बाघ के हमले थम नहीं रहे, लेकिन एक जनप्रतिनिधि ने थामा पीड़ितों का हाथ


बरखेड़ा विधायक की तत्परता बनी ग्रामीणों का संबल, अब शासन को उठाने होंगे ठोस कदम
मुकेशकुमार

पीलीभीत। प्रदेश के
पीलीभीत जिले में वन्यजीवों का आतंक कोई नई बात नहीं रह गई है। वर्षों से सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करने वाले ग्रामीण बाघ, तेंदुए और अन्य जंगली जानवरों के भय में जीते आए हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि इन हमलों की पुनरावृत्ति लगातार बढ़ रही है, जबकि सरकारी व्यवस्थाएं अब भी धीमी, प्रतिक्रिया-प्रधान और कभी-कभी तो पूरी तरह से अनुपस्थित दिखती हैं।
हालिया घटना में ग्राम मंडरिया की निवासी कृष्णा देवी की बाघ के हमले में दुखद मृत्यु हो गई। यह घटना उस भयावह श्रृंखला का हिस्सा है, जिसमें पहले ही कई जानें जा चुकी हैं और दर्जनों ग्रामीण घायल हो चुके हैं। लेकिन इस अंधेरे में जो एक उजली किरण दिखी, वह थी बरखेड़ा
विधायक ।जो न केवल पीड़ित परिवार के घर पहुंचे, बल्कि उन्हें दो-दो लाख रुपये की सहायता राशि ‘राज्य आपदा मोचक निधि’ से दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई। इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह रही कि उन्होंने पीड़ित परिवार के दुख में केवल प्रशासनिक भूमिका नहीं निभाई, बल्कि एक सच्चे जनप्रतिनिधि की तरह आत्मीयता से संवेदना जताई और हरसंभव मदद का भरोसा दिया। यही भूमिका एक जनसेवक की पहचान बनाती है — जो आपदा के वक्त केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई करे।
यह भी स्मरणीय है कि स्वामी प्रवक्तानंद इससे पहले भी बाघ हमलों की अन्य घटनाओं में तत्काल सक्रिय रहे हैं — चाहे वह घायलों को देखने लखनऊ जाना हो, या शासन से मुआवजा स्वीकृति में तत्परता दिखाना। यह निरंतरता ही उन्हें अन्य नेताओं से अलग करती है, जो घटनाओं पर मौन रहना और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रहना उचित समझते हैं।
अब जब एक विधायक ने यह संदेश दिया है कि शासन-प्रशासन को संवेदनशील, उत्तरदायी और तत्पर होना चाहिए, तो क्या वन विभाग और जिला प्रशासन को भी अपने दायित्वों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए? पिंजरे लगाना, रात्रि गश्त बढ़ाना, गश्ती दलों की संख्या दोगुनी करना और प्रभावित क्षेत्रों में फेंसिंग की व्यवस्था करना जैसी मांगें अब प्रतीक्षा नहीं कर सकतीं।
शासन-प्रशासन को यह समझना होगा कि इन हमलों से केवल जान-माल का नुकसान नहीं होता, बल्कि ग्रामीणों की मानसिक स्थिति, जीवन पद्धति और खेती जैसे आधारभूत पक्ष भी प्रभावित होते हैं। जब एक क्षेत्र में बार-बार हमले हों, तो केवल वन्यजीव संरक्षण की भाषा नहीं, मानवीय सुरक्षा और जीवन के मूलभूत अधिकारों की भी बात होनी चाहिए।
इसलिए अब ज़रूरत है कि बरखेड़ा विधायक की इस संवेदनशील पहल को शासन-प्रशासन एक उदाहरण के रूप में देखें और स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कार्ययोजना लागू करें। क्योंकि संवेदना के साथ-साथ ठोस क़दम ही ग्रामीणों को असली राहत दे सकते हैं।

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