डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी
लखनऊ। सायरन की आवाज, धुंआ, और फिर प्रेस नोट। पिछले 9 साल में उत्तर प्रदेश ने ‘मुठभेड़’ शब्द को इतना सुना कि अब वो डर नहीं, दिनचर्या लगने लगा है। कथित तौर पर 17043 बार पुलिस और अपराधी आमने-सामने आए। 299 ढेर हुए। 3700 करोड़ की संपत्ति कुर्क हुई। 5000 बार बुलडोजर गरजा। सरकार कहती है ये ‘जीरो टॉलरेंस’ है।
पर उसी UP की गलियों में हर रोज 10 लाशें उठती हैं। हर दिन 9 से 10 बेटियों की चीख FIR में दर्ज होती है। महिला अपराध में प्रदेश आज भी देश में नंबर 1 है।
तो सवाल सीधा है: इतने ढोल पीटने के बाद भी सड़क पर सन्नाटा क्यों नहीं है? आंकड़ा चमकता है, पर हकीकत छलनी है।
पोस्टर बड़े, जमीन छोटी
2017 से 2026 तक योगी सरकार ने अपराध के खिलाफ जंग का पूरा पोस्टर छपवा दिया। सरकारी फिगर गवाही दे रहे हैं – 34265 गिरफ्तार, 16923 गोली से घायल, 49000 लोगों पर गैंगस्टर एक्ट। माफियाओं की बेनामी 3700 करोड़ की प्रॉपर्टी कुर्क। गैंगस्टर और गुंडा एक्ट के तहत हजारों अवैध निर्माण जमींदोज। मंचों से ऐलान हुआ कि अब UP में माफिया राज खत्म। लेकिन NCRB का आईना दूसरा सच उगलता है। 2023 में 3209 बलात्कार, 2024 में 3516। मतलब हर दिन 9 से 10 बेटियां। 2025 का आंकड़ा सरकार ने जारी ही नहीं किया। छुपाने से सच मर नहीं जाता। महिला अपराध, दहेज उत्पीड़न, अपहरण के मामलों में UP लगातार टॉप-3 में बना हुआ है। हत्या, लूट, फिरौती के आंकड़े भी रोजाना की हेडलाइन हैं।
थाने से अदालत तक का खेल
ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। इसके पीछे एक सिस्टम है। जमीन कब्जा, लूट, चोरी, छिनौति, साइबर ठगी का बाजार रोज लगता है। पीड़ित थाने पहुंचे तो पहले ‘सौदा’ तय होता है। FIR लिखी गई तो विवेचना की फाइल 3 महीने में कोर्ट नहीं पहुंचती। पहुंच भी जाए तो गवाह मुकर जाते हैं, सबूत गायब हो जाते हैं। नतीजा – सजा का प्रतिशत 10% से भी कम। पुलिस अफसर खुद मानते हैं कि दबाव में कार्रवाई होती है। मुठभेड़ के बाद फोटो वायरल, प्रेस कॉन्फ्रेंस। पर उसके बाद चार्जशीट कमजोर। अदालत में केस धराशायी। अपराधी जमानत पर बाहर और फिर वही धंधा।
बुलडोजर का दोहरा चरित्र
3700 करोड़ की कुर्की हुई। तस्वीरें आईं। पर कुर्की किसकी? ज्यादातर छोटे माफिया, भू-माफिया के गुर्गे, पुराने केसों के आरोपी। जो हर सरकार में रंग बदलकर मंत्री-विधायक के करीब रहते हैं, उनकी कोठियों पर बुलडोजर का तेल खत्म हो जाता है। गरीब की झोपड़ी ‘अवैध’ हो जाती है, पर सत्ता से जुड़े प्लॉट ‘नियमित’ हो जाते हैं। गैंगस्टर एक्ट भी चयनात्मक हथियार बन गया है। लगेगा तो रिक्शा वाले पर, नीलाम होगी तो छोटे दुकानदार की दुकान। पर ‘इच्छाधारी मठाधीश’ आज भी टेंडर, ट्रांसफर और थाने की पोस्टिंग का रेट तय कर रहे हैं।
प्रचार की जीत, विवेचना की हार
असली बीमारी यही है। मुठभेड़ का प्रचार ज्यादा, विवेचना जीरो। गिरफ्तारी का वीडियो ज्यादा, फोरेंसिक जांच नदारद। साइबर सेल है, पर साइबर ठगी रुक नहीं रही। महिला हेल्पलाइन है, पर रात 9 बजे के बाद लड़कियां अकेले नहीं निकलतीं। जब तक ‘आरोपी ही जांच अधिकारी’ का खेल बंद नहीं होगा, जब तक थाने-तहसील में दलालों का राज चलेगा, तब तक 17000 मुठभेड़ और 5000 बुलडोजर भी ‘ढाक के तीन पात’ साबित होंगे। अपराध का डर तब खत्म होगा जब जनता को थाने में इंसाफ मिलेगा, न कि सोशल मीडिया पर।
जनता का सवाल: गांव से शहर तक एक ही सवाल गूंज रहा है – योगी जी, बुलडोजर से मकान गिरता है या अपराध का हौसला? अगर अपराध सच में घटा होता तो हर रोज 10 लाशें न गिरतीं, हर दिन 10 बहन-बेटियों की इज्जत न लुटती। स्कूल-कॉलेज जाने वाली बेटियों के अभिभावक अब भी डरे हुए हैं। व्यापारी रंगदारी से परेशान है। किसान जमीन कब्जे से त्रस्त है। आंकड़ों की पट्टी आंख पर बांधकर ‘रामराज्य’ का नारा मत लगाइए। पहले थाना सुधारिए, विवेचना को राजनीति से मुक्त कीजिए, सजा का प्रतिशत बढ़ाइए। वरना मुठभेड़ और कुर्की सिर्फ अखबार की सुर्खी और चुनावी भाषण की लाइन बनकर रह जाएगी। UP को ढोल नहीं, दवा चाहिए। वरना अगला आंकड़ा भी यही चीखेगा: शोर बहुत, सुरक्षा जीरो।
यूपी में जीरो टॉलरेंस की सरकार, हर दिन 10 महिलाओं के साथ होता बलात्कार
