बुंदेलखंड में दशहरा पर हिंदुओं से मुस्लिम कहते हैं राम राम

बुंदेलखंड में दशहरा पर हिंदुओं से मुस्लिम कहते हैं राम राम

जहां पान के बीड़े में बसा है आल्हा-ऊदल का शौर्य और 54 घरों में पूरी होती है 108 राम नाम की माला।
कृष्ण कुमार द्विवेदी

महोबा (बुंदेलखंड)। दशहरे के पर्व पर आज भी दशहरा मिलन के अवसर पर लोग एक दूसरे से गले मिलकर राम-राम बोलकर ही शुभकामनाएं देते हैं। और जो उम्र से बड़े होते हैं उनके पैर छूकर आशीर्वाद भी लेते हैं। यह दृश्य बुंदेलखंड के हर गांव, हर शहर, हर गली में दशहरे की शाम से लेकर अगले दो-तीन दिन तक आम है। सुबह होते ही कुर्ता-पायजामा पहने, हाथ में पान की गिलौरी लिए लोगों की टोलियां घर-घर निकल पड़ती हैं। राम-राम करने की यह परंपरा उत्तर प्रदेश के महोबा, हमीरपुर, चित्रकूट, बांदा, झांसी, ललितपुर और मध्य प्रदेश से लगे छतरपुर, पन्ना, दमोह, निवाड़ी, ओरछा, दतिया जिलों में भी दशहरे की शुभकामनाएं राम-राम करके ही दी जाती है। यानी पूरा बुंदेलखंड, चाहे वह यूपी का हो या एमपी का, दशहरे पर एक ही मंत्र में बंध जाता है – राम-राम। बुंदेलखंड की सीमा भले ही दो राज्यों में बंटी हो, लेकिन संस्कृति एक है, भाषा एक है और दशहरे पर राम-राम की गूंज भी एक है। यहां एक विशेष बात यह है कि पुत्र अपने पिता से भी दशहरे की शुभकामनाएं राम-राम बोलकर करता है बाद में उनके पैर छूता है। पत्नी पति से, पति पत्नी से, भाई बहन से, भाई-भाई से दसहरा की शुभकामनाएं राम-राम बोलकर ही करते हैं। आमतौर पर देश के दूसरे हिस्सों में पुत्र पिता के पैर छूता है, लेकिन बुंदेलखंड में पैर छूने से पहले राम-राम बोलना जरूरी है। पत्नी भी अपने पति को दशहरे पर राम-राम कहती है। यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन यहां यह सम्मान का प्रतीक है। भाई-बहन के बीच भी यही परंपरा है। बहन भाई को राम-राम कहती है, भाई बहन को। यह परंपरा इतनी गहरी है कि यदि किसी के घर दशहरा मिलने जाओ और उसके पैर छूकर पान खाकर चले आओ, राम-राम नहीं बोला तो वहां बैठे बड़े बुजुर्ग बुलाकर कहते हैं कि हमारी परंपरा यही है सबसे पहले राम-राम बोलो इसके बाद कुछ करो। बुजुर्गों की नजर में राम-राम बोले बिना मिलना अधूरा है। हमीरपुर जनपद के गहरौली के वरिष्ठ चंद्रशेखर शुक्ला ( 101) वर्षीय कहते हैं, ‘हमारे यहां दशहरे पर राम-राम ही असली मिलन है। अगर आपने राम-राम नहीं कहा तो समझो आप मिले ही नहीं। हमारे दादा कहते थे, रावण पर राम की विजय हुई थी, इसलिए विजय के दिन राम का नाम ही लेना चाहिए। यही हमारी सभ्यता है।’ चरखारी की 60 वर्षीय अध्यापिका रोहिणी नायक बतातीं हैं, ‘‘मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा कि कोई बिना राम-राम बोले दशहरा मिला हो। हमारे यहां तो बच्चे को भी सिखाया जाता है, बेटा दादा को राम-राम बोलो।’’ हिंदू-मुस्लिम एक सुर में कहते हैं राम-राम – गंगा-जमुनी तहजीबः इतना ही नहीं, मुस्लिम, सिख, ईसाई हर धर्म के लोग हिंदू भाइयों के इस बड़े त्यौहार को पूरा समर्थन देते हैं। हिंदुओं द्वारा राम-राम कहे जाने पर जवाब में राम-राम भी कहते हैं। यह इस त्यौहार की सबसे बड़ी खूबसूरती है, जो बुंदेलखंड को देश में अलग पहचान देती है। महोबा के कस्बा पनवाड़ी, कुलपहाड़, चरखारी, हमीरपुर के राठ, मौदहा, बांदा के अतर्रा, बबेरू, झांसी के मऊरानीपुर, ललितपुर से लेकर एमपी के छतरपुर के बागेश्वर धाम क्षेत्र, ओरछा, दतिया तक यही नजारा दिखता है। महोबा के मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रहने वाले मोहम्मद अली कहते हैं, ‘‘हम भी दशहरे पर अपने हिंदू भाइयों के घर जाते हैं। वे हमें राम-राम कहते हैं, हम भी उन्हें राम-राम ही कहते हैं। इसमें धर्म कहां से आ गया, यह तो हमारी बुंदेली परंपरा है, भाईचारा है।’’ इसी तरह पनवाड़ी के सरदार जसबीर सिंह कहते हैं, ‘‘हमारे यहां गुरुद्वारे में भी दशहरे पर लंगर लगता है, और हम सब एक-दूसरे को राम-राम ही बोलते हैं।’’ हिंदू भाई अपने मुस्लिम दोस्त के घर जाता है, गले मिलकर राम-राम कहता है और मुस्लिम भाई भी पूरे दिल से राम-राम कहकर जवाब देता है और पान खिलाता है। यहां राम किसी धर्म का नहीं, पूरे बुंदेलखंड की साझा संस्कृति का नाम है। इस दिन कोई हिंदू-मुस्लिम नहीं, सब बुंदेलखंडी होते हैं। एक विशेष लाभ धार्मिक भी है। इस प्रकार आज के दिन यदि एक युवक 54 लोगों की मुलाकात में ही अपने आप 108 बार की एक माला पूरी हो गई और 108 बार राम का नाम लेना अपने आप में सबसे पुण्य काम भी माना जाता है। इस प्रकार हर व्यक्ति कम से कम सैकड़ों घरों के ऊपर अपने दशहरा मिलन के दौरान पूरे परिवारों से भेंट कर 1008 राम नाम जपने का फल भी प्राप्त कर लेता है।पंडित नरसिंह शास्त्री बताते हैं कि शास्त्रों में 108 का बड़ा महत्व है। 108 मनके की माला, 108 बार जाप। 108 बार राम नाम लेना एक माला के बराबर है। दशहरे के दिन अनजाने में ही लोग सैकड़ों बार राम नाम ले लेते हैं। इसलिए इस दिन का राम-राम बोलना सिर्फ परंपरा नहीं, अनजाने में हुआ जाप भी है। गणित समझिए – आप एक घर में जाते हैं, वहां 4 लोग मिलते हैं – दादा, पिता, चाचा, भाई। आप चारों को राम-राम बोलते हैं, चारों आपको राम-राम बोलते हैं। यानी एक घर में 8 बार राम नाम। ऐसे 54 घरों में 432 बार राम नाम का आदान-प्रदान। आने-जाने वाले रास्ते में भी लोग मिलते हैं। एक युवक सुबह से शाम तक कम से कम 100-150 घरों में जाता है। हर घर में 4-5 लोगों से मिलता है। यानी एक दिन में वह 500 से ज्यादा बार राम-राम बोल देता है। जो बुजुर्ग हैं, वे भले कम घर जाएं, लेकिन उनके घर आने वालों की संख्या सैकड़ों में होती है। इस तरह हर व्यक्ति दशहरे पर हजारों बार राम नाम ले लेता है। बुजुर्ग महिलाएं कहती हैं कि पूरे साल माला नहीं कर पाए तो क्या, दशहरे के दिन ही 1008 राम नाम का पुण्य मिल जाता है। महोबा निवासी विकास मिश्रा, संदीप शुक्ला, देवेंद्र शुक्ला, संजय मिश्रा बताते हैं कि बुंदेलखंड में दशहरे के दिन पान खिलाकर राम-राम करने की परंपरा महोबा के वीर योद्धा आल्हा और ऊदल के समय से जुड़ी हुई है। उस काल में महोबा के राजा परमाल की सेना में शामिल सैनिक और योद्धा युद्ध के लिए जाने से पहले एक संकल्प लेते थे। इस संकल्प को पूरा करने की पुष्टि के लिए उन्हें पान का बीड़ा उठाना पड़ता था। मान्यता थी कि पान का बीड़ा उठाने के बाद योद्धा कभी पीछे नहीं हटते