सांपों का खूनी खेल, सात माह में 205 लोगों को डसा…पांच की मौत

सांपों का खूनी खेल, सात माह में 205 लोगों को डसा…पांच की मौत

लखनऊ। बरसात शुरू होते ही जिले में सर्पदंश के मामले बढ़ने लगे हैं। मैनपुरी के जिला अस्पताल में जनवरी से अब तक 205 सर्पदंश पीड़ित इलाज के लिए पहुंचे। इनमें से 31 मामले जुलाई के हैं। समय पर एंटी स्नेक वेनम (एएसवी) लगने से 29 मरीजों की जान बच गई। देर से पहुंचे एक मरीज की मौत हुई। जिले में जनवरी से लेकर 15 जुलाई तक तक अलग-अलग स्थानों पर 205 लोगों को सर्प ने डसा है। अस्पताल पहुंचने पर समय से एंटी स्नेक वेनम और इलाज मिलने के कारण ये सभी लोग ठीक हुए हैं। जबकि पांच लोग ऐसे हैं जो समय से अस्पताल न पहुंचने के कारण काल के गाल में समा गए हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में जिले में सर्पदंश के 255 मामले स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचे। इनमें से 13 लोगों की मौत हुई थी। इस वर्ष अब तक पांच लोगों की मौत हो चुकी है। उन लोगों की जान बचाई गई है जो समय से अस्पताल पहुंचे हैं। मौत होने वाले लोगों में वे लोग शामिल हैं जिनके परिजन पहले झाड़-फूंक में पड़े रहे और देर से अस्पताल पहुंचे। सीएमओ डॉ. आरसी गुप्ता ने बताया कि जिले में सर्पदंश के उपचार की पर्याप्त व्यवस्था है। प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और जिला अस्पताल में एंटी स्नेक वेनम उपलब्ध है। लोगों से अपील की गई है कि सर्पदंश के मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाएं, ताकि उसकी जान बचाई जा सके। डॉक्टरों का कहना है कि जिन लोगों की जान बचाई गई, वे समय रहते अस्पताल पहुंच गए थे। वहीं, जिन लोगों की मौत हुई, उनके परिजन पहले झाड़-फूंक में उलझे रहे और अस्पताल पहुंचने में देरी हो गई। सांप डसने पर तुरन्त ये करें- मरीज को शांत रखें और तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। जिस अंग पर सांप ने काटा है, उसे स्थिर रखें और हिलाएं नहीं। काटने का समय याद रखें और चिकित्सक को बताएं। चिकित्सकीय सलाह पर एंटी स्नेक वेनम लगवाएं। ऐसा करने से बचें- झाड़-फूंक या तांत्रिक के पास जाने में समय बर्बाद न करें। सर्पदंश वाली जगह पर चीरा न लगाएं। मुंह से जहर निकालने की कोशिश न करें। प्रभावित स्थान पर कपड़ा या रस्सी न बांधें। बर्फ, मिट्टी, तेल, मिर्च, हल्दी या कोई घरेलू लेप न लगाएं।
उत्तर प्रदेश में हर वर्ष मानसून के साथ सर्पदंश के मामलों में तेज़ वृद्धि होती है। खेतों, जलभराव वाले क्षेत्रों, जंगलों और कच्चे घरों के आसपास रहने वाली आबादी सबसे अधिक प्रभावित होती है। राज्य सरकार ने 2018 में सर्पदंश को राज्य आपदा घोषित किया था, जिससे पीड़ित परिवारों को राहत देने और इस समस्या पर संस्थागत ध्यान बढ़ाने का प्रयास किया गया। उत्तर प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जहां सर्पदंश के सबसे अधिक मामले और मौतें दर्ज होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मौतें समय पर अस्पताल न पहुंच पाने, झाड़-फूंक और इलाज में देरी के कारण होती हैं। सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं? उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूपीएसडीएमए) के अनुसार 2018-2022 की अवधि में सर्पदंश से लगभग 2,018 मौतें दर्ज की गईं। वर्षवार आंकड़ों में मानसून के दौरान मौतों में उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई देती है। सबसे अधिक प्रभावित जिले यूपीएसडीएमए के जोखिम विश्लेषण