विद्यासागर त्रिपाठी
रियल मीडिया (स्वतंत्र विश्लेषक)
विद्यार्थी जीवन में जब कभी फिल्म देखने जाता था। तब किसी फिल्म में कोई पंडित (ब्राम्हण) ढ़ोगी घूसखोर,दगाबाज और लालची देखता था, किसी फिल्म में ठाकुर (क्षत्रियों) को अत्याचारी मुखिया जमींदार और उसके लठैतों का आतंक परदे पर देखता था और किसी फिल्म में वैश्य (बनिया) को मिलावटखोर मख्खी चूस व किसी गरीब की गरीबी का अनैतिक नाजायज शोषण करने वाला धनी सेठ देखता था,कभी किसी लाला (श्रीवास्तव) को पटवारी(लेखपाल) मुंशी की कुर्सी पर बैठकर जमीनों को हेर फेर करते हुए देखता था। कभी कभी यह चारो किरदार पंडित,ठाकुर,बनिया और लाला किसी न किसी फिल्म में एक साथ भी दिखाई दे जाते थे और इनके अभिनयों को देखकर बड़ा आनन्द आता था। उस मनोरंजन का खूब आनन्द भी लेते थे। लेकिन कभी उन फिल्मों के किरदारों से सिक्के के दूसरे पहलू को समझने का कभी खयाल ही नहीं आया कि समाज में इसका प्रभाव क्या पड़ रहा है। उस समय यह भी कभी समझ में नहीं आया कि किस सुनियोजित विक्रत मानसिकता के साथ इन फिल्मों का निर्माण किया जा रहा हैं। इसका भारतीय समाज में क्या कुप्रभाव पड़ रहा है,ऐसी फिल्में समाज को क्या दिशा दे रही हैं। सिर्फ मनोरंजन की दृष्टि से देखा और भूल गए। लेकिन उन्हीं फिल्मों ने वर्तमान में आते आते समाज में क्या प्रभाव डाला है, आज वो सब स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ब्लैक इन व्हाइट फिल्मों से प्रारम्भ हुआ वह सिलसिला रंगीन रुपहले पर्दे तक आ गया, लेकिन फिल्मों के निर्माताओं ने अपनी पुरानी विचारधारा नहीं बदली बल्कि उसमें अश्लीलता को बढ़ावा देते हुए हिन्दूओं के देवी देवताओं को भारत में मिली अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हास्यास्पद बनाने के साथ साथ हिन्दूओं के आराध्य देवी देवताओं एवं संत महापुरुषों पर श्रद्धा रखने वाले हिन्दुओं को पोंगा पंडित,ढोंगी ढपोरशंखी पाखंडी जैसे अपमानित करने वाले शब्दों से कलंकित करने के भरपूर प्रयास किये, वर्तमान में विगत समय के फिल्म निर्माताओं व निर्माता निर्देशकों के सुनियोजित कृत्यों षड़यंत्रों का दुष्परिणाम आज देश के सामने है।
स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान में आए पंथ निरपेक्ष/धर्मनिर्पेक्ष शब्द के प्रयोग का भी अत्यन्त कुटिल मानसिकता के साथ उपयोग किया गया। सनातन धर्म संस्कृति के धर्म ग्रंथों की शिक्षा दीक्षा के गुरूकुल व संस्कृत विद्यालय हासिये पर डालकर दिये गये और दूसरी ओर ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित कान्वेंट स्कूलों एवं दीनी शिक्षा के लिए मदरसों को अत्याधिक फलने फूलने का अवसर भी प्रदान किया गया साथ ही ईश्वरवाद को सिरे से नकारने वाली उस दक्षिण पंथी कम्युनिष्ट विचारधारा को हिन्दुओं के धर्म व धार्मिक ग्रंथों को बदनाम करने का भी समुचित अवसर प्रदान किया गया। युगों सदियों पुराने ग्रंथों से शाम्बूक बध महिषासुर वध, रावण वध जैसे कई अन्य हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में वर्णित प्रशंगों को वर्तमान के आधुनिक युग कलियुग में नकारात्मकता के साथ प्रस्तुत करके समाज में विरोधाभाषी रूप में प्रचार प्रसार करके हिन्दुओं की धार्मिक आस्थाओं पर चोट पहुंचाने के लिए निरंतर कुप्रयास किये गए। माँ दुर्गा, सीता, सती सावित्री,अनुसुइया, भगनी निवेदिता, अहिल्या बाई होलकर जैसी राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाली शक्तियों को पाठ्यक्रम से बाहर रखा गया, भारत के किसी पाठ्यक्रम में स्वामी विवेकानन्द जी का विश्व एवं राष्ट्रीय ज्ञान दर्शन, पं. दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा स्थापित एकात्म मानववाद की भावना में समाहित सामाजिक समता एवं समानता को समर्पित दर्शन कभी नहीं पढ़ाया गया। पं.