विद्यासागर त्रिपाठी
जंतर मंतर दिल्ली में तथाकथित नीट छात्र आन्दोलन की बात हो य श्रीराम मंदिर अयोध्या में चढ़ावा चोरी प्रकरण रहा हो,सम्पूर्ण भारत ने वर्तमान के उपरोक्त दोनों मामलों को भारत की सम्पूर्ण जनता इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,प्रिंटमीडिया एवं सोशल मीडिया जैसे सूचना तंत्रों के माध्यम से भली भांति देख व समझ रही है। अभिव्यक्ति की आजादी सबको है,किसी विषय विशेष पर शान्तिपूर्ण आन्दोलन करना सबका लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन क्या आन्दोलन में सम्मिलित किसी भी छात्र/छात्रा अथवा व्यक्ति विशेष को देश के सर्वाेच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों की निजता का हनन करने का अधिकार भारत का संविधान किसी को देता है क्या? भारत का संविधान किसी आन्दोलन कारी को राष्ट्रीय धन सम्पत्ति को क्षति पहुंचाने का अधिकार देता है क्या? भारतीय संविधान किसी आन्दोलन कारी को संवैधानिक नियमावली को दरकिनार करके भारत के राष्ट्रीय संस्थाओं को बंधक बनाने का अधिकार देता है क्या? जंतर-मंतर आन्दोलन में उपरोक्त सभी संवैधानिक मान्यताओं को दर किनार करके जंतर मंतर से लेकर संसद भवन तक अराजकता एवं उग्रता फैलाने का कुकृत्य किया गया था।
श्रीराम मंदिर अयोध्या में चढ़ावा चोरी हुई,इसे कोई नकार नहीं रहा, चढ़ावा चोरी होने की जानकारी होते ही श्रीराम जन्मभूमि न्यास ने स्वयं संज्ञान लेते हुए उ.प्र. सरकार से एसआईटी गठित करके जांच कराने की मांग की और उप्र. सरकार ने बिना कोई विलम्ब किए एसआईटी गठित करके जांच प्रारम्भ कराई तथा प्रारम्भिक जांच में सामने आये चढ़ावा चोरों पर एफआईआर दर्ज करवा कर गिरफ्तारी भी करवायी। जांच चल रही थी लेकिन विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ और वह सर्वाेच्च न्यायालय पहुंच गया, सर्वाेच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया और अपने दिशानिर्देश पर नई एसआईटी गठित करके जांच शुरू करवा दी है फिर भी विपक्ष संतुष्ट नहीं है। संसद सदन से लेकर संसद के बाहर परिसर में नित नए प्रयोग करके संसद को शर्मसार किया जा रहा है।
वर्तमान समय में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के अनुसार लोकसभा में मानसून सत्र चल रहा है लेकिन विपक्ष जंतर-मंतर के आन्दोलन एवं श्रीराम जन्मभूमि मंदिर अयोध्या चढ़ावा चोरी दोनों घटनाक्रमों को लेकर संसद सत्र को चलने देने में बाधा बनकर खड़ा है। भारतीय संसद में सम्पूर्ण भारत की मूलभूत सुविधाओं समस्याओं आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति हेतु नीति निर्धारण करने का राष्ट्र मंदिर है। क्या वर्तमान भारत में जंतर-मंतर आन्दोलन दिल्ली एवं श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी अयोध्या के अलावा राष्ट्रहित के कोई अन्य मुद्दे हैं ही नहीं? जिनकी जनहित में संसद में चर्चा करने की आवश्यकता हो? देश के कई क्षेत्रों में लोग अतिवृष्टि से परेशान हैं एवं कई क्षेत्र बाढ़ जैसी विभीषिका से झेल रहे हैं। जहां अत्यन्त गम्भीर परेशानियां उत्पन्न हैं। क्या ऐसी आपदा में वहां की चिंता करते हुए संसद में प्रश्नकाल के समय सरकार को घेरना उचित नही है? सांसदों को प्रश्नकाल में कोई भी प्रश्न करने का पूर्ण अधिकार है, तथा सरकार उनके सभी प्रश्नों पर जबाव देने के लिए संसदीय नियमों के तहत बाध्य है। फिर विपक्ष प्रश्नकाल में चर्चा क्यों नहीं करता है? संसद के अन्दर और बाहर सिर्फ उपरोक्त दो मुद्दों पर ही हो हल्ला और शोर के साथ तरह तरह के नाटकीय आडंबर करके संसद के इस अति महत्वपूर्ण मानसून सत्र को अपनी हठधर्मिता की बाढ़ में धोये दे रहा है।