थे और विजय होकर ही लौटते थे। इतिहासकार बताते हैं कि महोबा के चंदेल राजा परमर्दिदेव यानी राजा परमाल का दरबार वीरता के लिए प्रसिद्ध था। आल्हा-ऊदल जैसे योद्धा उसी दरबार के रत्न थे। युद्ध पर जाने से पहले दरबार में पान का बीड़ा रखा जाता था। जो सबसे वीर होता था, वही बीड़ा उठाता था। बीड़ा उठाना मतलब अपनी जान की बाजी लगाकर भी वचन पूरा करना। कहा जाता है कि आल्हा-ऊदल की सेना में पान का बीड़ा उठाना सबसे बड़ी चुनौती थी। जो बीड़ा उठा लेता था, उसे वह काम पूरा करना ही पड़ता था। यह वीरता और जबान का प्रतीक था। अगर कोई बीड़ा उठाकर पीछे हट जाता तो उसे कायर माना जाता था। इसलिए पान का बीड़ा वीरता, ईमानदारी और संकल्प का प्रतीक बन गया। महोबा के किला क्षेत्र के पास आज भी आल्हा-ऊदल की बैठक नाम की जगह है, जहां कहा जाता है कि योद्धा पान का बीड़ा उठाते थे। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लोग युद्ध पर जाने से पहले मां शारदा के मंदिर में पान का बीड़ा चढ़ाते थे। कालान्तर में जब यह युद्ध परंपरा समाप्त हो गई, तो इस वीर रस की परंपरा को बुंदेलखंड के लोगों ने विजयादशमी के त्योहार के साथ जोड़ दिया। विजयादशमी खुद विजय का पर्व है। भगवान राम ने इसी दिन रावण पर विजय पाई थी। तो युद्ध के प्रतीक पान के बीड़े को विजय के पर्व से जोड़ दिया गया।आज रावण दहन के बाद लोग एक-दूसरे को पान खिलाते हैं। इसका मतलब है कि हम भी आपके साथ भाईचारे के संकल्प का बीड़ा उठा रहे हैं। पान खिलाना दोस्ती और वचन का प्रतीक बन गया। पान का मीठा स्वाद रिश्तों में मिठास घोलता है और राम-राम का उद्घोष रिश्तों को पवित्र बनाता है। बुंदेलखंड में रावण दहन के बाद सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे से गले मिलकर राम-राम करते हैं और पान का बीड़ा खिलाकर भाईचारे तथा सद्भाव का इजहार करते हैं। मेले के मैदान में ही गले मिलना शुरू हो जाता है। जैसे ही रावण जलता है, लोग एक-दूसरे से लिपट जाते हैं और राम-राम की गूंज पूरे मेले में गूंजने लगती है। फिर यह सिलसिला अगले तीन दिन तक चलता है। पहले दिन अपने गांव-मोहल्ले में, दूसरे दिन रिश्तेदारों के यहां, तीसरे दिन दूर-दराज के गांवों में लोग दशहरा मिलने जाते हैं। लोग टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं। ढोलक, मंजीरा बजता है। बुजुर्ग घर के दरवाजे पर बैठे रहते हैं, पान की थाली सजाए रहते हैं। हर आने वाले को पान खिलाते हैं, राम-राम करते हैं। महिलाएं भी पीछे नहीं रहतीं। वे भी अपनी सहेलियों के घर जाकर राम-राम करती हैं। नई बहू के लिए पहला दशहरा खास होता है। उसे हर घर ले जाकर राम-राम करवाई जाती है, ताकि गांव से रिश्ता जुड़े। यह परंपरा आज के दौर में जहां लोग व्हाट्सएप पर दशहरा विश कर देते हैं, वहां बुंदेलखंड में आज भी आमने-सामने मिलकर राम-राम करने की परंपरा को जिंदा रखे हुए है। यही कारण है कि बुंदेलखंड का दशहरा सिर्फ रावण जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, भाईचारे और राम नाम की ऐसी माला है जो हर दिल को जोड़ती है और आल्हा-ऊदल के शौर्य की याद दिलाती है।

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