आह्वान तभी प्रभावी होता है, जब उदाहरण भी साथ दे

— उमेश खंडेलिया
धेमाजी, असम

वर्तमान विश्व की अस्थिर राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत तुलनात्मक रूप से अधिक संगठित और स्थिर स्थिति में खड़ा दिखाई देता है। युद्धजनित संकट, वैश्विक मुद्रास्फीति, ईंधन संकट और आर्थिक अनिश्चितता के तीव्र प्रभावों के बावजूद भारत ने जिस धैर्य और रणनीतिक कुशलता के साथ अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखा है, उसके पीछे देश के प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाली सोच की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रधानमंत्री समय-समय पर देशवासियों से सोने की अत्यधिक खरीद से बचने, ईंधन की बर्बादी कम करने, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण रखने और संयमित जीवनशैली अपनाने का आह्वान करते रहे हैं। निस्संदेह, यह राष्ट्रहित की दृष्टि से अत्यंत समयोचित और दूरदर्शी सोच है।

किसी देश की शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता, आधुनिक तकनीक या विशाल अर्थव्यवस्था से निर्धारित नहीं होती। किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों के अनुशासन, आत्मसंयम और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना में निहित होती है। जब कोई देश कठिन परिस्थितियों से गुजरता है, तब प्रत्येक नागरिक का भी कर्तव्य बनता है कि वह अपने व्यक्तिगत जीवन में संयम अपनाए। यदि ईंधन की बर्बादी कम होती है, अनावश्यक आयात घटता है और विलासिता पर नियंत्रण स्थापित होता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव सीधे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए यह आह्वान महज एक सामान्य सरकारी सलाह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी की भावना का हिस्सा है।

इतिहास हमें एक और गहरी सच्चाई का स्मरण कराता है— “उपदेश से अधिक प्रभावशाली उदाहरण होता है।” शब्द किसी व्यक्ति को कुछ समय के लिए प्रेरित कर सकते हैं, लेकिन आचरण स्थायी संस्कार का निर्माण करता है। जब नेतृत्व स्वयं सादगी, मितव्ययिता और संयम का जीवंत उदाहरण बनता है, तब समाज स्वाभाविक रूप से उसका अनुसरण करने लगता है। महात्मा गांधी का प्रभाव केवल उनके भाषणों तक सीमित नहीं था; उनकी सरल जीवनशैली ने लोगों के मन में गहरी नैतिक शक्ति का संचार किया था। लाल बहादुर शास्त्री ने “जय जवान, जय किसान” का आह्वान करने के साथ-साथ कठिन समय में स्वयं उपवास रखकर देशवासियों के साथ एकात्मता व्यक्त की थी। यही कारण है कि उनका आह्वान आज भी जनता के हृदय में जीवंत है।

वर्तमान परिस्थितियों में जब आम नागरिकों से ईंधन के उपयोग को सीमित करने, मितव्ययिता अपनाने और अपव्यय से दूर रहने का आह्वान किया जा रहा है, तब स्वाभाविक रूप से जनता भी सरकारी आयोजनों को उसी कसौटी पर परखना चाहेगी। पश्चिम बंगाल में नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह, गुजरात में विशाल रोड शो अथवा असम सहित विभिन्न राज्यों में आयोजित भव्य सरकारी कार्यक्रमों में सैकड़ों वाहनों का उपयोग, लंबे वीआईपी काफिले और बड़े पैमाने पर संसाधनों का इस्तेमाल होना जागरूक नागरिकों के मन में सवाल पैदा करे, तो यह स्वाभाविक है।

निश्चित रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था में शपथ ग्रहण समारोह, अतिथि-सत्कार और जनसंपर्क कार्यक्रमों का अपना महत्व है। ये आयोजन राज्य और राष्ट्र की गरिमा बढ़ाने में भी भूमिका निभाते हैं। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में क्या इन कार्यक्रमों का आयोजन अधिक सरल, संयमित और खर्च-सचेत तरीके से नहीं किया जा सकता? सीमित वाहनों का उपयोग, नियंत्रित खर्च और अनावश्यक आडंबर में कमी के माध्यम से जनता के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करना क्या संभव नहीं है? या क्या इसकी वास्तव में आवश्यकता नहीं थी?

सोशल मीडिया पर बार-बार उठाए जा रहे ये सवाल केवल आलोचना का विषय नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय भी हैं। क्योंकि जब एक सामान्य नागरिक ईंधन बचाने के लिए अपनी यात्राएं सीमित करता है, एक मध्यमवर्गीय परिवार सोने की खरीद को टालता है और किसान बढ़ती लागत के दबाव में संघर्ष करता है, तब नेतृत्व से भी उसी संवेदनशीलता की अपेक्षा करना अस्वाभाविक नहीं है। लोकतंत्र केवल अधिकारों की व्यवस्था नहीं है; यह साझा जिम्मेदारी और सामूहिक उत्तरदायित्व की संस्कृति भी है।

वास्तव में “सुधार स्वयं से शुरू हो” केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि सुशासन का मूलमंत्र भी है। यदि सत्ता में बैठे लोग स्वयं संयम और सादगी का आदर्श प्रस्तुत करें, तो उसका नैतिक प्रभाव करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है। सादगीपूर्ण शपथ ग्रहण समारोह, सीमित वाहनों का उपयोग और अनावश्यक आडंबर से परहेज—सरकारी व्यवस्था में ये कदम भले ही छोटे दिखाई दें, लेकिन समाज पर इनका प्रभाव अत्यंत दूरगामी हो सकता है। तब जनता महसूस करेगी कि त्याग और अनुशासन केवल आम लोगों के लिए नहीं, बल्कि नेतृत्व के लिए भी समान रूप से लागू होते हैं।

आज आवश्यकता है कि हम समर्थन और विरोध की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर एक सामूहिक राष्ट्रीय चेतना का विकास करें। देशहित में प्रधानमंत्री के आह्वानों को ईमानदारी से स्वीकार करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

इसी के साथ शासक वर्ग के लिए भी यह आदर्श स्थापित करने का समय है। क्योंकि एक मजबूत और सशक्त राष्ट्र केवल नीतियों से नहीं, बल्कि आचरण, संवेदनशीलता और सामूहिक अनुशासित प्रयासों के आधार पर निर्मित होता है।

जब सशक्त सरकार और नागरिक समाज मिलकर संयम, सादगी और जिम्मेदारी के मार्ग पर आगे बढ़ेंगे, तब हमारा भारत केवल आर्थिक रूप से ही मजबूत नहीं होगा, बल्कि विश्व के सामने नैतिक नेतृत्व का एक उदाहरण भी प्रस्तुत कर सकेगा।

यही समय की मांग है, यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही सच्चे राष्ट्रधर्म की पहचान है।

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