इंफाल। मणिपुर में शांति बहाली की तमाम कोशिशों के बीच खूनी संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में हुई छह लोगों की निर्मम हत्या ने राज्य में पहले से ही सुलग रही आग में घी डालने का काम किया है। इस घटना की खबर मिलते ही जवाहरलाल नेहरू आयुर्विज्ञान संस्थान (JNIMS) के बाहर सैकड़ों लोगों जमा हो गए। तनाव बढ़ता देख सुरक्षा बलों ने लोगों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े। ये लोग उन छह नगा व्यक्तियों के शव लेने के लिए इकट्ठा हुए थे, जिन्हें 13 मई 2026 को लेइलोन वैफेई गांव से कथित तौर पर अगवा किया गया था। मणिपुर में जारी हिंसा कोई अचानक भड़की घटना नहीं है, बल्कि यह दशकों पुराने जातीय अविश्वास, भौगोलिक विभाजन और संसाधनों की लड़ाई का नतीजा है। राज्य में इस तरह की घटनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है। मई 2023 में शुरू हुआ यह दौर आज 2026 में भी जारी है। आइए जानते हैं मणिपुर में संघर्ष का इतिहास क्या है? कब कौन से आंदोलन हुआ? उनका नतीजा क्या हुआ? मणिपुर में राज्य के बीच का जो समतल हिस्सा (इंफाल घाटी) है, वह कुल क्षेत्रफल का सिर्फ दस प्रतिशत है। लेकिन यहां राज्य की करीब 60 प्रतिशत आबादी रहती है। इस आबादी में मुख्य रूप से मैतेई समुदाय के लोग हैं, जो अधिकांश हिंदू हैं। वहीं घाटी को चारों तरफ से घेरने वाले पहाड़ राज्य का 90 प्रतिशत हिस्सा हैं। यहां राज्य की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है, जिसमें कुकी और नगा जनजातिया शामिल हैं, जो मुख्य रूप से ईसाई हैं। भूगोल और आबादी का यह वर्गीकरण विवाद की मुख्य वजह है।
मणिपुर में छह हत्याएं, क्यों नहीं थम रहा मैतेई-कुकी संघर्ष; हिंसा पर संसद में क्या बोले थे शाह?
