सहकार भारतीः सहकारिता के मैदान में संघ का संगठन, यूपी में गांव-गांव तक पहुंच बनाने की कोशिश

सहकार भारतीः सहकारिता के मैदान में संघ का संगठन

पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सहकारिता अब केवल सरकारी समितियों, सहकारी बैंकों और पैक्स तक सीमित विषय नहीं रह गई है। केंद्र में अलग सहकारिता मंत्रालय, नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति-2025, पैक्स के कंप्यूटरीकरण और गांव-गांव बहुउद्देशीय सहकारी समितियां बनाने की मुहिम के बीच एक संगठन तेजी से सक्रिय दिखाई दे रहा है सहकार भारती। यह संगठन अपने आधिकारिक परिचय में स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सहकारिता क्षेत्र में आनुषंगिक संगठन बताता है। इसकी स्थापना 1978 में हुई थी और इसका मूल मंत्र है। “बिना संस्कार नहीं सहकार, बिना सहकार नहीं उद्धार। आज सहकार भारती का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि केंद्र सरकार सहकारी संस्थाओं को कृषि, डेयरी, मत्स्य, भंडारण, बैंकिंग, विपणन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बड़े आधार के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे समय में सवाल यह है कि सहकार भारती की भूमिका केवल सहकारी क्षेत्र के सुधार तक है या वह एक बड़े सामाजिक-संगठनात्मक नेटवर्क का भी निर्माण कर रही है? सहकार भारती में अभी नई पीढ़ी की कोई रूचि नहीं दिखती ना ही बदलते हुए तकनीकी युग में तकनीक को बढ़ावा देने की कोई रूचि दिखाई देती है। अभी 17 अगस्त को कानपुर में प्रशिक्षण वर्ग के कार्यक्रम की कोई मीडिया कवरेज नहीं दिखी। कार्यक्रम दक्षिण कानपुर के ऐसी जगह रखा गया जो एकदम आउटर इलाका था। बड़े मीडिया संस्थानों ने इसका कवरेज तक नहीं किया। सहकार भारती के अरविंद दुबे व नीरज त्रिपाठी ने बताया कि यह मीडिया सेल की जिम्मेदारी थी अगर ठीक से कवरेज नहीं हुआ तो उन्हीकी जिम्मेदारी थी। यहां यह बताते चले कि कानपुर सहकार भारती के संगठन में ऐसे लोगों की भरमार हो रही है जिनका सहकारिता के विस्तार से और मूल उद्देश्यों से कोई वास्ता नहीं दिख रहा है। जबकि जेन जी के इस जमाने में नई पीढ़ी को सहकारिता के साथ जोड़ा जाना बहुत आवश्यक है। ‘‘सहकार चेतना’’ जैसी पत्रिकाओं और जिला सम्मेलनों से प्रचार भर किया जा रहा है जो कि नाकाफी है।
संगठन के अलग-अलग आधिकारिक पन्नों पर स्थापना के स्थान और तारीख के विवरण में कुछ अंतर दिखाई देता है। कहीं पुणे में गणेश चतुर्थी के दिन स्थापना का उल्लेख है, तो कहीं 11 जनवरी 1978 को मुंबई में संस्था की स्थापना और 11 जनवरी 1979 से कार्य शुरू होने की बात कही गई है। इसलिए स्थापना की तारीख बताते समय यह अंतर ध्यान में रखना जरूरी है। संगठन के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में माधवराव गोडबोले का नाम आधिकारिक वेबसाइट पर दिया गया है। सहकार भारती के संस्थापक सदस्यों में सतीश मराठे का भी उल्लेख मिलता है। संगठन का मूल विचार था कि सहकारिता को केवल सरकारी नियंत्रण वाली व्यवस्था न बनाकर स्वावलंबन, सामूहिक आर्थिक शक्ति और समाज के कमजोर वर्गों के आर्थिक उत्थान का माध्यम बनाया जाए। इसका अर्थ यह है कि संघ परिवार के व्यापक ढांचे में जहां अलग-अलग