एलपीएस कार्डियोलॉजी कानपुर में यूपी का पहला ड्राई टिशू टेक्नोलॉजी एरोटिक वाल्व प्रत्यारोपण सफल रहा

एलपीएस कार्डियोलॉजी कानपुर में यूपी का पहला ड्राई टिशू टेक्नोलॉजी एरोटिक वाल्व प्रत्यारोपण सफल रहा

डायरेक्टर राकेश वर्मा ने टीम को दी बधाई
कानपुर। हृदय रोग संस्थान में सफल हृदय रोग संस्थान की डॉक्टरों की टीम ने रिलिस वियना की ड्राई टिशू टेक्नोलॉजी वाल्व का उपयोग करते हुए उत्तर प्रदेश में पहली बार इस अनूठे मामले को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। कानपुर नगर निवासी 70 वर्षीय रोगी राजेंद्र सिंह अति गंभीर रूप से कैल्सिफाइड बाइकस्पीड आर्टिक वाल्व स्टेनोसिस और हार्ट फेलियर से पीड़ित थे। रोगी की हार्ट की पंपिंग एरोटिक वाल्व की रुकावट के कारण घटकर 40 प्रतिशत रह गई थी, जिससे रोगी को सांस लेने में तकलीफ और सीने में दर्द जैसी गंभीर समस्याएं थीं। संस्थान के वरिष्ठ प्रोफेसर व हृदय रोग विशेषज्ञ डा० अवधेश शर्मा ने बताया कि रोगी का एरोटिक वाल्व दूरबीन विधि से पैर की नस के माध्यम से बदला गया, यह वाल्व ड्राई टिश्यू टेक्नोलॉजी पर आधारित था। ड्राई टिश्यू टेक्नोलॉजी के वाल्व की औसत उम्र 15-20 साल होती है क्यूंकि इनके, खराब होने की प्रक्रिया वेट टिश्यू टेक्नोलॉजी की तुलना में धीमी होती है। वर्तमान में इस वाल्व की कीमत 15 लाख के आसपास है। हृदय रोग संस्थान में उ०प्र० सरकार की दीनदयाल योजना के अंतर्गत इस तरह के ऑपरेशन निःशुल्क किए जाते हैं। विभागाध्यक्ष डा० उमेश्वर पांडेय ने बताया कि गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस से पीड़ित वृद्ध रोगियों, खासकर उच्च सर्जिकल जोखिम वाले मरीजों के लिए ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इम्प्लांटेशन एक वरदान साबित हो रहा है। प्रोसिजर के बाद के परिणाम बेहद शानदार रहे हैं। एओर्टा-एलवी ग्रेडिएंट में उल्लेखनीय कमी आई है और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति में तुरंत सुधार हुआ व रोगी की ठीक स्थिति में छुट्टी कर दी गयी। हृदय रोग संस्थान के निदेशक डा० राकेश वर्मा ने पूरी मेडिकल टीम को इस अभूतपूर्व सफलता के लिए हार्दिक बधाई दी है। डा० वर्मा ने बताया कि हृदय रोग संस्थान में एरोटिक रोनोसिस के रोगियों का टावी तकनीकी से सफलतापूर्वक उपचार किया जा रहा है। चिकित्सकों की टीम में डा० संतोष सिन्हा, डा० एम०एम० रजी, डा० मुकेश झा, डा० कुमार हिमांशु, डा० मोहित सचान व डा० प्रवीण शुक्ला शामिल थे।
ड्राई टिशू टेक्नोलॉजी/एओर्टिक वाल्व प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी और आधुनिक तकनीक है। पारंपरिक जैविक वाल्वों को सूखने से बचाने और सुरक्षित रखने के लिए ग्लूटेराल्डिहाइड नामक लिक्विड सॉल्यूशन में डुबोकर ‘‘गीला’’ रखा जाता है। इसके विपरीत, ड्राई टिशू टेक्नोलॉजी में विशेष एंटी-कैल्सीफिकेशन और उन्नत सुखाने की प्रक्रियाओं द्वारा वाल्व को बिना किसी तरल पदार्थ के पूरी तरह सूखा स्टोर और ट्रांसपोर्ट किया जाता है। इस तकनीक ने सर्जिकल एओर्टिक वाल्व रिप्लेसमेंट और ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व रिप्लेसमेंट दोनों प्रक्रियाओं को काफी सरल और प्रभावी बना दिया हैः ऑफ-द-शेल्फ उपयोग पारंपरिक वाल्वों को ऑपरेशन से पहले कैथेटर पर लोड करना और केमिकल साफ करने के लिए खारे पानी से कई बार धोना पड़ता है, जिसमें काफी समय जाता है। ड्राई टिशू वाल्व मैन्युफैक्चरर द्वारा पहले से ही डिलीवरी सिस्टम पर फिट और स्टेरलाइज्ड (कीटाणुरहित) आते हैं, जिससे इन्हें पैकेट खोलते ही तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है। अधिक टिकाऊपन जैविक वाल्वों के खराब होने का मुख्य कारण उन पर कैल्शियम का जमना होता है। इस ड्राई तकनीक में टिशू से मुक्त ग्लूटेराल्डिहाइड के अवशेषों को हटा दिया जाता है, जिससे कैल्शियम जमने का जोखिम बेहद कम हो जाता है और वाल्व लंबे समय तक चलता है। आसान भंडारण और परिवहनः इन वाल्वों को लिक्विड रसायनों की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इन्हें सामान्य कमरे के तापमान पर आसानी से स्टोर और दुनिया के दूरदराज इलाकों में ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है। इमरजेंसी में जीवन रक्षकः पहले से असेंबल और ड्राई होने के कारण, गंभीर रूप से बीमार या हेमोडायनामिक अस्थिरता (हार्ट फेलियर स्थिति) वाले मरीजों में आपातकालीन प्रक्रिया के दौरान यह तकनीक जीवन रक्षक साबित होती है। टिशू का चयन व फिक्सिंगः सबसे पहले गाय या सुअर के हृदय के ऊतकों को लिया जाता है और उन्हें रासायनिक स्थिरता दी जाती है। एंटी-कैल्सीफिकेशन उपचारः विशेष पेटेंट केमिकल प्रक्रियाओं द्वारा ऊतकों में से उन तत्वों को निकाला जाता है जो भविष्य में कैल्शियम को आकर्षित करते हैं। कंट्रोल डिहाइड्रेशन (सुखाना)ः टिशू के ओरिजिनल मैकेनिकल गुणों और लचीलेपन को नुकसान पहुंचाए बिना इसे एक विशेष क्लीन-रूम वातावरण में सुखाया जाता है। प्री-माउंटिंगः सूखे हुए वाल्व को फैक्ट्री में ही स्टेंट या डिलीवरी कैथेटर के ऊपर क्रिम्प (मोड़कर सेट) कर दिया जाता है और सीधे पैकेज कर दिया जाता है।

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