हज़ारों करोड़ का व्यापार है रुद्राक्ष, फिर भी 70 प्रतिशत नकली और फर्जी

हज़ारों करोड़ का व्यापार है रुद्राक्ष, फिर भी 70 प्रतिशत नकली और फर्जी

मुस्लिम देश इंडोनेशिया व नेपाल से आता है, भारत में लगातार बढ़ रही मांग
पीयूष त्रिपाठी

लखनऊ। रुद्राक्ष केवल एक धार्मिक माला या पूजा सामग्री नहीं रह गया है, बल्कि यह आज करोड़ों रुपये के कारोबार का हिस्सा बन चुका है। भगवान शिव से जुड़ी आस्था के कारण देश-विदेश में रुद्राक्ष की मांग लगातार बढ़ रही है। धार्मिक उपयोग के साथ-साथ इसे स्वास्थ्य, ध्यान और आध्यात्मिक साधना से भी जोड़कर देखा जाता है। भारत में रुद्राक्ष का प्रमुख आयात नेपाल और इंडोनेशिया से होता है। नेपाल का रुद्राक्ष अपेक्षाकृत दुर्लभ और महंगा माना जाता है, जबकि इंडोनेशिया का रुद्राक्ष आकार में छोटा होने के बावजूद बड़ी मात्रा में उपलब्ध होता है। देश के कई हिस्सों, विशेषकर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के धार्मिक बाजारों में इसका व्यापक व्यापार होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, रुद्राक्ष की कीमत उसके मुख (फेस) की संख्या, आकार, गुणवत्ता और प्रमाणिकता पर निर्भर करती है। एक मुखी और दुर्लभ रुद्राक्ष की कीमत हजारों से लेकर लाखों रुपये तक पहुंच सकती है, जबकि पांच मुखी रुद्राक्ष सबसे अधिक प्रचलित और अपेक्षाकृत सस्ता होता है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स वेबसाइटों के विस्तार से रुद्राक्ष का कारोबार और तेज हुआ है। हालांकि, बढ़ती मांग के साथ नकली रुद्राक्ष की बिक्री भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। विशेषज्ञ खरीदारों को केवल प्रमाणित और विश्वसनीय विक्रेताओं से ही रुद्राक्ष खरीदने की सलाह देते हैं। धार्मिक जानकारों का कहना है कि रुद्राक्ष का महत्व केवल उसकी दुर्लभता में नहीं, बल्कि श्रद्धा और सही विधि से धारण करने में निहित है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से रुद्राक्ष के चमत्कारी प्रभावों के दावों के पर्याप्त और निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए ऐसे दावों को सावधानी से परखने की आवश्यकता है। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक पर्वों के दौरान रुद्राक्ष की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है। व्यापारियों का मानना है कि आने वाले वर्षों में धार्मिक पर्यटन और ऑनलाइन बाजार के विस्तार के साथ रुद्राक्ष का कारोबार और अधिक बढ़ने की संभावना है। इस वर्ष सावन में काशी विश्वनाथ मंदिर समेत जिले के सभी प्रमुख शिवालयों जैसे महामृत्युंजय मंदिर, सारंगनाथ महादेव और केदारेश्वर मंदिर में भगवान शिव को रुद्राक्ष अर्पित किए जाएंगे। मंदिरों में रुद्राक्ष से श्रृंगार भी होगा। कई भक्त और सेवादार कमेटियां बाबा विश्वनाथ और अष्टभैरव के श्रृंगार के लिए सवा लाख से लेकर 11 लाख रुद्राक्ष की मालाओं को अर्पित करने की बुकिंग पहले ही कर चुकी हैं। सावन के सोमवार पर इन रुद्राक्षों से पूरी पीठ और गर्भगृह को सजाया जाएगा। रुद्राक्ष का व्यापार भारत में धार्मिक, हेल्थ और फैशन तीन तरह से चलता है। नेपाल, इंडोनेशिया ही असली सोर्स हैं। भारत में रुद्राक्ष का पेड़ बहुत कम है। 90 प्रतिशत आयात होता है। नेपाल के पहाड़ी रुद्राक्ष की सबसे ज्यादा मांग है। एक मुखी, 14 मुखी विशेषकर यहीं के फेमस है। दाना छोटा-मोटा, दोनो तरह का है मगर दाम सबसे महंगा है। इंडोनेशिया व जावा में जावा रुद्राक्ष का दाना बड़ा है और सस्ता भी है। बाजार में 70 प्रतिशत यही बिकता है। 5 मुखी ज्यादा चलन में है। भारत में असम, अरुणाचल, उत्तराखंड, हिमाचल लोकल उत्पादन बहुत कम। असम का ‘बोडो रुद्राक्ष’ प्रसिद्ध है। सालाना व्यापार कितना है? इसके आधिकारिक सरकारी आंकड़े नहीं हैं क्योंकि ये आयात ‘धार्मिक सामान’ में आता है। पर बाजार के अनुमान के अनुसार 800 करोड़ से 1200 करोड़ सालाना है। आयात 200-250 टन रुद्राक्ष हर साल भारत आता है। 80 प्रतिशत इंडोनेशिया, 20 प्रतिशत नेपाल से आता है। रिटेल में माला 50 से शुरू, एक मुखी नेपाल वाला 2 लाख से 25 लाख तक चला जाता है। एक्सपोर्ट भी भारत से अमेरिका, यूके यूएई सिंगापुर में भी रुद्राक्ष जाता है। योगा/आध्यात्मिक मार्केट के कारण डिमांड बढ़ी है। रुद्राक्ष का ‘हब’ ये 4 जगह हैं। हरिद्वार ऋषिकेश, उत्तराखंड सबसे बड़ा होलसेल मार्केट। नेपाल बॉर्डर पास है। वाराणसी, प्रयागराज, अयोध्या, यूपी में धार्मिक टूरिज्म के कारण रिटेल बहुत है। माला, कंगन, रुद्राक्ष शिवलिंग नासिक उज्जैनओंकारेश्वर कुंभ और ज्योतिर्लिंग की वजह से सीजनल बूम होती है। दिल्ली में खारी बावड़ी कोलकाता का बड़ाबाजार जहा इम्पोर्टर और होलसेलर बैठते हैं। यहीं से पूरे देश में सप्लाई होती है। ऑनलाइन अमेज़न, फ्लिपकार्ट, दुकानों पर भी 500 करोड़ का कारोबार होता है। रुद्राक्ष का व्यापार ‘धार्मिक कैलेंडर’ से चलता है। श्रावण सबसे बड़ा सीजन होता है हर सोमवार शिव पूजा। माला-कंगन की डिमांड 3 गुना हो जाती है। महाशिवरात्रि – फरवरी-मार्च दूसरा सबसे बड़ा सीजन होता है। मेला, रुद्राक्ष अभिषेक चलते हैं। नवरात्रि – मार्च-अप्रैल में देवी भक्त भी रुद्राक्ष पहनते हैं। कुंभ मेला में 6 महीने पहले से स्टॉक भर जाता है। एक कुंभ में 100 करोड़ का व्यापार होता है। व्यापार के तीन लेवल होते हैं। इम्पोर्टर नेपाल/इंडोनेशिया से 50 किग्रा0-100किग्रा0 बोरी में मंगाते हैं। दिल्ली-कोलकाता में। होलसेलर दाना साइज, मुख के हिसाब से छांटते हैं। 5 मुखी 10-50, एक मुखी 50 हजार रिटेलर/पूजा दुकान मंदिर के पास, ज्योतिषी, बाबा लोग बेचते हैं। सबसे ज्यादा मार्जिन यहीं होता है। नकली बहुत है। प्लास्टिक, लकड़ी को रंगा हुआ बेच देते हैं। सरकारी रेट नहीं है सब डिमांड पर है। नेपाल वाला महंगा, इंडोनेशिया वाला सस्ता होता है। अब युवा लोग फैशन व एंग्जायटी के लिए भी पहन रहे हैं। इसलिए 3-5 मुखी की डिमांड बढ़ी है। भारत में रुद्राक्ष का व्यापार 1000 करोड़ का है। ज्यादातर इंडोनेशिया-नेपाल से आता है। हरिद्वार, वाराणसी, नासिक हब हैं। श्रावण और शिवरात्रि पीक सीजन होते है। बाजार में 70 प्रतिशत रुद्राक्ष मिलावटी/नकली होते है। ये 7 टेस्ट घर पर कर सकते हैंः मुख गिनती’ असली में मुख/लाइनें ऊपर से नीचे तक साफ जाती हैं। नकली में पेन से खुरच कर बनाई होती हैं, बीच में टूट जाती हैं। छेदः असली का छेद प्राकृतिक होता है, अंदर से काला और रफ। नकली में ड्रिल मशीन से साफ-सुथरा छेद।दानेरू असली रुद्राक्ष हल्का खुरदुरा होता है। प्लास्टिक/लकड़ी वाला एकदम चिकना या बहुत ज्यादा चमकदार। पानी में डुबो टेस्टः असली रुद्राक्ष पानी में डूब जाता है। प्लास्टिक/हल्की लकड़ी वाला उतराता है। उबाल टेस्टः 10 मिनट पानी में उबालो। असली का रंग नहीं निकलेगा। नकली का रंग उतर जाएगा और पानी काला हो जाएगा। नारियल टेस्टः असली रुद्राक्ष को नारियल पानी में 24 घंटे रखो। पानी का रंग नहीं बदलेगा और रुद्राक्ष पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।तांबे का सिक्का टेस्टरू रुद्राक्ष के ऊपर तांबे का सिक्का रखकर घुमाओ। असली में सिक्का अपने आप घूमता है – ऊर्जा के कारण। नकली में नहीं घूमेगा। एक मुखी, 14 मुखी, गौरी-शंकर में सबसे ज्यादा फर्जीवाड़ा। हमेशा लैब सर्टिफिकेट मांगें।

