नारी सशक्तिकरण के नारे पर कलंक का टीका देखना है? जाइये राठ के जिगनी गांव जाकर देख लीजिए ……

जगदीश श्रीवास्तव
राठ हमीरपुर। सरकार के तमाम विकास के दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है। राठ तहसील के जिगनी गांव में एक ऐसा परिवार है, जहां तीन पीढ़ियां गिर चुके कच्चे मकान की अटारी के नीचे झोपड़ी डालकर किसी तरह जिंदगी बसर कर रही हैं। न सुविधाएं, न सुरक्षा—बस संघर्ष और उपेक्षा।
यह दर्दनाक तस्वीर है सीता देवी पत्नी स्व. जगदीश सिंह की, जो अपनी विधवा बहू विनीता (पत्नी स्व. प्रद्युमन सिंह) और नातिन निशु के साथ पूरी तरह ढह चुके घर के मलबे पर तिरपाल और छप्पर डालकर जीवन जीने को मजबूर हैं। परिवार में कोई पुरुष सदस्य न होने के कारण इन तीनों महिलाओं को दो वक्त की रोटी और सिर ढकने की जगह के लिए हर दिन जंग लड़नी पड़ रही है।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, जिस हालत में ये महिलाएं रह रही हैं, वहां कोई भी सामान्य व्यक्ति एक दिन भी गुजारने की कल्पना नहीं कर सकता। खासतौर पर बरसात के मौसम में उनका जीवन संकट से भरा होता है। झोपड़ी के चारों ओर जंगली झाड़ियां और खरपतवार उग आए हैं, जिनमें सांप-बिच्छुओं का बसेरा है।
सीता देवी कहती हैं—“जब बारिश होती है, तो लगता है जैसे घर नहीं, आग बरस रही हो। डर लगता है कि कब यह छप्पर ढह जाए और हमारी जान चली जाए।
सीता देवी बताती हैं कि वह बीते दो वर्षों से इस नारकीय जीवन को झेल रही हैं। ग्राम प्रधान से लेकर अधिकारियों तक उन्होंने कई बार अपनी स्थिति से अवगत कराया, लिखित आवेदन भी दिए, लेकिन अब तक उन्हें प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री आवास योजना जैसी किसी भी सरकारी सहायता का लाभ नहीं मिल पाया है।
मामला संज्ञान में आने के बाद उपजिलाधिकारी ने बताया कि पीड़ित परिवार की स्थिति को गंभीरता से लिया गया है। खंड विकास अधिकारी को निर्देशित किया गया है कि वे तत्काल मौके पर जाकर स्थिति की जांच करें और पात्र महिलाओं को सरकारी आवास सहित सभी संभव मदद उपलब्ध कराई जाए।

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