सावन मास में गांव की चौपालें सूनी नहीं सुनाई दे रहे आल्हा कजरी…


रियल मीडिया नेटवर्क
भरुआ सुमेरपुर। शुक्रवार से सावन मास का आरंभ हो गया है लेकिन गांवों का चौपालों से सावन गीतों के साथ आल्हा गायन गायब है। आधुनिकता की चकाचौंध ने पुरानी परंपराओं में ग्रहण लगा दिया। अमवा के पेड़ के झूले, सिलोर डंडा, पकड़ कबड्डी, कबड्डी सर्रा, कंचा, भौरा घुमाने के खेल गांव के आंगन से नदारत है।
सावन मास शुरू होते ही मठ मंदिरों के साथ गांवों की चौपालों में सावन गीतों के साथ आल्हा गायन धूम मचाने लगती थी। यह सब कुछ दो दशक पूर्व तक ज्यों का त्यों चल रहा था लेकिन जैसे ही आधुनिकता की चकाचौंध बढ़ी लोग पुरानी लोक कला से मुंह मोड़ने लगे और आज आलम यह है कि गांव की चौपालें सूनी पड़ी हुई है। सावन शुरू होने के बाद गांवों में कहीं भी यह महसूस नहीं हो रहा है कि सावन चल रहा है। इस माह गांवों में खेलों की बहार होती थी गांव के आंगन शाम ढलते ही खेलों से गुलजार हो उठते थे। सर्रा, पकड़ कबड्डी, कबड्डी पिल्लारी, सिलोर डंडा, कंचा, भौंरा घूमाने की धूम मचाती आज का युवा इन सभी को खेल से अनजान है।
विदोखर निवासी प्रसिद्ध लोक गायक अमर सिंह पहलवान का मानना है कि इन सभी लोग परंपराओं का क्षरण मोबाइल ने किया है मोबाइल के रील्स ने युवाओं को परंपरागत खेलों, गायनो से दूर करने में अहम किरदार निभाया है। यह बहुत ही दुखद है इससे हम अपनी संस्कृति से दूर जा रहे हैं। यह देश के साथ युवाओं के लिए घातक हो सकती है।
कस्बे के निवासी प्रसिद्ध लोक गायिका विद्या विश्वकर्मा भी मानती है कि टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर ने हमारे तमाम विधाओं को नष्ट किया है। सावन मास खुशियों का मास होता था। घर-घर सावन गीत के साथ-साथ खेलकूद की विधाओं के बोल गुजाय मान होते थे अब सब कुछ सूना सूना नजर आता है।

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