भारत के जेन-जी एवं उनके समर्थक विपक्ष के उत्साह वर्धन को समर्पित!

भारत के जेन-जी एवं उनके समर्थक विपक्ष के उत्साह वर्धन को समर्पित!

विद्यासागर त्रिपाठी
मूसानगर कानपुर देहात उ0प्र0।
विपक्षी पार्टियों की दृष्टि से देखें तो भाजपा ने पूरे देश को बर्बाद करके देश की आम जनता से सब कुछ छीन लिया है। जनता की मूल भूत सारी सुविधाएं समाप्त हो गईं हैं। भारत के लोग दीन हीन हो गए हैं, जिंदगी की सभी खुशियां भी छिन गईं हैं, जीवन जीना ही मुश्किल हो गया हैं। इसलिए वर्तमान भाजपा/एनडीए सरकार को जल्द से जल्द हटा देता चाहिए, क्योंकि भाजपा के द्वारा घोषित अच्छे दिन कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। इसलिए उन्हें अब 2014 से पहले वाले पुराने दिन भारत में वापस लौटाने हैं।
अब मैं याद करता हूं 2014 से पहले वाले खुशहाल दिन जब देश में प्रत्येक महीने दो तीन बार कहीं न कहीं बम विस्फोट होते थे और बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने, घायल हो जाने की दुखद सूचनाएं प्राप्त होती रहती थीं, मठ मन्दिर धार्मिक स्थलों पर हमले धार्मिक शोभायात्राओं में बाधाएं होती रहती थीं, वो कितने अच्छे दिन थे, जब पूरी मुंबई को आतंकवादी तीन दिन तक बंधक बनाकर बैठे रहते थे, मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट वाले कितने अच्छे दिन थे? पहलगाम और पुलवामा हमले के बाद भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान पर की गई प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही से उन्हें मजा नहीं आया है। उन्हें तो मुम्बई जैसे सीरियल ब्लास्ट ट्रेनों स्टेशनों व पार्कों में धमाके वाले दिन वापस चाहिए। पुलवामा पहलगाम के बाद मोदी सरकार ने पाकिस्तान में तबाही क्यों मचाई, उसका पानी क्यों रोक दिया, पाकिस्तान बेचारा पानी की दोधारी मार से पूरी दुनिया में पानी रोकने व छोड़ने की समस्या सुलझाने के लिए रोता घूम कर रहा है। कांग्रेस तथा विपक्ष के लिए तब अच्छा था, जब बड़े बड़े हमले होते थे और पाकिस्तान से भारत की दोस्ती चलती रहती थी,और तब की भारत सरकार हर महीने शान्ति के लिए डोजियर भेज कर ही खुश होती रहती थी।
हमें याद आता है कि 2014 से पहले जब हमारे घर पर बिजली आ जाती थी तब कितनी खुशी होती थी और अब बिजली जाती ही नहीं है, तो बिजली नहीं आने के बाद जब बिजली आ जाती थी,तब की मिलने वाली उस खुशी का सारा मजा ही अब गायब हो गया है। कितने अच्छे दिन थे जब तीन सौ रुपये में पांच जीबी डाटा मिलता था,और रिसीव कॉल के पैसे देने में जो खुशी मिलती थी, वर्तमान में मोदी सरकार फालतू में तीन सौ रुपये में प्रतिदिन का 2 जीबी डाटा दे रही है, क्या यह खुश होने वाली बात हैं ? दिन तो वो 2014 से पहले वाले ही बढ़िया थे। जब भारत के अधिकांश लोगों के पास एंड्रॉएड फोन थे ही नहीं और न ही फोन-पे जैसे फालतू के ये ऑनलाइन पेमेंट जैसे झंझट थे। सरकार द्वारा आपदा में प्रदत्त धनराशि हाथों हाथ घिसते घिसते आधी अधूरी धनराशि कुछ जरूरत मंदों तक तो पहुंच ही जाती थी? सब खुश रहते थे और अब पूरी की पूरी धनराशि जरूरत मंद के खाते तक पहुंच जाती है। कितनी गलत बात है यह दुख होता है कि सबके जनधन खाते बैंक में क्यों खुलवाये गये?
2014 से पहले कितना बढ़िया था, जब चाचा नेहरू के जमाने का सिर्फ एक एम्स था व चार पांच आईआईटी और आईआईएम थे, तब सब खुश थे और अब मोदी जी ने दो दो दर्जन एम्स, आईआईटी और आईआईएम हर जनपद में मेडिकल कॉलेज खुलवा कर वहां इतनी भीड़ बढ़ावा दी है कि वहां पर जाकर सबकी परेशानी बढ़ गई है। जिससे अब के जेन-जी विपक्षी एवं विपक्षी नेताओं की परेशानी बढ़ गई है। कितनी अच्छी बात 2014 से पहले थी जब स्वतंत्रता से लेकर 2014 तक मेडिकल कॉलेजों में मेडिकल की कुल सीटे पचास हजार थीं, मोदी सरकार ने कितना बड़ा गुनाह किया कि सिर्फ ग्यारह वर्षों में मेडिकल की सीटें बढ़ा कर तीन गुना लगभग डेढ़ लाख कर दी हैं, बेचारे बच्चे अब दुखी होकर विदेश जा रहे हैं, जब पचास हजार सीटें थी तब सभी खुश थे,बिना परीक्षा के जोड़ जुगाड़ करके सीट मिल ही जाती थी, अब पेपर होने