“बहरों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी’—रिंकू सिंह राही का नया संदेश, दंड को बताया आगे के अवसर की सीढ़ी
पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ।। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रिंकू सिंह राही एक बार फिर अपने बेबाक अंदाज और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले बयानों को लेकर चर्चा में हैं। जालौन में तैनाती के दौरान लगातार सक्रिय नजर आ रहे राही ने इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के जरिए व्यवस्था के प्रति अपने रुख को स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा कि “बहरों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी है।” साथ ही संकेत दिया कि वह व्यवस्था के तय ढर्रे से अलग काम कर रहे हैं और यदि इसके लिए उन्हें दंड भी मिलता है तो वह उसे स्वीकार करने को तैयार हैं। राही का यह संदेश ऐसे समय आया है जब जालौन में उनकी कार्यशैली को लेकर पहले भी प्रशासनिक स्तर पर चर्चा और विवाद सामने आ चुके हैं। हाल में उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारी को पत्र लिखकर दंड स्वीकार करने की बात कही थी, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाया था कि यदि किसी व्यवस्था में कमी है तो जवाबदेही केवल एक अधिकारी की क्यों तय हो?
इस्तीफे से शुरू हुआ था विवाद
रिंकू सिंह राही उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए जब मार्च 2026 में उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया था। उनका मूल तर्क था कि यदि किसी अधिकारी को काम करने का अवसर नहीं मिलता, लेकिन वेतन मिलता रहता है तो यह व्यवस्था की दृष्टि से गंभीर सवाल है। उन्होंने इसे नैतिक मुद्दा बताते हुए कहा था कि वह केवल नौकरी नहीं, बल्कि काम करना चाहते हैं। अपने इस्तीफे में राही ने प्रशासनिक व्यवस्था में एक “समानांतर सिस्टम” चलने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए थे। उन्होंने यह भी कहा था कि एसडीएम के रूप में काम करने के बावजूद उन्हें दरकिनार किया गया।हालांकि बाद में घटनाक्रम बदला। अप्रैल के अंत में राही द्वारा अपना इस्तीफा वापस लिए जाने की खबर सामने आई और मई में उन्हें जालौन में फील्ड पोस्टिंग मिली। जालौन में तैनाती के बाद राही की कार्यशैली पहले की तरह ही आक्रामक और निरीक्षण-केंद्रित दिखाई दे रही है। उरई नगर पालिका की जांच के दौरान उनका नगर पालिका के ईओ से तीखा विवाद हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने ईओ पर पहले उनसे ‘सेटिंग’ करने आने का आरोप लगाया और निरीक्षण के दौरान कई कर्मचारियों के कार्यालयों में ताले लगे मिलने पर नाराजगी जताई। यानी इस्तीफे के जरिए जिस सवाल को राही ने लखनऊ से उठाया था, अब वही सवाल वह जालौन की स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था में कार्रवाई और निरीक्षण के जरिए उठाते दिखाई दे रहे हैं।
‘दंड’ को लेकर भी अलग नजरिया
राही के नए संदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका दंड को लेकर नजरिया है। सामान्य तौर पर सरकारी अधिकारी के लिए दंड प्रशासनिक दबाव या प्रतिकूल कार्रवाई माना जाता है। लेकिन राही इसे अलग तरीके से देख रहे हैं। उनका संकेत है कि यदि व्यवस्था से हटकर काम करने पर उन्हें दंड मिलता है तो वह उसे स्वीकार करेंगे, क्योंकि इसी प्रक्रिया से आगे नए अवसर पैदा हो सकते हैं। यह सोच उनके पहले के रुख से भी मेल खाती है—जहां उन्होंने नौकरी छोड़ने की बजाय व्यवस्था में रहकर काम करने की इच्छा जताई थी। इस्तीफे के बाद उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह संवैधानिक व्यवस्था को छोड़ना नहीं चाहते, बल्कि उसके भीतर मौजूद कमियों को सुधारने की आवश्यकता मानते हैं।
‘धमाका’ वाली लाइन का असली राजनीतिक-अर्थ क्या?
