भारत लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला देश है,लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश की जनता स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार से सांसद चयन करती है,विधायक चयन करती है, जनता द्वारा चयनित किए गए सांसदों एवं विधायकों में से ही बहुमत हासिल करने वाले दल केन्द्र व प्रदेश में सरकार बनाने हैं जो सत्ता पक्ष कहलाता है, तथा अल्पमत में आया दल विपक्ष कहलाता है, सत्ता पक्ष का संवैधानिक दायित्व देश की जन भावनाओं के आधार पर जनता की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना,जन समस्याओं का निराकरण करना,जनहित के कार्य करना व राष्ट्रीय उत्थान के लिए कार्य करना होता है ।
दूसरी ओर सरकार के विपक्षी दल का नैतिक व संवैधानिक दायित्व है कि यदि देश की सत्तारुढ़ सरकार अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वाहन पर कोई चूक कर रही है, किसी तरह से जनता के साथ कोई पक्षपात कर रही है,जनता की मूलभूत सुविधाओं और समस्याओं से मुंह मोड़कर निजी लाभ कमाना चाहती है,जनहित और राष्ट्रीय उत्थान के कार्यों को कर पाने में अक्षम साबित हो रही है तो सत्तारूढ़ सरकार को उनकी असफलताओं के बारे में विपक्ष उन्हें सचेत करे, विपक्ष अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए उचित फोरम पर सरकार से गम्भीरता पूर्वक चर्चा प्रति चर्चा करे ! इतना सब करके भी यदि सत्ता पक्ष ध्यान न दें तो संबंधित विषय को देश की आमजनता के बीच ले जाकर जनता में जनजागरण का काम विपक्ष करें तथा जनता को साथ लेकर जनान्दोलन करे,जिससे सत्तारूढ़ सरकार की विफलताएं जन जन पहुंच सकें और विपक्ष के लिए वो भविष्य में सफलता की राह आसान कर सकें ।
मेरी समझ से तो देश के मतदाता और जनता को तब अत्यन्त प्रशन्नता होगी जब देश का सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पक्ष सार्थक और संवैधानिक मर्यादाओं में रहकर तार्किक बहस करें,जिससे राष्ट्रहित जनहित में अच्छे निष्कर्ष निकाले जा सकें ! राष्ट्रहित में कुछ जनहितकारी विधेयक पास हो सकें, साथ में ही कुछ फालतू व अनावश्यक विधेयकों का विरोध भी किया जाये यदि विधेयक अनावश्यक हैं किसी निजी लाभ के दृष्टिगत लाया गया है तो उनका पुरजोर ढंग से विरोध करके उसे अस्वीकार भी कराया जाए लेकिन यह सम्पूर्ण क्रिया व प्रतिक्रिया भारतीय संवैधानिक नियमावली के तहत लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए सम्पन्न की जाये ।
लेकिन भारतीय लोकतंत्र में विगत कई वर्षों से सैधांतिक रूप से नहीं बल्कि निजी हितों की बात कही और करी जा रही है ! अब तो हमें सिर्फ ऐसे जनप्रतिनिधि दिखाई देते हैं जो अपने दलों के निजी हितों के लिए पूरे सत्र में चिल्लाते रहते हैं,जिनकी बातें देख सुनकर लगता ही नहीं कि वो हमारे देश के माननीय वर्ग के सांसद य विधायक हैं ! उनसे अच्छे लोग तो सड़क किनारे इनसे अच्छी राजनीतिक चर्चा प्रति चर्चा करते हुए मिल जाते हैं,तथा वो लोग आवश्यकता होने पर हमारे गणमान्य सांसदों एवं विधायकों से भी अधिक जोर से हो हल्ला मचा सकते हैं और वो भी इनसे बहुत कम खर्चे में !