संगठन शिक्षा, मजदूर, किसान, सेवा, छात्र, संस्कृति आदि क्षेत्रों में सक्रिय हैं, वहीं सहकार भारती का मुख्य क्षेत्र सहकारिता है। लेकिन इसे राजनीतिक दल कहना सही नहीं होगा। इसका घोषित कार्यक्षेत्र सहकारी संस्थाओं के निर्माण, प्रशिक्षण, सुधार, नीति सुझाव और सहकारिता के प्रचार-प्रसार से जुड़ा है। यही अंतर महत्वपूर्ण है। सहकार भारती चुनावी संगठन नहीं, बल्कि आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाला संगठन है; लेकिन उसका संघ से घोषित संबंध उसे सामान्य गैर-सरकारी सहकारी संगठन से अलग पहचान देता है। उत्तर प्रदेश में सहकार भारती का संगठनात्मक ढांचा खासा महत्वपूर्ण है। संगठन की वेबसाइट के अनुसार पूरे प्रदेश को 18 विभागों में बांटा गया है। प्रत्येक विभाग में विभाग संयोजक और सह विभाग संयोजक बनाए जाते हैं। इसके अलावा संगठन ने अलग-अलग विषयों के लिए प्रकोष्ठ बनाए हैं। उसकी वेबसाइट के अनुसार प्रत्येक प्रकोष्ठ में एक प्रदेश प्रमुख और छह सह-प्रदेश प्रमुख रखे जाने की व्यवस्था है। यानी यह केवल एक शीर्ष स्तर की संस्था नहीं है। इसका मॉडल प्रदेश – विभाग – जिला – स्थानीय सहकारी कार्यकर्ता के ढांचे पर काम करने का है। सहकार भारती उत्तर प्रदेश की वेबसाइट पर बड़ी संख्या में जिला और महानगर इकाइयों की सूची उपलब्ध है। इनमें लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर क्षेत्र के जिले, आगरा, मुरादाबाद, झांसी, जालौन, बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी के कई जिले शामिल हैं। फरवरी 2026 में कानपुर देहात के अकबरपुर में संगठन का जिला कार्यालय खोले जाने के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय जोशी ने संगठन के 28 राज्यों और 650 से अधिक जिलों में सक्रिय होने का दावा किया था। यह आंकड़ा संगठन का दावा है, इसलिए इसे सरकारी सदस्यता या स्वतंत्र ऑडिटेड डेटाबेस का आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है। केंद्र सरकार की नई सहकारिता नीति और पैक्स विस्तार। केंद्र सरकार ने जुलाई 2025 में राष्ट्रीय सहकारिता नीति-2025 जारी की। 2026 में इसके क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बैठकें और क्षेत्रीय कार्यशालाएं चल रही हैं। सहकारिता मंत्रालय की 2026 की गतिविधियों में पैक्स, डेयरी, मत्स्य, सहकारी बैंकिंग, भंडारण और तकनीक आधारित सहकारिता विस्तार लगातार प्रमुख विषय बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश में सहकार भारती का सबसे महत्वपूर्ण प्रकोष्ठ बी-पैक्स यानी बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों से जुड़ा है। अक्टूबर 2025 में लखनऊ में सहकार भारती के बी-पैक्स प्रकोष्ठ का प्रदेश सम्मेलन हुआ। इसमें संगठन ने पैक्स को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए उन्हें मजबूत करने की मांग उठाई। कार्यक्रम में प्रदेश के सहकारिता मंत्री जे.पी.एस. राठौर भी मौजूद थे। सहकार भारती ने इस अवसर पर सहकारी समितियों के उत्थान के लिए 11 सूत्रीय मांगपत्र भी सौंपा था। यहीं से संगठन की भूमिका का दूसरा पहलू सामने आता है। यह केवल सरकार की योजनाओं का प्रचार नहीं करता, बल्कि सहकारिता नीति और संस्थागत सुधारों पर सरकार को सुझाव भी देता है। 