श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी में जितना चढ़ावा चोरी अब तक सामने आ पाया है उससे अधिक तो लोकसभा के मानसून सत्र में अपव्यय होता दिखाई दे रहा है लेकिन उसकी कोई भी चिंता विपक्ष को नहीं है। देश के कई अहम बिल इस शोरशराबे में बिना चर्चा प्रतिचार्चा के सरकार ने पास करा लिए हैं, देश का आम जन नहीं जान सका कि उन बिलों में क्या अच्छा है और क्या बुरा है। आगे एफसीआरए संसोधन बिल एवं महिला डी-लिमिटेशन बिल भी संसद में पेश हो सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस संसद के मानसून सत्र में सबसे अधिक महत्वपूर्ण बिल एफसीआरए बिल ही है जिसे विपक्षी संसद किसी भी दशा में पारित नहीं होने देना चाहते। संसद में वर्तमान हल्ला बोल के पीछे का प्रमुख बिन्दु ही यही बिल है, जिसे अमेरिका जैसी विदेशी शक्ति अपनी संसद से विरोध कर रही है। भारत की अलगाववादी शक्तियां इसको पारित होते देखना नहीं चाहती हैं। सत्य कारण क्या है सिर्फ पैसा ! इस बिल के पारित होने पर विभिन्न एंजियोज में आने वाला विदेशी धन राष्ट्रद्रोहियों व धर्मांतरण कराने वाली संस्थाओं को नियंत्रित करेगा। जो अलगाववादी शक्तियों और धर्मांतरण का खेल खेलने वाली संस्थाओं को कतई बर्दाश्त नहीं है और विपक्ष उनके साथ खड़ा है। इस सत्य का अगले हफ्ते पर्दा उठेगा।
धीरे धीरे अब प्रत्येक नागरिक को यह समझ में आता जा रहा है कि देश के अंदर ही ऐसे तत्व पैदा हो गए हैं जो भारत में किसी लोकप्रिय एवं स्थिर सरकार को रहने देना ही नहीं चाहते हैं, वो भारत में शांतिपूर्ण वातावरण कतई नहीं देखना चाहते। उनके लिए भारत एक भूमि का टुकड़ा है जिसे मात्र एक सीमा रेखा से रेखांकित करके बना दिया गया है,उन्हें देश के टुकड़े हो जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि अपने स्व लाभ के लिए वह लोग किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। जिनके विचारों में ‘‘भारत माता’’ की अवधारणा ही नहीं है। राष्ट्रधर्म के प्रति कोई अहसास नहीं है, राष्ट्रीय पहचान के लिए भी कोई आदर भाव नहीं है, राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत गाने में उत्साह नहीं, राष्ट्रीय प्रतीकों एवं सांस्कृतिक धर्म स्थलों का सम्मान करना उनकी विचारधारा में सम्मिलित नहीं है, तो फिर राष्ट्र रक्षा करने की उम्मीद उनसे करना सिर्फ दिवा स्वप्न देखता ही है।
जिन्हे भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के वर्तमान तीनों स्तम्भ अब स्वीकार नहीं हैं, देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुनी हुई सरकार अर्थात विधायिका उन्हें स्वीकार नहीं है, साथ में कार्यपालिका अर्थात प्रशासनिक अधिकारीयों और पुलिस प्रशासन जैसी कार्यपद्धति स्वीकार नहीं। न्यायपालिका में सर्वाेच्च न्यायालय जैसी संस्थाओं के दिशानिर्देश भी उन्हें स्वीकार नहीं हैं। चुनाव आयोग एवं सीबीआई जैसी स्वायत संस्थाएं उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती हैं वो कभी पाकिस्तान के हितों की बात करते हैं, कभी चाइना की प्रशंसा करते हैं, कभी अमेरिकी टूल किटों के सहारे देश को बदनाम करने का कुत्सित प्रयास करते हैं। बांगलादेश, नेपाल एवं श्रीलंका,की तर्ज पर भारत में भी जेन-जी को उकसाकर उन्हें सड़कों पर लाकर अराजकता फैलाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिसके एक पार्ट के ही रूप में जंतर मंतर के आन्दोलन को समर्थन दिया जा रहा है। संविधान के रक्षक बनने का दावा करने वाले संविधान को किनारे रखकर देश को अराजकता की आंधी में झोंक देना चाहते हैं। जिसकी डोर को भारत से बाहर बैठा व्यक्ति पकड़े है। जिसकी खुली घोषणा वो बहुत पहले कर चुका है। अब इस लुका छिपी के खेल में भारतीय संविधान को विजयी होगा, अथवा विदेशी शक्तियों के मंसूबे पूरे होंगे अंततः इसका निर्णय भारत के नागरिकों एवं युवा वर्ग जेन-जी को ही तै करना पड़ेगा।
संसद में हल्ला बोल एफसीआरए संसोधन बिल रोको डी-लिमिटेशन है?
