गूंजेगा माँ राजराजेश्वरी का एक करोड़ कुंकुमार्चन ,शरद पूर्णिमा पर श्री रावतपुरा सरकार के सानिध्य में होगा भव्य महाअनुष्ठान, 50 हजार श्रद्धालु करेंगे माँ की आराधना
रवीन्द्र त्रिपाठी।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति की उपासना केवल व्यक्तिगत सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य की कामना तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य जीवन में चेतना का जागरण, समाज में सद्भाव और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना को सुदृढ़ करना भी है। इसी आध्यात्मिक दृष्टि, श्रद्धा और लोकमंगल के संकल्प के साथ मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर 26 अक्टूबर को माँ राजराजेश्वरी कोटि हरिद्रा कुंकुमार्चन महाअनुष्ठान का भव्य आयोजन होने जा रहा है। लाल परेड ग्राउंड में आयोजित इस विराट धार्मिक अनुष्ठान को संत शिरोमणि श्री रविशंकर जी महाराज, जिन्हें श्रद्धालु श्री रावतपुरा सरकार के नाम से जानते हैं, का सानिध्य और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त होगा।इस महाअनुष्ठान में 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं की सहभागिता का लक्ष्य है। आयोजन के अंतर्गत माँ राजराजेश्वरी का एक करोड़ अर्चन किए जाने की तैयारी है। वाराणसी, प्रयागराज, वृंदावन और उज्जैन जैसे प्रमुख धार्मिक केंद्रों से आए लगभग 1100 विद्वान आचार्य वैदिक एवं पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार अनुष्ठान संपन्न कराएंगे। आयोजन की विशेषता यह है कि इसमें शामिल होने वाले श्रद्धालुओं को पूजन सामग्री निःशुल्क उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। इस प्रकार यह आयोजन आस्था के साथ सामूहिक सहभागिता और सामाजिक समरसता का भी संदेश देने जा रहा है।*माँ राजराजेश्वरी: शक्ति, सौंदर्य और चेतना की आराधना*भारतीय सनातन परंपरा में माँ राजराजेश्वरी को आदिशक्ति, दिव्य चेतना और सृष्टि की मूल ऊर्जा के स्वरूप में प्रतिष्ठित किया गया है। श्रीविद्या साधना में उनका स्थान विशेष माना जाता है। माँ राजराजेश्वरी की उपासना में शक्ति और शिव के अभिन्न संबंध, प्रकृति और पुरुष के समन्वय तथा बाहरी संसार और आंतरिक चेतना के बीच एकात्म भाव की अनुभूति पर बल दिया जाता है।श्रीविद्या परंपरा के अनुसार, माँ राजराजेश्वरी की आराधना साधक को अपने भीतर स्थित चेतना को पहचानने और जीवन को आध्यात्मिक अनुशासन से जोड़ने की प्रेरणा देती है। यह साधना केवल भौतिक उपलब्धियों की कामना नहीं, बल्कि मन की शुद्धि, विचारों की पवित्रता और आत्मिक उन्नति का मार्ग भी मानी जाती है।माँ को अर्पित किया जाने वाला कुंकुम शक्ति, मंगल और सौभाग्य का प्रतीक है, जबकि हरिद्रा अर्थात हल्दी को शुभता, पवित्रता और मांगलिक संस्कारों से जोड़ा जाता है। जब हजारों श्रद्धालु एक साथ माँ के चरणों में अर्चन करते हैं, तो वह दृश्य व्यक्तिगत उपासना से आगे बढ़कर सामूहिक आस्था की विराट अभिव्यक्ति बन जाता है।*एक करोड़ अर्चन: श्रद्धा की सामूहिक अभिव्यक्ति*इस आयोजन का सबसे प्रमुख आकर्षण माँ राजराजेश्वरी का एक करोड़ कुंकुमार्चन है। एक करोड़ अर्चन का संकल्प अपने आप में श्रद्धालुओं की सामूहिक भागीदारी, साधना के अनुशासन और आध्यात्मिक समर्पण का प्रतीक है। इतने बड़े स्तर पर आयोजित होने वाला यह अनुष्ठान भोपाल को एक दिन के लिए भक्ति और शक्ति उपासना के विशेष केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित करेगा।अनुष्ठान में श्री ललिता सहस्रनामावली के पाठ का विशेष महत्व रहेगा। परंपरा के अनुसार, इस स्तोत्र में माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी के एक हजार पवित्र नामों का वर्णन है। प्रत्येक नाम देवी के किसी गुण, स्वरूप, शक्ति या आध्यात्मिक महिमा का स्मरण कराता है। श्रद्धालु जब इन नामों का पाठ और अर्चन करते हैं, तो उनके लिए यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं रहता, बल्कि मन को एकाग्र करने, विचारों को सकारात्मक बनाने और ईश्वर के प्रति समर्पण व्यक्त करने का माध्यम बन जाता है।श्रीविद्या की मान्यताओं में मानव शरीर के चक्रों और कुंडलिनी शक्ति का भी उल्लेख मिलता है। साधना के माध्यम से सुप्त चेतना के जागरण तथा मूलाधार से सहस्रार तक आध्यात्मिक उन्नति की अवधारणा इसी परंपरा का हिस्सा है। इन विचारों को आध्यात्मिक विश्वास और साधना के अनुभवों के संदर्भ में समझा जाता है।*गुप्त साधना से लोककल्याण के विराट संकल्प तक*श्री रावतपुरा सरकार महाराज ने माँ राजराजेश्वरी की उपासना के इस स्वरूप को विशिष्ट साधना परंपरा से जुड़ा बताया है। श्रीविद्या साधना में दिशा, कोण, पूजा-विधान, मंत्र और अनुष्ठान के अनुशासन को विशेष महत्व दिया जाता है। पारंपरिक मान्यता है कि साधना की विधि और उसके नियमों का पालन साधक की एकाग्रता तथा आध्यात्मिक अनुशासन को मजबूत करता है।सामान्यतः ऐसी साधनाओं का अभ्यास योग्य मार्गदर्शन में एकांत और निश्चित नियमों के अनुसार किया जाता है। लेकिन जब उद्देश्य केवल व्यक्तिगत साधना न होकर समाज और राष्ट्र के कल्याण की सामूहिक प्रार्थना हो, तब उसका सार्वजनिक स्वरूप भी विशेष अर्थ ग्रहण करता है।इसी भावना के साथ भोपाल में इतने बड़े स्तर पर यह आयोजन किया जा रहा है। इसके पीछे राष्ट्र की उन्नति, समाज में सुख-समृद्धि, परिवारों में मंगल और विश्व में शांति की कामना को प्रमुख उद्देश्य बताया गया है। भारतीय संस्कृति में प्रार्थना का एक व्यापक भाव ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ के रूप में व्यक्त होता है—अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोग रहें और किसी को भी दुख का सामना न करना पड़े।माँ राजराजेश्वरी के चरणों में किया जाने वाला यह सामूहिक अर्चन इसी लोकमंगल की भावना को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है।*1100 आचार्य और हजारों श्रद्धालु: परंपरा का संगम*लाल परेड ग्राउंड में होने वाले इस महाअनुष्ठान में देश के विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों से आए लगभग 1100 विद्वान आचार्यों की सहभागिता प्रस्तावित है। वाराणसी की मंत्र-साधना परंपरा, प्रयागराज की धार्मिक विरासत, वृंदावन की भक्तिधारा और उज्जैन की प्राचीन आध्यात्मिक चेतना का प्रतिनिधित्व करने वाले आचार्यों की उपस्थिति आयोजन को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करेगी।इतनी बड़ी संख्या में आचार्यों और श्रद्धालुओं का एक मंच पर एकत्र होना भारतीय धार्मिक परंपराओं की जीवंतता का प्रतीक है। यहाँ भाषा, क्षेत्र और सामाजिक पहचान से ऊपर उठकर श्रद्धा का साझा सूत्र लोगों को जोड़ता है। आयोजन समिति के अनुसार, श्रद्धालुओं को आवश्यक पूजन सामग्री निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि आर्थिक स्थिति किसी की धार्मिक सहभागिता में बाधा न बने।इस व्यवस्था का सामाजिक महत्व भी है। धार्मिक आयोजन तभी व्यापक जनभागीदारी का माध्यम बनते हैं, जब उनमें सामान्य व्यक्ति को सहजता से शामिल होने का अवसर मिले। माँ के चरणों में सभी के लिए स्थान और सभी के कल्याण की प्रार्थना ही इस सामूहिक उपासना की मूल भावना है।