भारत में “यह तेरी चोरी बनाम वह तेरी चोरी” ?

भारत में "यह तेरी चोरी बनाम वह तेरी चोरी'' ?

विद्यासागर त्रिपाठी
एक नेता जी को मैंने कभी मंचीय भाषण में एक कहानी सुनाते हुए सुना था ! जो कहानी कुछ यों थी कि- एक पुलिस स्टेशन में तैनात थाना प्रभारी जी की श्रीमती जी ने थाना प्रभारी अपने पति महोदय से शिकायत की कि घर में जो दूधिया प्रतिदिन दूध देता है उसकी गुणवत्ता ठीक नहीं है, शायद पानी की मात्रा मिश्रित है,थाना प्रभारी महोदय घर से अपने आफिस आये और अपनी कुर्सी पर बैठ कर अपने अधीनस्थ उप निरीक्षक को तलब किया और उनसे कहा कि मेरे घर पर जो दूधिया दूध देने आता है उसकी जांच करो और देखो कि क्या वह मेरे घर देने वाले दूध में पानी मिलाकर दूध देता है, अधीनस्थ अधिकारी ने जिम्मेदारी का निर्वाहन करने की उनकी बात स्वीकार कर ली । अगले दिन प्रातःकाल जैसे ही वह दूधिया थाना परिसर के गेट में दाखिल हुआ दूधिये की जांच में तैनात जांच अधिकारी महोदय ने कड़क आवाज लगाई अबे रूक रूक दूधिया घबराया, चकराया और बोला क्या हुआ साहब क्या कोई गलती हुई मुझसे,जांच अधिकारी ने कहा अबे तू हमारे साहब के घर में दूध में पानी मिलाकर दूध देता है,दूधिया बोला नहीं साहब आप देख लो दूध एकदम सही है,कोई पानी नहीं है, तब वो जांच अधिकारी बोले ठीक है ठीक है आज से हमारे आवास में भी आधा लीटर दूध देते रहना चाय के लिए समझे कुछ । दूधिया बोला ठीक है साहब जी समझ गया । अब अगले दिन से दूधिये ने बड़े साहब के दूध में आधा लीटर पानी और मिलाना प्रारम्भ कर दिया । क्योंकि उसे अहसास हो गया था कि जांच अधिकारी महोदय तो आधा लीटर दूध के पैसे देने वाले हैं नहीं । कुछ दिन बाद थानाध्यक्ष महोदय की श्रीमती जी ने फिर दूध में पानी होने की बात कही । तब महोदय ने आफिस आकर अपने हेड कांस्टेबल से दूधिये की जांच करने की एक और अतिरिक्त व्यवस्था कर दी,अगले दिन सुबह हेड कांस्टेबल महोदय थाना गेट में ही दूधिये का इंतजार कर रहे थे जैसे ही वो गेट के अन्दर आया वो बोले रूक रूक दूधिया घबराया चकराया डरा फिर बोला बोला क्या हुआ साहब कोई गल्ती हो गई क्या । तो जांच अधिकारी हेड कांस्टेबल महोदय बोले पहले यह बता कि बड़े साहब के घर में देने वाले दूध में तू कितना पानी मिलाकर देता है ? दूधिये ने कहा परीक्षण करा लो साहब दूध एकदम खरा है । तो जांच कर्ता हेड कांस्टेबल महोदय ने कहा ठीक है ठीक है । ज्यादा सफाई नहीं,कल से हमारे कक्ष में भी हर दिन चाय के लिए ढाई सौ ग्राम दूध भी दे दिया करना । फिर क्या था बेचारे दूधिये ने बड़े साहब के दूध में ढ़ाई सौ ग्राम पानी मिलाना और बढ़ा दिया । बड़े साहब की श्रीमती जी ने सोचा कि बार बार शिकायत और जांच अधिकारियों की निगरानी के बाद भी दूध का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है तो उन्होंने जो है उसी में संतोष करना ही उचित समझ लिया। मंचीय भाषण करता उन नेता जी ने अपनी उक्त कहानी का उपसंहार करते हुए कहा कि, वर्तमान भारत के प्रत्येक विभाग का यही हाल है । तमाम विभागीय निगरानी समितियां गठित हैं लेकिन प्रत्येक निगरानी समिति 20% 10% 05% 02% दूध में अपना अपना हिस्सा लेकर दूध में होने वाले भ्रष्टाचार से आंखें बंद कर लेते हैं । अब दूध में कितनी गुणवत्ता का प्रयोग होता है इसकी वजह जानने का प्रयास कोई निगरानी समित नहीं करती यही कारण है कि भारत में भ्रष्टाचार सुरसा के मुंह की तरह हर दिन बढ़ता ही जा रहा है । और सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार की बलि वेदी पर चढ़ कर जमीन पर आते आते दम तोड़ जाती हैं,खनन माफिया,वन माफिया से जन जीवन के लिए पर्यावरण संरक्षण करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी उसे विनष्ट होते हुए सिर्फ देखते रहते हैं । इसी तरह खाद्य सुरक्षा एवं खाद्य प्रसंस्करण व स्वस्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की आंखों के नीचे मिलावटी खाद्य पदार्थ धड़ल्ले से बाजार में बेचे जा रहे हैं नकली दबाइंया सीरप प्रतिबंधित ड्रग धड़ल्ले से बिक रहे हैं किन्तु एक आध गुडवर्क करके जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी जिम्मेदारी से मुक्ति पा लेते हैं । और यदि धोखे से ही कही इन जिम्मेदारों के घर ईडी सीबीआई के छापे पड़ जाते हैं तो फिर वहां से अकूत धन सम्पत्ति बरामद होती देखी जाती है,जिनकी ये सारी खबरों की सच्चाइयां विभिन्न समाचार पत्र व टीवी चैनल आदि प्रसारित भी करते रहते हैं,लेकिन उसे कोई नहीं देखता है । मानक विहीन बनतीं सड़के और पुल व पुलिया और उन पर दौड़ते हुए अवैध भारी ओवरलोड वाहन जो अवैध खनिज पदार्थ लादकर दिन रात अधिकारियों की नाक के नीचे से गुजरते हैं जिससे पता ही नहीं चलता कि कब नई सड़के बनती हैं और कब वो गढ्ढों में तब्दील हो जाती हैं । इस बढ़ते भ्रष्टाचार आदि के विषय पर जब विभिन्न टीवी चैनलों पर लाइव बहस होती है तो विपक्षी प्रवक्ता सत्ता पक्ष पर भ्रष्टाचार करने के आरोप लगाते हैं तो सत्ता के प्रवक्ता विगत की सरकारों के किए भ्रष्टाचारों को गिनाने लगते हैं, और वर्तमान के भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालने का काम करते हैं अर्थात वो एक दूसरे के दलों को कौन छोटा भ्रष्टाचारी है कौन बड़ा भ्रष्टाचारी है यही सिद्ध करने में पूरे समय झगड़ते रहते हैं । कोई भी प्रवक्ता देश के विकास को दीमक की तरह चाट रहे भ्रष्टाचार से मुक्त कराने की बात नहीं करता । सिर्फ मेरी पार्टी चोर है तो तेरी पार्टी मेरी पार्टी से भी बड़ी चोर है यही साबित करने पर जुटे रहते हैं । उपरोक्त कहानी वर्तमान में मुझे प्रसांगिक लगी तो अपने आपको इसे लिखने से रोक नहीं पाया,आप सबको यह कहानी कैसी लगी,इस कहानी पर आप सबके क्या विचार हैं,अवश्य ही अपने विचार कमेंट्स करके बताएं।

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