

भरुआ सुमेरपुर। वैसे तो पूरे देश में रक्षाबंधन का पर्व एक ही दिन मनाया जाता है। लेकिन यहां राखी बांधने का चलन आज भी तीजा महोत्सव में आने वाली बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधती है। इतना ही नहीं इस तीजा मेला में शादी विवाह के रिश्तों पर भी मुहर लगती है। साथ ही रिश्तो की तारीखें तय होती है। इस तरह से कस्बे का ऐतिहासिक तीजा मेला कई परंपराओं को जीवंत करता है।
कस्बे के ऐतिहासिक तीजा मेला महोत्सव की ख्याति दूर-दूर तक है। बुंदेलखंड के कोने-कोने से लोग इस महोत्सव में हिस्सा लेते हैं। रक्षाबंधन का पर्व तिथि पर पूरे देश में एक दिन मनाया जाता है। लेकिन यहां अलग परंपरा है। आल्हा ऊदल के समय की बात करें तो उनके समय में एक दिन बाद रक्षाबंधन बनाने की परंपरा हो शुरू हुई। कस्बे में तीजा तक राखी बांधने का चलन है। कस्बे का वयोवृद्ध सेवानिवृत्त शिक्षक एम एल अवस्थी बताते हैं कि यह परंपरा बहुत पुरानी है। जो बहनें रक्षाबंधन पर मायके नहीं आ पाती हैं। वह तीजा में आकर भाइयों को राखी बांधती है। इसके बाद तीजा महोत्सव की शोभायात्रा में शामिल होकर ससुराल वापस जाती हैं।
बुजुर्ग बृजलाल सिंह बताते हैं कि तीजा तक राखी बांधने के अलावा और भी तमाम परंपराएं विद्यमान है। तीजा मेला में प्रत्येक घर पर रिश्तेदारों का जमघट होता है। इसी जमघट में लड़का लड़की के तमाम रिश्ते तय होते हैं। रिश्तो के बयानें के बाद तारीखें तय होती हैं। यह सब कुछ सदियों से चला आ रहा है। बुजुर्ग रामकृष्ण प्रजापति बताते हैं की तीजा मेला तमाम परंपराओं को समेटे हैं। उनका निर्वाहन आज भी होता है। शादी ब्याह के अलावा घर परिवार में होने वाले झगड़ों को भी नाते रिश्तेदार सभी को आपस में बिठाकर सुलझाते हैं। यह सब वर्षों से निरंतर हो रहा है। जो रिश्तेदार वर्ष पर्यंत आने का समय नहीं निकाल पाते है। वह तीजा में समय निकालकर अवश्य आते हैं। कस्बे का कोई ऐसा घर नहीं होता है। जिस घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा नहीं लगता है।