मदन मोहन मालवीय जी का उदर चरित्र हिन्दू विश्व विद्यालय की स्थापना के लिए उनका त्याग कभी नहीं पढ़ाया गया। आज जिन्हें सारा देश बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के नाम से जानता है आदर करता है उन्हें किस समाज ने मदद की थी,तथा उच्च शिक्षा के लिए विदेश किसने भेजा था उसको कोई नहीं जानना चाहता। डा.भीमराव अम्बेडकर जी को विदेश पढ़ने के लिए भेजने वाले थे बडौदा के महाराजा सायाजी राव गायकवाड़ तृतीय जो क्षत्री जाति के थे, कांग्रेस ने जब उन्हें षडयंत्र करके चुनाव हरवा दिया, उसके बाद डा.भीमराव अंबेडकर जी के पास दिल्ली में रहने के लिए कोई जगह नहीं थी ,तब अलीपुर रोड़ पर अपना बंगला देने के लिए सिरोही के राजा मान सिंह देवड़ा आगे आये थे उन्हें रहने का स्थान दिया वो भी क्षत्री समुदाय से ही थे। लेकिन इस सत्य बात को भी कभी सामने नहीं लाया गया। बल्कि सवर्ण वर्ग समाज को झूठा लांक्षित किया जाता है कि डा. अम्बेडकर का उत्पीड़न किया जाता था। बाबा साहेब डा.भीमराव अम्बेडकर को भारत रत्न से विभूषित कराने वाले भी राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह क्षत्री थे,जिनके प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में उन्हें राष्ट्रीय सम्मान मिला था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद वामपंथी विचारधारा के साथ कांग्रेस की नीतियों ने गोस्वामी तुलसी की समग्र समाज को साथ लेकर चलने वाली श्रीराम की विचारधारा, श्रीमद् गीता का ज्ञान दर्शन एवं सूरदास कबीर दास,जायसी जैसे अनेक सामाजिक कवियों व लेखकों को किनारे करके क्षुद्र मानसिकता के साथ निर्मित कराई गईं काल्पनिक फिल्मों और झूठे इतिहास एवं भ्रामक साहित्य के माध्यम से भारतीय हिन्दू धर्म संस्कृति के संस्कारों में ऐसे जहरीले विभाजनकारी बीज बोये हैं जिससे बच पाना अब आसान नहीं है। जिस भारत में दलित समाज के आ.रामनाथ कोविंद जी महामहिम राष्ट्रपति रह चुके हैं जहां मुस्लिम समाज से डा. अब्दुल कलाम जी महामहिम राष्ट्रपति रह चुके हैं,जहां पिछड़े वर्ग से आये आ.नरेन्द्र मोदी जी विगत 12 वर्षों से मौजूदा प्रधानमंत्री हैं,जहां पर अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिला आ.श्रीमती द्रोपदी मुर्मू जी मौजूदा महामहिम राष्ट्रपति हैं। देश भर में लगभग हर जाति वर्ग के कई पूर्व में मुख्यमंत्री रहे हैं और वर्तमान में भी हैं। लगभग हर जाति वर्ग के लोग न्याय पालिका में रहे हैं व अभी भी हैं उसी तरह प्रशासनिक अधिकारियों में भी लोग रहे हैं तथा अभी वर्तमान में मौजूद हैं फिर भी लोग स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्षों के बाद भी शोषित बंचित हैं जिनकी संख्या कम नहीं हो रही बल्कि दिनों दिन बढ़ रही है और उन्हें समता समानता में लाने के लिए एक वर्ग विशेष