बिना सांस्कृतिक चेतना के मर जाएगा समाज : महेश शर्मा

बिना सांस्कृतिक चेतना के मर जाएगा समाज : महेश शर्मा

कानपुर। संस्कृति एवं पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक हैं। पत्रकारिता समाज की आंख तो संस्कृति आत्मा है। बिना सांस्कृतिक चेतना के समाज मर जाएगा। समाज को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि पत्रकारिता में संवेदना को न मरने दें। संवेदना संस्कृति से ही मिलती है। पत्रकारिता का ककहरा संस्कृति से ही पनपता है। यह विचार वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा ने सेंट जेवियर्स स्कूल में अनुभव स्मृति पत्रकारिता व संस्कृति सम्मान कार्यक्रम में व्यक्त किए। पवित्र परिवार एवं कान्यकुब्ज पत्रकार समिति के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में प्रख्यात आल्हा गायक संग्राम सिंह की बेटी आराध्या सिंह की प्रस्तुति आकर्षक रही। डॉ. अनुभव तिवारी द्वारा आल्हाखंड पर आधारित एक विशेष शोध-ग्रंथ का लोकार्पण किया गया। साहित्य और रंगमंच को एक मंच पर लाते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. रमेश तिवारी विराम का भावपूर्ण स्मरण किया गया। लखनऊ की सांस्कृतिक संस्था काव्योम के कलाकारों ने प्रो. विराम के चर्चित नाटक ‘धरती के देवता’ का मंचन किया। तीन वरिष्ठ पत्रकार इरा अवस्थी, अभिषेक द्विवेदी और सौरभ अवस्थी को इस वर्ष के अनुभव स्मृति पत्रकारिता सम्मान से नवाजा गया। विचित्र वीणा वादक किशन चंद्र गुप्ता ने अध्यक्षता तथा अमित मिश्रा ने संचालन किया।

वरिष्ठ पत्रकार कौशल शर्मा, अंशुमान तिवारी, डॉ. अपूर्वा अवस्थी, सुनील कुमार सिंह और उमाकांत शुक्ला आदि रहे। चित्र परिचय: आल्हा गायक आराध्या सिंह को सम्मानित करते वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा, साथ में कौशल शर्मा (बाएं) एवं आल्हा गायक संग्राम सिंह (दाएं)। व्याख्यान के संपादित अंश। ‘एआई आपका विकल्प नहीं सिर्फ टूल है’ पत्रकारिता और संस्कृति, विषय पर संवाद के लिए एकत्र हुए हैं, यह दरअसल हमारे समाज की स्मृति, संवेदना और भविष्य का विषय है। पत्रकारिता समाज की आंख है और संस्कृति उसकी आत्मा। आंख यदि देखना बंद कर दे तो समाज अंधा हो जाता है और आत्मा यदि संवेदना खो दे तो समाज भीतर से खोखला हो जाता है। पत्रकारिता का काम केवल खबर देना नहीं है। पत्रकारिता का मूल दायित्व है—समय को दर्ज करना। जो आज घटना है, वही कल इतिहास बनेगी। इसलिए पत्रकार केवल समाचार नहीं लिखता, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने समय का दस्तावेज तैयार करता है। पत्रकारिता का रिश्ता संस्कृति और सामाजिक चेतना से रहा है। पत्रकारिता का सर्वोच्च आदर्श सत्ता के निकट बैठना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना है। लेकिन पत्रकारिता और संस्कृति का रिश्ता एकतरफा नहीं है। संस्कृति संवेदना देती है तो पत्रकारिता सार्वजनिक विमर्श। किसी शहर की संस्कृति केवल उसके मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, इमारतों या स्मारकों में नहीं रहती। संस्कृति लोगों की भाषा में रहती है, उनके मुहावरों में रहती है, उनके खान-पान में रहती है, उनके त्योहारों में रहती है, उनके गीतों में रहती है और सबसे अधिक उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में रहती है। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं है विश्वसनीयता है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को पत्रकार बना दिया है। मोबाइल फोन ने खबर को तत्काल बना दिया है। लेकिन उसमें सत्य कम दिखाई देता है। फेक न्यूज, आधी-अधूरी जानकारी, वायरल वीडियो, एआई (यंत्र बुद्धि) से बनाई गई तस्वीरें और सनसनीखेज शीर्षक पत्रकारिता के सामने नए सवाल खड़े कर रहे हैं। ऐसे समय में पत्रकारिता को अपनी सबसे पुरानी ताकत की ओर लौटना होगा। इसमें तथ्य की जांच, स्रोत की विश्वसनीयता और भाषा की जिम्मेदारी अनिवार्य है। आज हमारे सार्वजनिक जीवन में संवाद कम और शोर ज्यादा हो गया है। पत्रकारिता का मूल स्वभाव सवाल पूछना है। पत्रकारिता और संस्कृति को साथ बैठकर यह तय करना होगा कि हम आने वाली पीढ़ी को कैसी भाषा, कैसी स्मृति और कैसा समाज देना चाहते हैं। मैं मानता हूं कि आने वाले समय की पत्रकारिता को तीन चीजों की सबसे अधिक जरूरत होगी। तथ्य, तकनीक और संवेदना। तकनीक हमें गति देगी। तथ्य हमें विश्वसनीयता देंगे, लेकिन संवेदना ही पत्रकारिता को मनुष्य के करीब रखेगी। इसलिए पत्रकारिता का भविष्य केवल एआई में नहीं है। उसका भविष्य इस बात में है कि पत्रकार मनुष्य की पीड़ा को कितनी गहराई से समझता है। एआई आंकड़े जुटा सकता है, लेकिन किसी मजदूर की वर्षों पुरानी बेरोजगारी की पीड़ा को अपने भीतर नहीं जी सकता। ए आई एक टूल भर है जिसका इस्तेमाल कीजिए। तकनीक पत्रकार का विकल्प नहीं, उसका उपकरण हो सकती है। अंत में मैं केवल इतना कहना चाहूंगा हूं कि पत्रकारिता समय की आवाज है। हमें ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो समाज की स्मृतियों को बचाए, वर्तमान के सवाल पूछे और भविष्य के लिए रास्ते तलाशे। हमें ऐसी संस्कृति चाहिए जो विविधता का सम्मान करे, असहमति को जगह दे और मनुष्य को मनुष्य से जोड़े। तभी पत्रकारिता और संस्कृति का यह संवाद सार्थक होगा। मुझे धैर्य से सुनने के लिए आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद।

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