मोदी जी को कानपुर ने लिखी चिट्ठी
पीयूष त्रिपाठी
कानपुर। सृष्टि के आरंभ में भी मैं था। तभी तो त्रेता युग में सूर्यवंश के दो लालों को माता जानकी ने मेरे केंद्र बिन्दु बिठूर में जन्म दिया। हरहराती, कलरव करती अपनी तरंगों से घाटों को पावन बनाती और मेरे समूचे क्षेत्र को सिंचित करती बिना भेदभाव के अपने पवित्र जल से हर जाति वर्ग को अभिसिंचित करती तरल तरंगिणी मां भागीरथी। मेरे दक्षिणी किनारे से कलकल करती अपनी यात्रा को आगे बढ़ाती है। जिसके तटों पर अरण्य और कृषि सभ्यताओं ने जन्म लिया। वैदिक साहित्य का सृजन हुआ साथ ही हर दुनियावी उपलब्धि मेरे आंगन में पली बढ़ी । जंगे आजादी का साक्षी हूं मैं, कानपुर हूं। विडंबनाएं मेरे साथ चल रही हैं। छल, कपट मेरे इर्द-गिर्द लिपटे हुए हैं। और अब तो कलयुग के प्रथम चरण में मैं मिलों से फैक्ट्रियों में तब्दील हो गया हूं। राजनीति की खूंटी मेरी ही छाती पर गड़ी हुई है। एक करोड़ से ज्यादा आबादी का बोझा उठाए अब मैं बूढ़ा हो रहा हूं। मैं कानपुर हूं, मेरे रथ का घर्घर नाद सुनो। सुनो मोदी जी। कानपुर आ रहे हैं। आ तो रहे हैं लेकिन अब मैं कानपुर नहीं। कान्हपुर से कर्णपुर फिर कानपुर से अब मैं कूड़ापुर बन गया हूं। कूड़े के ढ़ेर पर बैठा हूं या फिर कूड़े ने मेरे ऊपर डेरा बना लिया है पता नहीं। मैं उद्योगों की उजड़ती कोख को बंजर-ऊसर बनते देखने की चीज हो गया हूं। पत्थरों का शहर जो तप रहा है लापरवाही, मनमानी, गुंडागर्दी, मुफलिसी, बेरोजगारों की भीड़ की तपिश में। माफिया के साये तले इतना तो तय है कि अब मेरा पुराना गौरव वापस नहीं आ सकता क्योंकि मेरे सारे निर्माण एक्सपायर हो चुके हैं। बहुमंजिली इमारतों में तब्दील हो गया मैं। बुनियादी सुविधाएं, स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, स्वच्छता की मैं प्रयोगशाला हूं। अफसरों की फौज मौज कर रही, जनता त्रस्त, अफसर, माफिया मस्त, नेता इन्हीं के साथ व्यस्त और कानपुर का कनपुरिया पन अस्त हो गया। मैं कानपुर तो हूं लेकिन पुराना कानपुर नहीं रह गया, और नया बन नहीं पाया। डबल इंजन की सरकार है, बड़े काम कराने के वादों की पोटली खोपड़ी पर रखकर घूम रहा हूं मैं। लगातार आप की पार्टी के सांसद, विधायक, पार्षद, पंच प्रधान सबकी झोली में झोली भर भर कर वोट दे रहा हूं, फिर भी मेरी झोली खाली की खाली है। फिर भी बुनियादी सुविधाओं को तरस रहा हूं। एक दिन मुझसे मां गंगा ने कहा, बंद करो अटल घाट पर महाआरती, कोई फायदा नहीं, क्योंकि किसी को मेरे किनारे बसी टेनरियां दूर ले जाने की सूझती ही नहीं। कितने वर्ष हो गए कोई सरकारी इंटर डिग्री कॉलेज नहीं खुला। ऐसा कैसे? प्रधानमंत्री जी आप भौतिक रूप से मई 30 ।2025 को आ रहे हैं पत्रकारिता दिवस है.. यहां कुछ पत्रकार जेल में भी हैं कुछ बेल पर भी हैं, तो कुछ झोला टांगे भीख भवन में भी।लेकिन आप तो हर वक्त कंपू की उम्मीदों की आखिरी किरण बने हुए हैं। आइए आप का धूल, धुआं, धुंध और धोखे, सुअर, साइकिल, खडखडे, उचक्के और खोखे का शहर कानपुर आपसे उम्मीद करता है कि स्मार्ट सिटी का आपका ही सपना आपको सोने न दे। धन्यवाद

