने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 24 अप्रैल को कानपुर आ रहे हैं।एक बार फिर लोगों को अपेक्षा है कि सक्षम और सशक्त प्रधानमंत्री संभवतः कानपुर के विकास को एक नया आयाम देंगे।
एक समय था जब कानपुर का चमड़ा और चमड़े से निर्मित दैनिक उपभोग की वस्तुएं विश्व प्रसिद्ध थी,अब आगरा भी इसके समकक्ष खड़ा हो गया है। बहुतायत में मजदूर मिल जाने के कारण यहां छोटे-छोटे कारखाने लग गए हैं और जहां तक उद्योग की बात की जाए तो कानपुर अब गुटखा उद्योग का हब बन चुका है।
अब जबकि कानपुर की ट्रैफिक समस्या बहुत ही संवेदनशील स्थिति में आ गई है। जगह-जगह जाम लगने के कारण नागरिकों,बाहर से आने वाले व्यापारियों तथा यात्रियों का काफी समय इस जाम के कारण बर्बाद हो रहा है, अभी भी यह मर्ज लाइलाज है।
नगर के अंदर बेहतर सफाई सुविधा दिखाई नहीं दे रही हैं और गालियां-सड़कें भी दुरुस्त नहीं है। जहां कानपुर से कहीं छोटा होने के बावजूद आज लखनऊ कानपुर से बड़ा हो चुका है और चौतरफा विकास की ओर आगे बढ़ रहा है। वहीं कानपुर में जो पहले प्रादेशिक कार्यालय थे, वह भी लखनऊ शिफ्ट हो गए। चाहे वह स्टेट बैंक आफ इंडिया का हो अथवा जीवन बीमा निगम का। नगर से हवाई मार्ग से यात्रा करना भी आगरा, लखनऊ, बनारस गोरखपुर आदि से कहीं कमजोर है। कुछ दिनों से अवश्य कुछ चिन्हित जगह के लिए विमान सेवा उपलब्ध है और यह भी इस भाजपा के शासन में ही मयस्सर हो पाया है। अभी भी कई मूलभूत समस्याओं से नगर जूझ रहा है।
देखना है कि प्रधानमंत्री का आगमन कानपुर वासियों के लिए कितना सार्थक सिद्ध होगा।
