रियल मीडिया नेटवर्क
भरुआ सुमेरपुर। आजादी के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष मे देशभक्तों की भूमिका के मद्देनजर वर्णिता संस्था के तत्तावधान मे विमर्श विविधा के अन्तर्गत जिनका देश ऋणी है के तहत सत्तावनी समर के एक बेजोड़ सूरमा रामचन्द्र पान्डुरंग राव तात्या टोपे की पुण्यतिथि पर संस्था के अध्यक्ष डा। भवानीदीन ने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुये कहा कि तात्या टोपे सही मायने में मां भारती के एक बेजोड़ सपूत थे। उनका सरफरोशो के लिये प्रसिद्ध प्रेरणादायक मंत्र सन्देश था, पढो और फिर आगे बढो। बुन्देली धरा मे उनकी जीवटता को देखते हुये उन्हें बुन्देलखण्ड का शेर भी कहा जाता था। इनके जन्म को लेकर मतभिन्नता है। इनका जन्म 1814 में महाराष्ट्र के एक गांव येवलकर में हुआ था। इन्होंने सत्तावनी समर मे जिस पुरोधत्व का परिचय दिया, वह बेमिसाल था। उस समय तात्या शब्द स्नेह का प्रतीक था और बाजीराव पेशवा ने इन्हें एक टोपी दी थी। जिसके कारण ये टोपे कहलाने लगे। इनकी बहादुरी और रणनीति मे इनका कोई जोड़ नहीं था। इन्होंने कई गोरे सेनापतियों, कैप्टन, जनरलों को हराया था। जब सत्तावनी समर समाप्ति की ओर था, तब भी ये एक वर्ष तक समरदीप को जलाये रखे। इनके साथ भितरघात होने पर इन्हें सोते समय गिरफ्तार करवा दिया गया। 18 अप्रैल 1859 मे पैतालिस वर्ष की उम्र मे इनको फांसी पर लटका दिया गया। इनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। कार्यक्रम मे सिद्धा, बाबूलाल, प्रेम, संतोष, महावीर, होरीलाल, विकास, अमित, आशुतोष, रिचा, दस्सी, अजय आदि शामिल रहे।