के अनुसार प्रमुख हॉटस्पॉट जिले हैं। सोनभद्र, फतेहपुर, उन्नाव, बाराबंकी, हरदोई और इनके अलावा पीलीभीत, आज़मगढ़, गोंडा, महोबा, प्रतापगढ़, बांदा, बलिया और कौशांबी सहित कई जिलों में भी लगातार अधिक मौतें दर्ज हुई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बरसात में खतरा अधिक बढ़ता है, बारिश में सांप बिलों से बाहर निकलते हैं। खेतों में धान की रोपाई के दौरान किसानों का संपर्क बढ़ता है। जलभराव और झाड़ियों में सांपों का ठिकाना बन जाता है। रात में बिना रोशनी के चलना जोखिम बढ़ाता है। इसी कारण जून से सितंबर के बीच मामलों में सबसे अधिक वृद्धि देखी जाती है। मौतों के प्रमुख कारण है कि जांच और चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार- झाड़-फूंक और अंधविश्वास पर भरोसा। अस्पताल पहुंचने में देरी। प्राथमिक स्तर पर प्रशिक्षित स्टाफ की कमी। ग्रामीण क्षेत्रों से एम्बुलेंस या परिवहन में विलंब। कई पीएचसी/पीएचसी में तत्काल विशेषज्ञ उपचार की सीमित उपलब्धता। समय पर एंटी स्नेक वेनम (एएसवी) मिलने पर अधिकांश जानें बचाई जा सकती हैं। राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने जिला अस्पतालों में एंटी स्नेक वेनम उपलब्ध कराने की व्यवस्था की। डॉक्टरों के प्रशिक्षण पर जोर दिया। राष्ट्रीय सर्पदंश रोकथाम एवं नियंत्रण कार्ययोजना (एनएपीएसई) के अनुरूप जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए। सर्पदंश को राज्य आपदा घोषित कर राहत व्यवस्था लागू की। ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी कई समस्याएं बनी हुई हैं। कई लोग पहले ओझा या झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं। सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 24×7 प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं होता। कई गांवों से जिला अस्पताल की दूरी अधिक है। समय पर रेफरल व्यवस्था हर जगह समान रूप से प्रभावी नहीं है। विशेषज्ञों के सुझाव में हर सीएचसी और पीएचसी में पर्याप्त एएसवी उपलब्ध हो। आशा कार्यकर्ताओं और ग्रामीण स्वास्थ्यकर्मियों को नियमित प्रशिक्षण दिया जाए। मानसून से पहले गांव-गांव जागरूकता अभियान चलाया जाए। एम्बुलेंस प्रतिक्रिया समय कम किया जाए। सर्पदंश का डिजिटल राज्यव्यापी डेटा पोर्टल बनाया जाए। पत्रकारिता के लिए प्रमुख सवाल ये है कि क्या सभी जिला अस्पतालों में पर्याप्त एएसवी उपलब्ध है? कितने सीएचसी और पीएचसी में 24 घंटे उपचार की सुविधा है? पिछले पांच वर्षों में जिलेवार कितनी मौतें हुईं? कितने मामलों में अस्पताल पहुंचने में दो घंटे से अधिक समय लगा? क्या राहत राशि सभी पात्र परिवारों को समय पर मिली? उत्तर प्रदेश में सर्पदंश केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन का भी मुद्दा है। राज्य सरकार ने सर्पदंश को राज्य आपदा घोषित करने, एंटी स्नेक वेनम की उपलब्धता बढ़ाने और जागरूकता कार्यक्रम चलाने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके बावजूद हर मानसून में होने वाली मौतें यह संकेत देती हैं कि समय पर उपचार, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती और अंधविश्वास के खिलाफ जन-जागरूकता पर अभी और व्यापक काम करने की आवश्यकता है। यदि समय पर मरीज अस्पताल पहुंचे और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा एंटी स्नेक वेनम दिया जाए, तो विशेषज्ञों के अनुसार सर्पदंश से होने वाली बड़ी संख्या में मौतों को रोका जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *