मुहर्रम की मजलिस में गूंजा करबला का पैगाम, क़ारी अनवर अहमद ने बयान की शोहदा-ए-कर्बला की अज़ीम कुर्बानियां

  • हक़ और बातिल की जंग में इमाम हुसैन ने पेश की इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल

फतेहपुर। सुल्तानपुर घोष गांव में 8 मुहर्रम के मौके पर आयोजित मजलिस में करबला के शोहदा को खिराज-ए-अकीदत पेश किया गया। इस अवसर पर पेश इमाम सुल्तानपुर घोष क़ारी बिलाल नूरी ने करबला वालों की याद में नातो मनकबत पेश किया और क़ारी मौलाना अनवार अहमद ने तारीखी बयान करते हुए हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके जांनिसार साथियों की अज़ीम कुर्बानियों पर विस्तार से रोशनी डाली।
अपने बयान में क़ारी अनवार अहमद साहब क़िबला ने कहा कि 9 मुहर्रम का दिन करबला की तारीख में बेहद अहम है। इसी दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीदी फौज के सामने आखिरी बार हक़ और इंसाफ का पैगाम पेश किया तथा अपने साथियों को सब्र, इस्तिकामत और अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहने की तालीम दी। उन्होंने कहा कि जब यज़ीद की फौज ने फरात का पानी बंद कर दिया और अहले बैत व उनके साथियों को तीन दिनों तक प्यासा रखा गया, तब भी इमाम हुसैन और उनके रफीकों ने जुल्म के सामने सर नहीं झुकाया। 9 मुहर्रम की रात इमाम हुसैन ने अपने साथियों को इबादत, तिलावत-ए-कुरआन और दुआ में गुजारने की नसीहत की। यह रात सब्र, इबादत और अल्लाह पर तवक्कुल की बेहतरीन मिसाल है। क़ारी बिलाल नूरी ने कहा कि करबला का पैगाम केवल मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है। करबला हमें सिखाती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, इंसान को हक़ का साथ नहीं छोड़ना चाहिए और जुल्म व नाइंसाफी के खिलाफ डटकर खड़ा रहना चाहिए। उन्होंने हज़रत अब्बास अलमदार, हज़रत अली अकबर, हज़रत क़ासिम, औन-मोहम्मद और छह माह के शीरख्वार हज़रत अली असगर अलैहिस्सलाम की कुर्बानियों का जिक्र करते हुए कहा कि इन हस्तियों ने दीन-ए-इस्लाम की सरबलंदी के लिए अपनी जानों का नजराना पेश कर दिया, लेकिन बातिल ताकतों के सामने झुकना गवारा नहीं किया। मजलिस के दौरान शोहदा-ए-कर्बला को पुरसा पेश किया गया और उपस्थित अकीदतमंदों ने अश्कबार आंखों से इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानियों को याद किया। मजलिस के अंत में मुल्क में अमन, भाईचारे, खुशहाली और इंसानियत की भलाई के लिए विशेष दुआ की गई।

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