पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ। यूपी के लखनऊ से प. बंगाल के कोलकाता की दूरी तकरीबन एक हजार किलो मीटर है। मगर राजनीति में यह दूरी मायने नहीं रखती और प. बंगाल के विधानसभा चुनाव की तपिश यूपी में महसूस की जा रही है। प. बंगाल में भाजपा की बम्पर जीत ने यूपी के विपक्षी दलों को अंदर तक हिलाकर रख दिया है। विपक्ष मायूस है तो भाजपाई बमबम हैं। यूपी में 2027 में विधानसभा चुनाव हैं पिछले दो चुनाव से यहां भाजपा की सत्ता है और सैकेंड नं0 पर समाजवादी पार्टी सत्ता हतियाने के लिए लगातार पूरी ताकत झोंके हुए है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनकी पार्टी का यूपी जीतने का सपना साकार करने के लिए राजनीति के जितने हथकंडे हो सकते हैं सब के सब परवान चढ़ रहे हैं। ऐसे में प. बंगाल में ममता बनर्जी व कांग्रेस की हार ने यहां अंदर खाने माथे पर चिंता का पसीना ला दिया है। अखिलेश यादव ने प. बंगाल में भाजपा की जीत को जबरन की जीत बताया है। नैरेटिव यह प्रचारित किया जा रहा है कि प. बंगाल में भाजपा ने सुरक्षा बलो की तैनाती करके, एसआईआर में वोट काट कर व अन्य तमाम तरीके अपनाकर सत्ता हासिल की है। खुद ममता बनर्जी सौ सीटो की लूट का आरोप लगा रही है। मगर सच्चाई तो यही है कि जितने भी वोट पड़े हैं उतने की गिनती के बाद ही रिजल्ट आया है। ऐसे में अगर भाजपा प. बंगाल हार जाती तो यूपी में सपा और कांग्रेस के हौसले बहुत ज्यादा बुलंद होते। बंगाल एक उदाहरण बन गया होता। सपा को अब यही चिंता है कि भाजपा बुलंद हौसले के साथ यूपी के चुनाव में उतरेगी और अभी जितना वक्त यूपी के चुनाव में बाकी है उतने बचे हुए टाइम में अपनी गलतियां सुधार लेगी। साथ ही जिस तरह प. बंगाल में हिन्दु बनाम मुस्लिम करके चुनाव लड़ा गया वही अगर यूपी में हुआ तो फिर भाजपा को हैट्रिक लगाने से कोई नहीं रोक सकता। अब समाजवादी पार्टी नये तरीके से चुनाव लड़ने का प्लान बनाने में जुटेगी। नाम न छापने की शर्त पर सपाईयों ने कहा कि सरकार के खिलाफ एनटी इन कमबैंसी को भूनाना अब और कठिन दिखाई पड़ने लगा है। समाजवादी पार्टी को अब प्रत्याशी चयन से लेकर चुनावी तौर तरीके भाजपा की काट कर सकने वाले बनाने होंगे।
प. बंगाल के चुनावी नतीजो से सपा के माथे पर चिंता की लकीरें
