
जगदीश श्रीवास्तव
हमीरपुर। बुंदेलखंड क्षेत्र का हमीरपुर जनपद आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। खनिज संपदा से परिपूर्ण होने के बावजूद यह जनपद विकास की दृष्टि से लगातार उपेक्षित रहा है। यहां पत्थर, मौरंग और अब मिट्टी का भी वैध-अवैध खनन धड़ल्ले से चल रहा है, परंतु प्रशासन की भूमिका केवल औपचारिक रह गई है।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो राठ निवासी स्वर्गीय स्वामी ब्रह्मानंद ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देते हुए ब्रह्मानंद इंटर कॉलेज एवं कृषि डिग्री कॉलेज की स्थापना की। सांसद रहते हुए उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों में राठहित को प्राथमिकता दी थी। राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने अपने दल के उम्मीदवार की बजाय स्वतंत्र उम्मीदवार वी.वी. गिरी का समर्थन किया, जिनकी बाद में कांग्रेस ने भी समर्थन दिया और वे राष्ट्रपति बने। गिरी साहब के राठ आगमन और उनकी ओर से रेलवे लाइन की घोषणा एक बड़ी उम्मीद थी, लेकिन स्वामी जी के अपने सहयोगियों के विरोध और कृषि भूमि को लेकर आशंका के चलते वह सपना अधूरा रह गया। परिणामस्वरूप आज तक यह क्षेत्र सीमित रेलवे सुविधा पर निर्भर है।
वर्तमान में क्षेत्रीय जनता की नाराजगी अपने चरम पर है। पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत ने जहां 132 केवी का विद्युत उपकेंद्र स्थापित कराया, वहीं राजनारायण बुधौलिया ने नवोदय विद्यालय और रेलवे आरक्षण केंद्र की स्थापना कर क्षेत्र को लाभ पहुंचाया। इसके बाद के सांसदों द्वारा कोई भी ऐसा उल्लेखनीय विकास कार्य नहीं किया गया, जिसे जनता याद रख सके।
भाजपा शासनकाल में सांसद बने पुष्पेंद्र चंदेल का प्रदर्शन भी जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। उनके द्वारा गोद लिए गए गांवों की स्थिति आज भी बदहाल बनी हुई है। दूसरी ओर, उनके विरोध से विजयी हुए सपा सांसद अजेन्द्र लोधी भी शुरुआत से ही अप्रभावी साबित हुए हैं। दोनों ही सांसदों पर जनता से दूरी बनाए रखने और क्षेत्रीय समस्याओं से बेखबर रहने के आरोप लगते रहू हैं।
परिणामस्वरूप, सारी अपेक्षाएं स्थानीय विधायकों पर टिक जाती हैं। क्षेत्रीय विधायक समस्याओं का सामना करते हैं, आलोचना झेलते हैं, जबकि सांसदों की ओर जनता का कोई सीधा संवाद या दबाव नहीं बन पाता। सोशल मीडिया पर भी समस्याओं के समाधान की मांग केवल विधायकों से ही की जाती है, जिससे सांसद और भी अधिक निष्क्रिय हो जाते हैं।
यह हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र का दुर्भाग्य कहा जा सकता है कि जिसे भी यहां की जनता दिल्ली भेजती है, वह क्षेत्रीय विकास की जिम्मेदारी से विमुख होकर केवल राजनीतिक स्वार्थ में उलझ जाता है। जरूरत है एक ऐसे जनप्रतिनिधि की जो विकास के मुद्दों को प्राथमिकता दे, जनता से संवाद बनाए रखे और संसदीय शक्ति का उपयोग करके क्षेत्र को पिछड़ेपन से बाहर निकाले।
