
टिकट काउंटर न होने से बारिश में भीगते हैं यात्री
रियल मीडिया नेटवर्क
भरुआ सुमेरपुर। कानपुर-बांदा रेलमार्ग पर स्थित इंगोहटा रेलवे स्टेशन बीते 40 वर्षों से बदहाली और उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। स्थायी भवन सहित प्लेटफार्म न होने के साथ बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं है। यह स्टेशन अब रेलवे विभाग की उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता का प्रतीक बन चुका है।
स्थानीय निवासी माधव प्रसाद, धनीराम साहू,राकेश गुप्ता,महेश कुमार,रामप्रसाद,महेंद्र,सज्जन, रामकुमार आदि ने बताया कि यात्रियों को खुले आसमान के नीचे बैठकर ट्रेन का इंतजार करना पड़ता है। बरसात हो या कड़ाके की ठंड या झुलसा देने वाली गर्मी,हर मौसम में यात्री परेशान रहते हैं। पानी के लिए केवल एक हैंडपंप उपलब्ध है, जो बढ़ती यात्री संख्या के लिहाज से नाकाफी है। लोगों ने बताया कि लगभग 40 वर्ष पूर्व स्टेशन मास्टर की हत्या की घटना के बाद रेलवे ने स्थायी व्यवस्थाएं समाप्त कर दी थीं और ठेका प्रणाली लागू कर दी थी। तब से अब तक स्टेशन की दशा बद से बदतर होती चली गई। पहले यहां स्टेशन मास्टर व स्टाफ की तैनाती होती थी। मगर अब कोई प्रशासनिक व्यवस्था शेष नहीं बची है। रेलवे द्वारा दोहरीकरण कार्य के दौरान पुराना स्टेशन भवन तो गिरा दिया गया, लेकिन नया भवन अब तक नहीं बन सका। जिससे यात्री अंधेरे और अव्यवस्था के बीच सफर करने को मजबूर हैं। विशेष रूप से बुजुर्गों और दिव्यांगों को प्लेटफॉर्म न होने से ट्रेन में चढ़ने-उतरने में काफी दिक्कत होती है। स्टेशन पर ठेकेदार को प्रतिदिन रागौल स्टेशन (लगभग 10 किमी दूर) से टिकट लाकर यात्रियों को देने होते हैं। प्रतिदिन यहां से करीब 250 से अधिक यात्री सफर करते हैं। जिसमें इंगोहटा, बिदोखर, बंडा, मवईजार, कल्ला, धनपुरा, खडेहीजार, अतरार, छानी, बजेहटा आदि 20 से अधिक गांवों से आने वाले लोग शामिल रहते हैं। उन्हें केवल सुबह और शाम के समय ही ट्रेनों की सुविधा मिलती है। जब देशभर में रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण की मुहिम तेजी से चल रही है। ऐसे में इंगोहटा स्टेशन की दशा इस विकास यात्रा पर सवाल खड़े करती है। न रेलवे विभाग और न ही जनप्रतिनिधियों ने इस ओर कोई ठोस प्रयास किए हैं। क्षेत्रीय जनता ने रेलवे के उच्चाधिकारियों से मांग की है कि इंगोहटा स्टेशन पर यात्री सुविधाएं यथाशीघ्र बहाल की जाएं ताकि ग्रामीण यात्रियों को राहत मिल सके।