राही के बयान को केवल व्यक्तिगत नाराजगी के तौर पर देखना अधूरा होगा। प्रशासनिक व्यवस्था में किसी अधिकारी का सार्वजनिक रूप से यह कहना कि “बहरों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी है” अपने आप में एक बड़ा संदेश है। इसका एक अर्थ यह निकाला जा सकता है कि सामान्य प्रशासनिक पत्राचार और शिकायतों से यदि व्यवस्था में बदलाव नहीं आता तो असामान्य या सार्वजनिक हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। दूसरा अर्थ यह है कि राही अपनी कार्यशैली को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। वह विवाद, जांच या दंड की संभावना को भी अपने काम का हिस्सा मान रहे हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू जवाबदेही का है। राही पहले ही सवाल उठा चुके हैं कि प्रशासनिक गलती के लिए जिम्मेदारी केवल उस अधिकारी की क्यों हो जो कार्रवाई कर रहा है। उन्होंने जालौन के डीएम को लिखे पत्र में भी सामूहिक जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता की जरूरत पर जोर दिया था।राही की सार्वजनिक छवि केवल इस्तीफे से नहीं बनी है। उनके बारे में रिपोर्टों में 2009 में एक घोटाले को उजागर करने के बाद गोलीबारी में घायल होने का उल्लेख मिलता है। बाद में शाहजहांपुर में वकीलों के सामने उठक-बैठक लगाने की घटना भी उन्हें सुर्खियों में ले आई। जुलाई 2025 से उन्हें राजस्व परिषद में संबद्ध किए जाने की खबरें भी सामने आई थीं। इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो जालौन में उनकी मौजूदा कार्यशैली किसी अचानक पैदा हुए विवाद का परिणाम नहीं लगती। उनके प्रशासनिक करियर में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई, टकराव, दंड और फिर फील्ड में वापसी की एक लगातार दिखाई देने वाली कड़ी है।जालौन में उनकी सक्रियता का दूसरा पहलू भी है। एक जनसुनवाई में दिव्यांग फरियादी की समस्या सुनने के लिए उन्होंने अपनी कुर्सी छोड़कर जमीन पर बैठने का उदाहरण भी पेश किया। वहीं बुजुर्गों को दोबारा स्कूल भेजने जैसी पहल भी उनके कार्यकाल के दौरान चर्चा में आई। इसलिए राही की कहानी को केवल ‘विवादित अधिकारी बनाम प्रशासन’ के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। उनकी कार्यशैली में एक तरफ सख्त निरीक्षण और टकराव है तो दूसरी तरफ जनसुनवाई और सामाजिक पहल भी दिखाई देती है। रिंकू सिंह राही का नया संदेश दरअसल उनके प्रशासनिक दर्शन का संक्षिप्त रूप दिखाई देता है—चुप रहकर व्यवस्था का हिस्सा बने रहने के बजाय टकराव लेकर भी सवाल उठाना। मार्च में इस्तीफा, अप्रैल में इस्तीफा वापसी, मई में फील्ड पोस्टिंग और अब जालौन में लगातार निरीक्षण व प्रशासनिक पत्राचार—इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो साफ है कि राही ने व्यवस्था से बाहर जाने की बजाय व्यवस्था के भीतर रहकर लड़ने का रास्ता चुना है।
उनका “धमाका” वाला बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल सोशल मीडिया पोस्ट नहीं, बल्कि एक ऐसे अधिकारी की सार्वजनिक घोषणा के रूप में देखा जा सकता है जो पहले ही कह चुका है कि उसे वेतन से अधिक काम और पद से अधिक जवाबदेही चाहिए। हालांकि उनके द्वारा लगाए गए प्रशासनिक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग मामलों में आवश्यक है। यही इस पूरे प्रकरण का अगला महत्वपूर्ण सवाल भी है—क्या राही की कार्यशैली को प्रशासनिक सुधार का प्रयास माना जाएगा या इसे अनुशासनहीनता के दायरे में रखा जाएगा? जालौन में आने वाले दिनों में उनकी कार्रवाई और उस पर शासन की प्रतिक्रिया इस सवाल का जवाब दे सकती है।
