भरुआ सुमेरपुर। महज एक झांकी से 200 वर्ष पूर्व शुरू हुआ कस्बे का ऐतिहासिक तीजा मिला अब तीन दर्जन झांकियां की विशाल शोभा यात्रा के साथ शुरू होता है। इस वर्ष शोभायात्रा में रामसेना की नई झांकी शामिल की जा रही है। इसके लिए पचास युवाओं का चयन किया गया है। कस्बे में तीजा मेला की नींव अंग्रेजी शासन काल में कस्बे के चन्दी जोशी ने रखी थी। तब यह श्रीकृष्ण भगवान की एक झांकी सिर में रखकर गाते बजाते कस्बे में भ्रमण करके हरचंदन तालाब में समापन करते थे। धीरे-धीरे इसकी ख्याति बढ़ी और लोगों का काफिला बढ़ता गया। बाद में भगवान की झांकी को डोला बनाकर निकालने की शुरुआत हुई। चंदी जोशी के बाद इस कार्यक्रम को कस्बे के बाबू गुप्ता ने आगे बढ़ाया। इनको लोग कस्बे में प्रेम से बाबूचाचा कहकर बुलाते थे। बाबू चाचा के समय झांकियां का विस्तार हुआ और कई झांकियां शामिल कराकर शोभा यात्रा को भव्य बनाया गया। इन्हीं के समय रात में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन शुरू हुआ और कस्बे का तीजा मेला बुंदेलखंड के साथ रुहेलखंड में प्रसिद्ध होने लगा। बाबू चाचा के बाद तीजा मेला की कमान भिखारीलाल मिश्रा,रामशरण मिश्रा, रामेश्वर पांडे, सूरजबली पांडे,रमैया शुक्लाआदि ने संभाली। उनके समय पर तीजा मेला की ख्याति दूर-दूर तक हुई और बुंदेलखंड से लेकर रुहेलखंड तक के कोने-कोने में विख्यात हो गया। तीजा मेला देखने के लिए लाखों की भीड़ आने लगी। इसके बाद इस मेला की कमान देवनारायण उर्फ टुन्नी दुबे एवं बृजलाल सिंह ने संभाली।इनके समय भी इस भव्य आयोजन में कोई कमी नहीं रही और यह प्रतिवर्ष अपनी अलग छाप छोड़ता रहा। अब तीजा मेला की कमान जयप्रकाश उर्फ बब्बू दीक्षित के हाथ में है। इनके साथ कुंजबिहारी पांडे, राघवेंद्र पांडे, संजीव पांडे, सुरेश यादव, बृजलाल सिंह, महेश सिंह भदौरिया आदि कर्मठ लोग रात दिन मेहनत करके इसकी ख्याति बढ़ाने में जुटे हुए हैं। तीजा मेला कमेटी के अध्यक्ष बब्बू दीक्षित ने बताया कि प्रति वर्ष तीन दर्जन झांकियां शामिल की जाती हैं। इस वर्ष रामसेना की एक झांकी और शामिल की जा रही है।इसके लिए पचास युवाओं का चयन किया गया है। साथ ही कंस,पूतना लवकुश आदि झांकियों को और अधिक आकर्षक बनाया जा रहा है। अगले वर्ष लवकुश की झांकी के लिए पीतल का घोड़ा शामिल किया जाएगा। इसकी अनुमानित लागत करीब तीन लाख होगी। इस वर्ष शोभायात्रा में हाथी शामिल कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।



