कनपुरिया कल्चर की लाइफ लाइन रहे अड्डों को कलेजे से सहेजे किताब ‘‘कनपुरिया अड्डे’’

कनपुरिया कल्चर की लाइफ लाइन रहे अड्डों को कलेजे से सहेजे किताब ‘‘कनपुरिया अड्डे’’

वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा की लिखी किताब कनपुरिया अड्डे का हुआ लोकार्पण
रियल मीडिया न्यूज नेटवर्क

कानपुर। कानपुर शहर महज एक इमारतों का समूह भर नहीं है, यह शहर अपने आप में समृद्ध कला, संस्कृति, कलाकारों, लेखकों, कवियों, साहित्यकारों, आज़ादी के सेनानियों, उद्यमियों व्यवसायियों, घुमंतुओं, एक से एक धुरंधर पत्रकारों सूफियों-संतों से सजा हुआ संग्रहालय है यहां इतिहास लिखा भी जाता है और बनाया भी जाता है। इस शहर की अपने आप में एक दुनियां है। यहां खिलंदड़ों, लोफरों, मलंगों-लफंगों, हाजिर जवाबों की मंडलियों की अड्डेबाज़ियों की पूरी श्रंखला है। यही कानपुरिया कल्चर इस शहर को ऐसी उर्जा से भरपूर रखता है जो हर वक्त जगमग होती रहती है। अब नई पीढ़ी को अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी के डीएनए से खुद का मिलान करना है तो उसे जानना पड़ेगा कि हमारे पुरखों की तासीर कैसी थी। यहीं जानने के लिए एक किताब लिखी गई। कनपुरिया अड्डे। पत्रकार महेश शर्मा ने यह पुस्तक लिखी और 31 जुलाई 2026 को जब इस पुस्तक का विमोचन हुआ तो विशुद्ध कनपुरिए एक जगह इकट्ठा हुए किताब के विषय वस्तु कानपुर की अड्डेबाज़ी पर जबर्दस्त खुलासे हुए। भूले बिसरे और समाप्त हो चुके अड्डों का भी जिक्र सामने आया। मुख्य अतिथि मनोज राजन त्रिपाठी ने कनपुरिया अंदाज़ में ही कनपुरियों से बतकहीं की। किस्सों के साथ महत्वपूर्ण बात कही कि ‘‘कानपुर में कान्फीडेंस जन्म लेता है’’।

‘‘कनपुरिया अड्डे’’ यहाँ के जनजीवन, भाषा के अनूठे रंग और शहर की ऐतिहासिक तासीर को बखूबी बयां करती है। लेखक ने यह पुस्तक अड्डा संस्कृति के अलंबरदार केजी गुरू (स्वर्गीय के.जी. तिवारी एडवोकेट) को समर्पित की है। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि अड्डों से केवल गपशप नहीं निकलती, बल्कि वहीं से विचार, साहित्य और सामाजिक सरोकार जन्म लेते हैं। यह पुस्तक कानपुर की उस लुप्त होती परंपरा को सहेजने का एक सराहनीय प्रयास है।
प्रमुख वक्ताओं के विचार
कार्यक्रम में शहर के कई अन्य गणमान्य बुद्धजीवियों ने भी पुस्तक और उसके विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। डॉ. रमेश चिंतक (पूर्व निदेशक, भारतीय विद्या भवन)ः ‘यह पुस्तक कानपुर के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।’
रामकिशोर वाजपेयी (इतिहासकार): ‘कानपुर के इतिहास में यहाँ के श्अड्डोंश् का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेखक ने शहर के इस अनदेखे पहलू को बड़े जीवंत ढंग से उभारा है।’ मनोज कपूर (संयोजक, कानपुरियम): ‘कनपुरिया बोली और यहाँ का अंदाज़-ए-बयाँ ही इस शहर की असली पहचान है, जिसे इस किताब में बखूबी पिरोया गया है।’
स्वागत एवं संचालन
कार्यक्रम की शुरुआत में कार्यक्रम संयोजक अधिवक्ता रोहित अवस्थी ने मुख्य अतिथि एवं सभी मंचासीन अतिथियों का माल्यार्पण व स्मृति चिह्न भेंट कर आत्मीय स्वागत किया। उन्होंने उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनों के प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह का कुशल एवं प्रभावशाली संचालन वरिष्ठ पत्रकार मौली सेठ ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहर के साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी और पुस्तक प्रेमी उपस्थित रहे। प्रमुख लोगों में पीयूष त्रिपाठी, अनूप वाजपेई, राजेंद्र मिश्रा बब्बू, अतहर नईम, वेद प्रकाश शुक्ल संजर, कुमार त्रिपाठी, अरविंद चतुर्वेदी, विकास दुबे, गणेश तिवारी, केके दुबे (मुन्ना लाल), संजय सचान, श्याम शुक्ला, श्रीमती प्रतिभा शर्मा, जगन्नाथ शर्मा, पंडित रामप्रकाश शुक्ला, नीरेन्द्र सिंह समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे।

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