*हल्दी, कुंकुम, छप्पन भोग और सहस्र दीपों से सजेगा परिसर*26 अक्टूबर की शाम सात बजे से रात नौ बजे तक लाल परेड ग्राउंड में मुख्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होगा। इस दौरान माँ राजराजेश्वरी को हरिद्रा, कुंकुम, फल, सूखे मेवे, मिठाइयाँ और सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित किए जाने की योजना है। छप्पन भोग की परंपरा के साथ माँ का सहस्रार्चन किया जाएगा और सहस्र दीप प्रज्वलित किए जाएंगे।दीप भारतीय संस्कृति में केवल प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का प्रतीक भी है। जब एक साथ असंख्य दीप प्रज्वलित होते हैं, तो उनका सामूहिक प्रकाश यह संदेश देता है कि छोटी-छोटी ज्योतियाँ मिलकर अंधकार को दूर कर सकती हैं। इसी प्रकार व्यक्तिगत सद्भाव, करुणा और सेवा की भावना मिलकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन की संभावना पैदा करती है।आयोजन से जुड़े विवरणों के अनुसार, श्री रावतपुरा सरकार महाराज इससे पहले भी इस प्रकार के दो बड़े धार्मिक आयोजन कर चुके हैं। भोपाल में होने वाला यह तीसरा वृहद आयोजन उसी आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास है।*दक्षिण भारत की परंपरा, उत्तर भारत में जागरण का प्रयास*दक्षिण भारत में माँ राजराजेश्वरी और श्रीविद्या उपासना की समृद्ध परंपरा रही है। अनेक परिवारों और साधना केंद्रों में देवी की आराधना को सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक उन्नति से जोड़कर देखा जाता है। उत्तर भारत में भी इस उपासना के प्रति जनजागरण और श्रद्धालुओं को परंपरा से परिचित कराने का प्रयास किया जा रहा है।श्री रावतपुरा सरकार महाराज के मार्गदर्शन में आयोजित यह महाअनुष्ठान इसी व्यापक सांस्कृतिक संवाद का एक अवसर है। इसका उद्देश्य किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित न रहकर सर्वसमाज के कल्याण की कामना करना है। आस्था का वास्तविक सौंदर्य तब प्रकट होता है, जब वह व्यक्ति को अहंकार से दूर कर सेवा, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान की ओर प्रेरित करती है।*भक्ति का अर्थ: अपने भीतर भी जलाना एक दीप*माँ राजराजेश्वरी का कोटि हरिद्रा कुंकुमार्चन केवल एक विराट धार्मिक आयोजन के रूप में ही नहीं, बल्कि सामूहिक प्रार्थना और आध्यात्मिक चेतना के उत्सव के रूप में भी देखा जा सकता है। हजारों श्रद्धालुओं का एक साथ बैठकर देवी का स्मरण करना इस विश्वास को अभिव्यक्त करता है कि जीवन में शांति, सद्भाव और सकारात्मकता के लिए बाहरी प्रयासों के साथ आंतरिक परिवर्तन भी आवश्यक है।भक्ति का अर्थ केवल माँ के चरणों में पुष्प और कुंकुम अर्पित करना नहीं, बल्कि अपने आचरण में करुणा, वाणी में मधुरता और व्यवहार में उदारता को स्थान देना भी है। यदि देवी की आराधना मनुष्य को दुखी की सहायता करने, जरूरतमंद के प्रति संवेदनशील होने और समाज में वैमनस्य कम करने की प्रेरणा देती है, तो उसका आध्यात्मिक उद्देश्य अधिक व्यापक रूप में सार्थक होता है।शरद पूर्णिमा की पावन बेला में भोपाल का लाल परेड ग्राउंड इसी आस्था, श्रद्धा और लोककल्याण की भावना का साक्षी बनेगा। श्री रावतपुरा सरकार के सानिध्य में होने वाला माँ राजराजेश्वरी का यह महाअनुष्ठान श्रद्धालुओं के लिए अपनी धार्मिक परंपरा से जुड़ने, सामूहिक साधना का अनुभव करने और समस्त मानवता के सुख-शांति की प्रार्थना करने का अवसर होगा।माँ राजराजेश्वरी से यही मंगलकामना है कि सबके जीवन में सद्बुद्धि, समृद्धि और सद्भाव का प्रकाश फैले; समाज में प्रेम और सहयोग बढ़े तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का सनातन संदेश जन-जन के आचरण में उतर सके। यही इस महाअनुष्ठान की आध्यात्मिक सार्थकता और लोकमंगल का वास्तविक संकल्प है।
