भारतीय लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां हर मतदाता को अपनी पसंद का नेता चुनने का अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र की एक और दिलचस्प सच्चाई यह भी है कि कई बार मतदाता मतदान केंद्र तक तो पहुंच जाता है, पर उसे कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आता। ऐसे में ईवीएम मशीन के आखिर में बैठा एक शांत विकल्प उसे देखता है।

नोटा भारतीय चुनावी व्यवस्था का वह अनोखा पात्र है जो हर चुनाव में मौजूद रहता है, लेकिन कभी प्रचार नहीं करता। उसके न पोस्टर छपते हैं, न बैनर लगते हैं, न रोड शो होता है, न भाषण। वह बस ईवीएम के कोने में बैठा रहता है, जैसे कोई नाराज़ नागरिक चुपचाप व्यवस्था को देख रहा हो। दरअसल नोटा का जन्म भी लोकतंत्र में बढ़ती निराशा की कोख से हुआ। जब मतदाताओं को लगा कि चुनाव में खड़े उम्मीदवारों में से कोई भी उनके भरोसे के लायक नहीं है, तब यह विकल्प सामने आया कि मतदाता अपनी असहमति भी दर्ज करा सके। लेकिन नोटा की कहानी बड़ी विडंबनापूर्ण है। उसे वोट मिलते हैं, लेकिन जीत नहीं मिलती। मान लीजिए किसी विधानसभा क्षेत्र में सभी उम्मीदवारों से ज्यादा वोट नोटा को मिल जाएं, तब भी जीत किसी उम्मीदवार की ही मानी जाएगी। यानी लोकतंत्र के इस मैदान में नोटा वह खिलाड़ी है जिसे खेलने की अनुमति तो है, लेकिन ट्रॉफी जीतने का अधिकार नहीं। राजनीतिक दलों के लिए नोटा एक तरह का “मौन खतरा” है। यह किसी पार्टी का वोट बैंक नहीं है, लेकिन हर पार्टी के वोट काट सकता है। चुनाव परिणाम आने के बाद अक्सर विश्लेषण में कहा जाता हैकृ“अगर नोटा के इतने वोट फलां उम्मीदवार को मिल जाते तो तस्वीर बदल जाती।” यानी नोटा खुद सत्ता में नहीं आता, लेकिन सत्ता के खेल का गणित जरूर बिगाड़ देता है।
असल में नोटा भारतीय मतदाता की खामोश नाराजगी का प्रतीक है। यह वह बटन है जिसे दबाकर मतदाता कहता है, “हमें लोकतंत्र पर भरोसा है, लेकिन आपके उम्मीदवारों पर नहीं।” आज राजनीति में जातीय समीकरण, धनबल, बाहुबल और प्रचार की चमक इतनी बढ़ गई है कि कई बार योग्य और ईमानदार उम्मीदवार पीछे छूट जाते हैं। ऐसे माहौल में नोटा मतदाता के लिए एक नैतिक सहारा बन जाता है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या नोटा को सिर्फ प्रतीक बनाकर रखना ही लोकतंत्र की मजबूरी है? अगर किसी सीट पर नोटा को सबसे ज्यादा वोट मिलें तो क्या चुनाव रद्द नहीं होना चाहिए? क्या राजनीतिक दलों को नए और बेहतर उम्मीदवार उतारने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए? फिलहाल तो सच्चाई यही है कि नोटा लोकतंत्र का वह “विद्रोही बटन” है जो मतदाता को अपनी नाराजगी दर्ज कराने का मौका देता है। वह न जीतता है, न हारता हैकृबस हर चुनाव में यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में जनता की चुप्पी भी एक संदेश होती है। और शायद यही कारण है कि ईवीएम की मशीन में बैठा यह छोटा सा बटन राजनीति को हर चुनाव में आईना दिखाता रहता है। क्योंकि लोकतंत्र में कभी-कभी सबसे बड़ा बयान वही होता है जो बिना शब्दों के दिया जाता है, और नोटा वही मौन बयान है।