रुद्राक्ष सिर्फ धार्मिक चीज नहीं है
रुद्राक्ष सिर्फ धार्मिक चीज नहीं है। इसके पीछे साइंस भी है। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्डः रिसर्च में पाया गया कि रुद्राक्ष में ‘डायइलेक्ट्रिक प्रॉपर्टी’ होती है। ये शरीर की बायो-इलेक्ट्रिक एनर्जी को स्टेबल करता है। हार्ट रेट व बीपी कंट्रोलः बीएचयू बनारस की कुछ स्टडी में देखा गया कि 5 मुखी रुद्राक्ष पहनने से हार्टबीट और बीपी नॉर्मल होता है। स्ट्रेस हार्माेन कोर्टिसोल कम होता है। रुद्राक्ष हवा से नेगेटिव आयन छोड़ता है। जैसे झरने के पास खड़े होने पर फ्रेश फील होता है, वैसा ही। रुद्राक्ष की सतह पर खांचे/मुख होते हैं। जब ये स्किन को टच करता है तो एक्यूप्रेशर पॉइंट दबते हैं। इससे नर्व शांत होती है। मेडिटेशन में पहनने से अल्फा वेव बढ़ती हैं। इसलिए साधु-संत इसे पहनते हैं। कुछ लोगों में इन्सोम्निया में फायदा देखा गया है। रुद्राक्ष के दाने में ’कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन’ 50.81 प्रतिशत – ऑर्गेनिक कंपाउंड, ’एल्युमिनियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम’ हड्डी और नर्व के लिए लाभदायक होते हैं। ’कॉपर, जिंक, कोबाल्ट’ इम्यूनिटी बढ़ाते हैं। ’एल्कलॉइड व टैनिन’ एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी होते हैं। इस वजह से आयुर्वेद में रुद्राक्ष को पीसकर दवा में भी इस्तेमाल करते थे। अलग-अलग मुख का साइंटिफिक लॉजिक भी है। हर मुख की लाइन एक ‘वाइब्रेशन पैटर्न’ बनाती है। एक मुखी सबसे हाई फ्रीक्वेंसी फोकस के लिए मुफीद होता है। पांच मुखी सबसे कॉमन है। हार्ट और बीपी के लिए बैलेंस बनाता है। सात मुखी लंग्स और श्वास से जुड़ा होता है। इसे ‘पाईजोइलेक्ट्रिक इफेक्ट’ भी बोलते हैं। दबाव से करंट बनना है। पर्यावरण वाला महत्व- बड़ा रुद्राक्ष का पेड़ साल में 200 किग्रा0 व ऑक्सीजन देता है। जड़ों से भूस्खलन रुकता है। हिमालय में इसीलिए उगाया जाता हैै। रुद्राक्ष को पानी में डालने से बैक्टीरिया कम होते हैं। पुराने समय में कुएं में डालते थे। बीएचयू आईआईटी की स्टडी में आया कि रुद्राक्ष पहनने से ईईजी में ब्रेन वेव शांत होती हैं। रुद्राक्ष कोई चमत्कार नहीं है। ये तनाव कम करने व नर्व शांत करने और फोकस बढ़ाने का टूल है। दवा की जगह नहीं ले सकता। नेचुरल बायो-फीडबैक डिवाइस। शरीर की एनर्जी, बीपी, स्ट्रेस को बैलेंस करता है व पर्यावरण के लिए भी अच्छा है।

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