लगा है तो पेपर लीक की समस्या सामने है। यदि पेपर ही न होते तो पेपर लीक जैसी कोई समस्या पैदा ही नहीं होती और किसी को दुखी होने का कारण भी न बनता देश में खुशियां ही खुशियां होती। भारत के वो लोग कितने खुश थे जिन्हे स्वतंत्रता के बाद से रसोई गैस सिलेंडर का सपना आता ही नहीं था, यदि किसी गरीब को रसोई गैस लेने का सपना आया भी तो वर्षों तक सांसदों के घर दरवाजे चक्कर लगाने पड़ते थे। मोदी सरकार ने प्रत्येक गरीब महिला को फ्री में रसोई गैस कनेक्शन देकर कितना भारी गुनाह किया है। अब मोदी सरकार को भारत की सत्ता में बने रहने का कतई अधिकार नहीं है। 2014 से पहले कितनी खुशियां थीं जब नक्सलवादी हमारे जवानों को घेर घेर कर मारते थे, कश्मीर में पत्थरों से स्वागत किया जाता था, अब कितने दुख की बात है कि मोदी सरकार ने बेचारे नक्सलियों एवं आतंकियों का ही खात्मा करवा दिया और खामखां नक्सलवाद आतंक प्रभावित क्षेत्रों में भी विकास परक योजनाएं देकर वहां पर विकास कार्य करवा कर वहां के लोगों और विपक्षी पार्टियों को दुखी कर रहे हैं। 2014 से पहले कितना अच्छा था, जब निश्चित नहीं होता था कि घर से जा तो रहे हैं किन्तु क्या वापस जिंदा घर परिवार के बीच आ पाएंगे या नहीं, लेकिन अब ये निश्चिंतिता है कि घर वापस आयेंगे ही तो अब जीवन कुछ सूना सूना लगने लगा है, वर्तमान के जेन-जी को पता ही नहीं हैं कि हमारे समाज ने 2014 से पहले कितने मजे किये हैं, बम फटने के बाद मजे ही मजे होते थे। उन्होंने उन आनन्द के क्षणों का कोई अनुभव तो किया ही नहीं हैं। हां अब मजा तो आयेगा जब किसी भी आन्दोलन स्थलों पर कोई भी पत्थर फेंके, गाड़ियां तोड़े व जलाये सुरक्षा कर्मियों को घेर कर मारे व कपड़े फाड़े फिर भी सुरक्षा कर्मी का काम सिर्फ हाथ बांध कर खड़े रहना होगा, उन्हें अब अपने बचाव में कुछ भी कर सकने का अधिकार नहीं होगा।
कितने अच्छे दिन थे 2014 से पहले जब सामरिक रक्षा उपकरणों में हमारा देश पूर्ण रूप से विदेशों पर निर्भर रहता था। वर्तमान मोदी सरकार अनावश्यक रूप से रक्षा उपकरण जैसी शामिग्री भारत में निर्मित करा रही है। जिससे इन्हें विदेश से खरीदने पर वहां से मिलने वाले कमीशन का नुकसान होता साफ दिखाई दे रह है,क्या यह दुख की बात नहीं है? रक्षा क्षेत्र में भारत के युवा वैज्ञानिकों इंजीनियरों सहायकों को बेकार में रोजगार दिया जा रहा है और देश की विदेशी मुद्रा भी गलत बचाई जा रही है, क्यों भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाया जा रहा है। यह तो उनकी दृष्टि में दुखद बात है।
2014 से पहले मा.अटल बिहारी जी की स्वर्ण चतुर्भुज परियोजना को छोड़कर सिंगल व दो लेन की सड़के थीं गांवों को सड़कों की कोई जरूरत ही नही थी। कितनी खुशी से गढ्ढा मुक्त सड़को पर फर्राटे भरते हुए चलते थे। अब मोदी सरकार ने फालतू में 4 लेन, 6 लेन, 8 लेन सड़के हाईवे बनाते ही जा रहे हैं, मोदी सरकार कितनी घटिया सरकार है कि 2014 से पहले वो सब अच्छा था, जब लाखों करोड़ के घोटाले प्रतिदिन अखबारों की सुर्खियां बना करते थे और अब वो सभी खबरें छपना प्रसारित होना बंद हो गई हैं। अब तो सड़क में कहीं दरार भी पड़ गई तो उसे सोशल मीडिया प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया बढ़ चढ़ कर जरूर दिखा पाता है। बड़े बड़े घोटालों की खबरें न छप पाना विपक्ष के लिए दुख का विषय तो है ही। इसीलिए अब मोदी सरकार को हटाने की जल्दी है। और 2014 से पहले जैसी कार्य पद्धति देश में लाना जरूरी है। तभी देश का पूर्ण विकास हो सकेगा। तथा हमारा भारत आत्मनिर्भर होकर विकसित राष्ट्र बन सकेगा। और यह सब भारत में जेनजी के नेता अभिजीत दीपके, सौरव दास, विजेता दहिया एवं आशुतोष रांका और उनके वो सहयोगी ही कर सकते हैं जो यह दावा करते हैं कि ‘‘झुकती है दुनियां, बस झुकाने वाला चाहिए’’,,। इस एक मात्र वाक्य में ही वह सब कुछ छिपा है जो भारत का आगामी भविष्य दिखाता है। विपक्षी पार्टियों को जेनजी के सहयोग से देश की सत्ता में वापस आना ही चाहिए तभी देश का कल्याण होगा।

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