कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, गुटबाजी और संगठन की निष्क्रियता बनी भाजपा की हार की बड़ी वजह

जगदीश श्रीवास्तव।

हमीरपुर। विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और चुनावी रणनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, संगठन की ल्पनिष्क्रियता, गुटबाजी और जमीनी स्तर पर कमजोर चुनाव प्रबंधन को हार की प्रमुख वजह माना जा रहा है।चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं को देवतुल्य बताने वाली भाजपा में बाद में उन्हीं कार्यकर्ताओं को लेकर जारी निर्देशों ने असंतोष बढ़ाने का काम किया। राष्ट्रीय संगठन मंत्री की ओर से कार्यकर्ताओं को थानों और तहसीलों के चक्कर न लगाने की नसीहत दिए जाने से पहले से उपेक्षित महसूस कर रहे कार्यकर्ताओं में निराशा और बढ़ गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कार्यकर्ताओं की इस नाराजगी का असर चुनावी परिणामों पर भी पड़ा है।इस चुनाव ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम पर चुनावी जीत हासिल करना आसान नहीं है। इसके लिए संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय रहकर कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय बनाना और पूरी ताकत से चुनाव मैदान में उतरना होगा। पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार के आरोपों, दल-बदलकर भाजपा में आए नेताओं की बढ़ती दखलंदाजी और उन्हें मिल रही प्राथमिकता से पुराने एवं समर्पित कार्यकर्ताओं में असंतोष की स्थिति बताई जा रही है। वहीं, पन्ना प्रमुखों और बूथ प्रभारियों की निष्क्रियता भी संगठन के लिए चिंता का विषय है।दरअसल, कुछ माह पूर्व मतदाता पुनरीक्षण अभियान के दौरान समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता पूरी सक्रियता से जुटे हुए थे, जबकि भाजपा कार्यकर्ताओं की भागीदारी कई स्थानों पर औपचारिकता तक सीमित रही। आरोप है कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने नए मतदाताओं के नाम जुड़वाने के साथ-साथ मतदाता सूची से कटे नामों को दोबारा शामिल कराने में अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई। मतदान के दिन भी कार्यकर्ताओं की उदासीनता चर्चा का विषय बनी रही।भाजपा प्रत्याशी की ओर से भी चुनाव के दौरान मतदाताओं और कार्यकर्ताओं से पर्याप्त संपर्क नहीं किए जाने की बात सामने आई। समय की कमी और अपनी जीत को लेकर आश्वस्त रहने के कारण जनसंपर्क में कमी रहना भी हार की वजहों में गिना जा रहा है। इसके अलावा आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट के संभावित दावेदारों के बीच आपसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और एक-दूसरे को कमजोर करने की कथित रणनीति ने भी पार्टी की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित किया। विधान परिषद चुनाव के परिणाम भाजपा के लिए आत्ममंथन का अवसर हैं। यदि पार्टी नेतृत्व अब भी जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करता है और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने के बजाय केवल चुनावी दावों पर भरोसा करता है, तो आगामी विधानसभा चुनाव में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पार्टी को पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं का सम्मान बहाल करने, संगठन में व्याप्त गुटबाजी खत्म करने तथा बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने की जरूरत है। कार्यकर्ताओं का मनोबल और संगठन की एकजुटता ही आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की चुनावी सफलता की असली कसौटी साबित होगी।

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