का दमन करना और उसकी प्रतिभाओं का गला और पैर काटने के साथ अपमानित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। हिन्दी फिल्मों के साथ कुछ पाठ्य पुस्तकों के हिन्दी साहित्य में भ्रामक विरोधाभाषी शब्दों के प्रयोग एवं धर्म ग्रंथों में वर्णित कथानकों को तोड़ मरोड़ कर कुछ ऐसा प्रस्तुत किया गया कि धीरे धीरे सामाजिक वातावरण में उसका प्रभाव पड़ने लगा और वर्तमान में आते आते भारतीय जनमानस जातीय वर्ग विभेद के ऐसे चक्रव्यूह में फस गया है कि वहां से बाहर निकलना अब सम्भव होता दिखाई नहीं देता। विविध धर्मों मत मजहब पंथों की विचारधारा में पहले से ही बटा भारत अब जातीय वर्ग आधार पर खण्ड खण्ड होता दिखाई दे रहा है? और इस विखंडन को रोकने के लिए कोई तैयार नहीं है बल्कि इसको और भी खंडित करने वाले प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। इस सबके पीछे का कारण सिर्फ यह है कि भारतीय राजनीतिक क्षेत्र के राजनीतिज्ञों की स्वार्थपूर्ति इसी जाति वर्ग विभेद के रास्ते पर चलकर ही पूर्ण होती हुई दिखाई दे रही है,जिसे विगत के कुछ वर्षाे में जातीय आधार पर क्षेत्रीय दलों की बढ़ती हुई संख्या के आधार पर देखा जा सकता है,यही कारण है कि सत्ताधारी पार्टी हो य विपक्षी पार्टियां हों संवैधानिक मान्यताओं को धता बताकर जातीय वर्ग विभाजन का ऐसा खेल,खेल रही हैं कि सामान्य वर्ग पिछड़ा वर्ग व दलित वर्ग स्पष्ट रूप से एक दूसरे का विरोधी है ऐसा दिखाई देने लगा है। किसी जाति वर्ग को विशेष दर्जा देकर विशेष बजेट विशेष सुविधाएं विशेष नियम कानून बनाकर संरक्षण देना तथा किसी जाति वर्ग को जन्मजात शोषणकर्ता एवं उत्पीड़नकर्ता मानकर इतना निरूशक्त कर दिया जाता है कि उसके हितरक्षण के लिए कहीं कोई उपाय ही शेष नहीं बचता, उस जाति वर्ग के हित हेतु न कोई एक्ट है न कोई आयोग। जिसे देख समझकर ऐसा लगता है कि उस जाति वर्ग को विशेष संरक्षण प्राप्त जाति वर्गों द्वारा अपमानित करने के लिए ही उसे निरूशक्त किया जा रहा है। ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, लाला श्रीवास्तव, अर्थात सम्पूर्ण सामान्य वर्ग अब फिल्मी पर्दों से बाहर निकलकर भारतीय जन सामान्य के बीच शोषणकर्ता उत्पीड़न कर्ता घूसखोर अवसरवादी, अत्याचारी गरीबों का खून चूसने वाला पूंजीपति आदि सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। भारत में सुनियोजित रूप से श्रृजित किये गये इस वातावरण में अब विद्यार्थी जीवन में देखी हुई फिल्मों के मनोरंजन में पीछे छिपे दुराग्रह के दूसरे पहलुओं का अब जाकर ज्ञान हो रहा है वो भी तब जब चिड़ियां चुग गई खेत। भारत का आंतरिक और बाह्य वातावरण अत्यन्त विषाक्त हो गया है। ऐसे मौजूदा वातावरण में यदि देश के सर्व प्रबुद्ध वर्ग के नागरिक आगे निकल कर बिखरते सामाजिक ताने बाने को राष्ट्रहित जन हित में दूर करने का प्रयास नहीं करते तो भारत एक बार पुनः निःसंदेह गहरे संकट में फंसने जा रहा है। जिसके लिए कोई सत्ताधारी पार्टी कोई विपक्षी पार्टी कोई वर्ग विशेष दोषी नहीं ठहराया जायेगा,बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में मताधिकार के सहभागी नागरिक होने के नाते हम सभी लोग आगामी इतिहास के काले पन्नों में दोषी ठहराये जायेंगे।
भारत के बिगड़ते सामाजिक ढांचे का प्रभाव ’’दुष्प्रभाव’’
