कानपुर देहात। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) National Security Act, (N.S.A.) यह भारत का एक सख्त कानून है जिसे 1980 में बनाया गया था, इसे राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम भी कहते हैं,जो धारा 3 से 5 तक वर्णित तथ्यों पर आधारित है, यदि सरकार को लगता है कि कोई व्यक्ति देश की सुरक्षा या कानून-व्यवस्था के लिए खतरा है, तो उसे बिना मुकदमे के महीनों तक हिरासत में रखा जा सकता है,लेकिन किसी व्यक्ति विशेष पर NSA (रासुका) लगाने से पहले भारत की सुरक्षा एजेंसियां उसकी पूरी जांच पड़ताल कर यह सिद्ध करती हैं कि अमुक व्यक्ति राष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए राष्ट्र द्रोही कार्य करने में संलग्न है ! तब ही उसे जेल भेजा जाता है । दूसरी ओर भारत में एक और कानून है। sc/st Act अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम,जिसे 1989 में समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा देने और उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए बनाया गया था ! बीच बीच में इस एक्ट में सुविधानुसार और भी संशोधन भी किए गए, लेकिन इसी sc/st Act.अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में एक संसोधन कर दिया कि जांच करके ही प्राथमिकी दर्ज की जाये। इसका अधिकार सक्षम जांच अधिकारी को दे दिया। गिरफ्तारी से पूर्व उच्च अधिकारी से अनुमति लेने की बाध्यता कर दी ! आरोपित व्यक्ति को अग्रिम जमानत देने की व्यवस्था भी न्यायालय ने प्रदान कर दी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1989 के एक्ट में संशोधन करने के तुरंत बाद वर्तमान नरेन्द्र मोदी जी की NDA सरकार ने 2018 में ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम sc/st Act में संशोधन करके सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा किए गए बदलावों को निष्प्रभावी करते हुए पुनः नये और कड़े प्रावधानों को फिर से धारा 18 में A जोड़कर उसे धारा 18A के रूप में पुन: भारत में लागू कर दिया। जिसके तहत यह प्रावधान लागू हो गया कि,अधिनियम 18A के अंतर्गत sc/st Act. का कोई भी मामला दर्ज करने के लिए किसी भी प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है। गिरफ्तारी करने के लिए पहले किसी उच्च अधिकार से अनुमति लेते की भी जरूरत नहीं। आरोपी की अग्रिम जमानत पर भी रोक लगा दी। अर्थात किसी भी व्यक्ति पर प्राथमिकी दर्ज होते ही गिरफ्तारी। न कोई शुरुआती जांच, न किसी अधिकारी की अनुमति,न ही कहीं से अग्रिम जमानत। आरोपी को सिर्फ और सिर्फ जेल भेजना। और यह सब किया गया भारत के ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गये निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए। तब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने सिर्फ इतना बदलाव किया था कि अनावश्यक फर्जी प्राथमिकी में किसी को जेल भेजकर उसके जीवन जीने के हक को न छीना जाये,परन्तु मोदी जी की सरकार को सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय पसंद नहीं आया और उन्होंने धारा 18A लागू करके फर्जी फसाये गए निर्दोष लोगों को अनायास जेल भेजे जाने लिए संसद से कानून बना कर लागू करा दिया। यदि किसी ने एक रुपये के कागज पर किसी से पेन मांगकर चार झूठी मनगढ़ंत जाति सूचक बातें लिखकर पुलिस स्टेशन में प्रार्थना पत्र दे दिया तो, तुरन्त ही Sc/st Act. में प्राथमिकी दर्ज की जाये और आरोपी को जेल भेजना पक्का किया जाये। साथ ही में सच्ची/झूठी प्राथमिकी दर्ज कराने वाले व्यक्ति को पारितोषिक के रूप में अच्छी खासी धनरशि भी उपलब्ध कराई जाये। आरोपी के पास यदि उच्च न्यायालय में जाकर अपने मूल अधिकार के हनन को रोकने हेतु निवेदन करने और स्थगनादेश प्राप्त करनें का आर्थिक सामर्थ नहीं है तो उसे कितने दिन महीने या साल जेल में गुजारने पड़ेंगे इस विषय में कोई कुछ नहीं बता सकता। अब आते हैं इस लेख के मूल बिन्दु पर तुलना करते हैं NSA राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 और sc/st Act.2018 की धारा 18A अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम पर ! कितनी विचित्र बात है कि किसी राष्ट्रद्रोही पर राष्ट्रद्रोह की कार्यवाही करने से पहले जांच होती है, जांच अधिकारी को सिद्ध करना पड़ता है कि अमुक व्यक्ति ने राष्ट्र द्रोह किया है, राष्ट्रीय सुरक्षा को क्षति पहुंचाने का कुत्सित प्रयास भी किया है। तब कहीं जाकर उसे गिरफ्तार किया जा सकता है। लेकिन Sc/st Act. में न कोई जांच ना कोई बात सीधे जेल। अर्थात sc/st Act.अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 2018, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम N.S.A. Act.से भी कहीं अधिक प्रभावी है। राष्ट्रद्रोही तो जांच में बच सकता है ! य उसके बचाव में देश के बड़े बड़े धुरंधर वकील रातों रात खड़े हो जायेंगे। लेकिन वहीं sc/st Act.में फसे व्यक्ति को जांच करके उसे बचाने के रास्ते पूर्णतः बंद हैं। और उसके पास यदि स्वयं उच्च न्यायालय तक जाने की भी आर्थिक सामर्थ नहीं है तो,वह व्यक्ति मुकदमें में निर्णय आने तक जेल में सड़ने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं है। अर्थात भारत की सरकार की नजर में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 (N.S.A.) राष्ट्रद्रोह से भी कहीं अधिक चिंताजनक है अनुसूचित अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम sc/st Act. 2018, जिस पर देश में अब ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई है कि देश के सरकारी आंकड़ों में ही लगभग 40% फर्जी मुकदमों के तथ्य सामने आ रहे हैं। बहुत बड़े पैमाने पर कुछ लोग फर्जी मुकदमें लिखा कर सरकार से सहायता राशि भी (मुआवजा) प्राप्त कर रहे हैं। साथ ही में अभी आगे भारत की कुछ राजनीतिक पार्टियां sc/st Act. की तर्ज पर ही O.B.C. Act. बनाने की घोषणा भी कर रहीं हैं। कल्पना करें कि हमारा भारत देश किस दिशा में निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है ? परिणाम की कल्पना भयावह है।
विद्यासागर त्रिपाठी मूसानगर कानपुर देहात उप्र.