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरित मानस में लिखा है -
कहु खगेश अस को जग माहीं ।
प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥
अर्थात सत्तारूढ़ सरकार को सत्ता की मदांधता होना स्वाभाविक है लेकिन वर्तमान के विपक्ष की भूमिका को देखते हुए मैं ईमानदारी से कह सकता हूँ कि मुझे एक आम नागरिक के नाते विपक्ष के क्रिया कलापों से अत्यन्त निराशा होती है ! सत्ता पक्ष के हों अथवा विपक्षी दल के सभी सांसद गणों विधायक गणों को हमारे देश के करदाता के पैसे से अच्छी खासी तनख्वाह व शानदार सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। बदले में वो करदाता कम से कम इतनी अपेक्षा तो कर ही सकते हैं कि जब लोकसभा य विधानसभा का सत्र चल रहा हो,जो यदि कोई विशेष परिस्थिति उत्पन्न न हो तो वर्ष में सिर्फ तीन बार कुछ पूर्व निर्धारित समयानुसार ही चलते हैं,तब हमारे वो गणमान्य जनप्रतिनिधि गण देश के संवेदनशील मुद्दों पर सत्तारूढ़ दल के साथ गहन चर्चा प्रति चर्चा करें बहस करें, जनता की भलाई देश की भलाई से जुड़े मुद्दे तार्किक शब्दों में मजबूती के साथ सरकार के सामने रखें ! और जिस मुद्दे पर जनता और वो स्वयं भी सरकारी पक्ष से सहमत नहीं हैं,उन मुद्दों पर तथ्यों के साथ सरकार को घेरने का काम करें,लेकिन वर्तमान समय में ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं देता है ! किसी न किसी मुद्दे को पकड़ कर सिर्फ हो हल्ला मचाया जाता है,सदन में कोई काम नहीं होता है सत्तारुढ़ पक्ष विपक्ष पर सदन नहीं चलने देने का आरोप लगा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है,तथा विपक्ष सत्तापक्ष पर सदन चलाने की जिम्मेदारी की बात कहकर इतिश्री कर लेता है ! और देश की जनता अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर सारा तमाशा मूक दर्शक होकर देखती रहती है।
देश की ग्रामीण जनता ग्राम प्रधान के भ्रष्टाचार से त्रस्त है,गांव का किसान अपने गांव के लेखपाल से परेशान है,शोषण और उत्पीड़न से ग्रस्त आदमी अपने क्षेत्र के थानेदार से त्रस्त है बार बार शिकायत करके भी इंसाफ नहीं मिल पा रहा,खेती किसानी से जुड़ा किसान कई तरह की समस्याओं से निजात पाने के लिए तहसील के चक्कर काट कर परेशान है,जिलाधिकारी से पुलिस अधीक्षक से न्याय मांगता व्यक्ति दिमागी रूप से परेशान है,न्याय के लिए न्यायालयों के चक्कर काट रही जानता मिल रही तारीख पर तारीख से परेशान है, सरकारी निकायों में प्रथम दृष्ट्या दिखते बड़े पैमाने पर किए जा रहे घोटाले से परेशान है,देश की बड़ी बड़ी परियोजनाओं में स्पष्ट दिखता भ्रष्टाचार देख कर देश की जनता परेशान है,जन जीवन से जुड़े मुद्दे खाद्य पदार्थों में मिलावट,नकली सीरप व दवाइयां शिक्षा एवं स्वास्थ्य समस्याओं से परेशान है देश का आम आदमी ! लेकिन चुनावी नारों से इतर सत्ता पक्ष हो य विपक्ष उपरोक्त मुद्दों पर कभी चर्चा नहीं करते,करते हैं तो सिर्फ एक दूसरे पर आरोप एवं प्रत्यारोप ! जिससे आम जनता का कोई भला नहीं होता ! जनता जिन्हें राष्ट्रीय हितों के लिए नीतियां बनाने के लिए चुनती है वो निजी हितों, जातीय हितों, धार्मिक हितों,दलीय हितों पर ही केंद्रित हो जाते हैं और जनहित राष्ट्रहित के मुद्दे कहीं दूर पीछे छूट जाते हैं ! चिंतन सिर्फ सत्ता में कैसे बना रहा जाये,य सत्ता के शिखर तक कैसे पहुंचा जाये के विषय पर ही होता है ! और इसके लिए वो सारे जायज और नाजायज हथकंडे अपना रहे हैं ! जो राष्ट्रीय हितों जनहितों के लिए अभिशाप बनते जा रहे हैं !
एक विचार प्रवाह
विद्यासागर त्रिपाठी
मूसानगर कानपुर देहात उप्र.