पंचायत चुनाव 3 माह के अंदर कराने के उच्च न्यायालय के निर्देश पर गांवों में चुनावी चकल्लस।

तथाकथित अधिकांश संभावित दावेदारों की दारु,मुर्गे की दावतें उड़ने की चर्चाएं तेज

बिधूना औरैया। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के मामले में उच्च न्यायलय द्वारा तीन माह के अंदर पंचायत चुनाव कराने के दिए गए निर्देश के बाद फिर एक बार गांवों में खासकर प्रधान पद के चुनाव की हलचल अचानक तेज हो गई है। भले ही इस आदेश के बाद भी तमाम बुद्धिजीवी अभी तक तीन माह के अंदर चुनाव ना हो पाने की आशंका से चिंतित नजर आ रहे हैं, क्योंकि चर्चा आम यह है कि जब तक पिछड़ा वर्ग आयोग का सर्वे पूरा नहीं हो जाता तब तक त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तीन माह के अंदर हो पाएंगे। यह कह पाना फिलहाल कठिन है, क्योंकि पिछड़ा वर्ग आयोग के सर्वे के आधार पर ही त्रिस्तरीय पंचायत का आरक्षण निर्धारण होना है और अभी तक लगभग 40 जिलों से अधिक में सर्वे शेष होने की चर्चा है तो ऐसे में आखिर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के तीन माह के अंदर होने पर संशय से होना स्वाभाविक है। माना जाता है कि लगभग तीन माह बाद बोर्ड परीक्षाएं भी होनी है वहीं जनगणना का कार्य भी चलेगा। हालांकि 3 माह के अंदर चुनाव संभव हो पाएगा या नहीं लेकिन उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद खासकर प्रधान पद को लेकर अचानक गांवों में चुनावी हलचल तेज हो गई है। उच्च न्यायालय के निर्देश के आधार पर प्रधान पद के अधिकांश संभावित दावेदार 3 माह के अंदर चुनाव होना लगभग तय मानकर अपनी अपनी जीत दर्ज करने की चुनावी गोटें बिछाने में मशगूल नजर आने लगे हैं। तीन माह के अंदर चुनाव होने की चर्चा फैलते ही प्रधान पद के संभावित दावेदारों के चहेते, समर्थक, चापलूस,चाटुकार व तमाम निहित स्वार्थी लोग भी अचानक सक्रिय हो गए हैं वहीं संभावित दावेदारों की जय जयकार कर चुनाव में उनकी जीत पक्की बताकर दारु मुर्गा की दावतें उड़ानें में भी तमाम निहित स्वार्थी समर्थक जुट गए हैं वहीं तमाम ऐसे संभावित दावेदार भी देखने में आ रहे हैं जो चुनाव में अपने वोट पक्के कराने को लेकर अपने तथाकथित चहेतों, समर्थकों, चापलूस चाटुकारों कारों को विभिन्न तीर्थ व पर्यटन स्थलों की सैर सपाटा भी कराते नजर आने लगे हैं। जमीनी धरातल पर देखने में आ रहा है कि गांवों में इस समय हर जगह प्रधानी की चर्चा होती है नजर आ रही है वहीं खासकर दारू मुर्गा के शौकीनों की फिलहाल फिर एक बार लॉटरी सी खुली नजर आने लगी है। इतना ही नहीं जनचर्चा तो यह भी आम है कि अधिकांश तथाकथित संभावित दावेदारों के कुछ निहित स्वार्थी समर्थक तो एक दूसरे की आंख से बचकर लगभग सभी संभावित दावेदारों की जय जयकार कर चौतरफा माल छानकर अपने शौक पूरे करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं और उनकी नापाक चाल का शिकार होकर तथाकथित सभी संभावित दावेदार उनके मुंह से अपनी ठकुर सुहाती सुनकर बेहद खुश होते नजर आ रहे हैं लेकिन तीन माह के अंदर चुनाव हो पाएंगे किस ग्राम पंचायत को किस वर्ग के लिए आरक्षित किया जाएगा और चुनावी आंकड़ों में कौन संभावित दावेदार मजबूत रहेगा यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है लेकिन गांवों में चुनावी हलचल तेज है।

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