2025 में लखनऊ में सहकार भारती के कार्यक्रम में राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय जोशी ने कहा था कि संगठन ने केंद्र सरकार के सामने सहकारिता नीति को लेकर सुझाव रखे और सरकार ने नई सहकारिता नीति बनाने की दिशा में कदम उठाया। यह संगठन का अपना दावा है। इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि राष्ट्रीय नीति पूरी तरह सहकार भारती ने बनाई है। लेकिन इससे इतना जरूर स्पष्ट होता है कि संगठन स्वयं को नीति-निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय हितधारक के रूप में देखता है।

सहकार भारती की भूमिका का एक उल्लेखनीय उदाहरण गंगा सहकार ग्राम परियोजना है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और सहकार भारती के बीच 2022 में एक समझौता हुआ था। इसके तहत गंगा बेसिन में कम से कम 75 गंगा सहकार ग्राम विकसित करने की पहल की गई थी। बुलंदशहर में 400 से अधिक किसानों के लिए प्राकृतिक खेती पर कार्यशाला भी हुई थी। इस परियोजना में सिर्फ खेती नहीं बल्कि फसल विविधीकरण, उत्पाद संरक्षण, विपणन, तकनीकी प्रशिक्षण, किसानों की आय सुधार, जैसे विषयों को जोड़ा गया था। यह सहकार भारती के उस मॉडल को दिखाता है जिसमें सहकारिता को ग्रामीण विकास का बहुआयामी माध्यम बनाया जाता है। लेकिन सहकार भारती के सामने चुनौतियां भी कम नहीं संगठन जिस सहकारिता मॉडल की बात करता है, उसके सामने वास्तविक चुनौतियां हैं। समितियों की आर्थिक कमजोरी कई प्राथमिक समितियां लंबे समय से आर्थिक संकट, कम कारोबार और निष्क्रियता से जूझती रही हैं। सरकार स्वयं निष्क्रिय और बंद को लेकर अलग-अलग राज्यों से आंकड़े मांग रही है। राजनीतिक हस्तक्षेप- सहकार भारती स्वयं सहकारी संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने की बात करती है। यही सहकारिता का सबसे बड़ा विरोधाभास है। जिस क्षेत्र में आर्थिक लोकतंत्र होना चाहिए, वहां स्थानीय राजनीति का प्रभाव भी बहुत मजबूत रहता है।

उत्तर प्रदेश में सहकार भारती की स्थिति
प्रदेश इकाईः लखनऊ में प्रदेश कार्यालय। सहकार भारती यूपी के 28 प्रदेशों में से एक है। जिला केंद्रः यूपी के 75 में से 65 से ज्यादा जिलों में जिला इकाई सक्रिय बताई जाती है। लक्ष्य 739 जनपदों तक पहुंचना है। प्रदेश में हजारों कार्यकर्ता, पर पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की संख्या सीमित है। ज्यादातर काम स्वयंसेवकों के भरोसे मुख्य काम जो यूपी में हो रहे हैं। प्रशिक्षण वर्ग- सहकारी समितियों के पदाधिकारियों को ‘‘संस्कार’’ और लेखा-जोखा का प्रशिक्षण। नई समितियां- किसान उत्पादक संगठन एफपीओ, डेयरी, मत्स्य, हथकरघा क्षेत्र में नई सहकारी समितियां बनवाने पर जोर। समस्या समाधान- मौजूदा समितियों में चुनाव, भ्रष्टाचार, सरकारी हस्तक्षेप के मुद्दे उठाना। राजनीतिक दखल- यूपी में सहकारी चीनी मिल, बैंक, डेयरी समितियों पर राजनीति का असर सबसे ज्यादा। सहकार भारती इसे सबसे बड़ी कमजोरी मानती है। पश्चिमी यूपी में सहकारिता मजबूत है, पर बुंदेलखंड और पूर्वांचल में अभी नेटवर्क कमजोर। ग्रामीण सहकारी बैंकों में नई तकनीक अपनाने में दिक्कत।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *