कानपुर देहात का दिल कहे जाने वाली इस सीट पर 432 गांवों में एक ही सवाल – जनप्रतिनिधि करता क्या है?
अकेला बृजभूषण सिंह परिहार
कानपुर देहात। नाम में देहात है, पर आंकड़ों में यह उत्तर प्रदेश के टॉप 7 जिलों में गिना जाता है। जिला क्षमता सूचकांक में इसकी रैंक 7 है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में 17 हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव इसी जिले के नाम पर आए। पर इसी जिले की धुरी, विधानसभा 206 अकबरपुर-रनिया में उतरते ही विकास की सारी फाइलें धूल खाने लगती हैं। मैं पिछले 15 दिनों से इस विधानसभा के 30 से ज्यादा गांवों में घूमा हूँ – शिवली से रनिया तक, रूरा से अकबरपुर तक। हर गांव में एक ही कहानी मिली। अकबरपुर का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) देखिए। बिल्डिंग नई है, पर अंदर 4 डॉक्टरों के पद खाली हैं। अल्ट्रासाउंड मशीन पर ताला लगा है। रनिया के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले 6 महीने से एंटी-रेबीज इंजेक्शन नहीं है। मरीज को 35 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल भेज दिया जाता है। एक बुजुर्ग महिला ने कहा, “बेटा, अस्पताल में कुत्ता काटने की दवा तक नहीं, नेता जी शादी में जरूर आ जाते हैं।” कानपुर देहात की औसत साक्षरता 76.8% बताई जाती है। पर अकबरपुर-रनिया के गांवों में महिला साक्षरता 58% पर अटक जाती है। ग्रेजुएट सिर्फ 7.2% हैं। इसका कारण स्कूलों में जाइए तो समझ आएगा। रूरा के एक प्राइमरी स्कूल में 112 बच्चों पर 1 शिक्षक है। दो शिक्षक प्रतिनियुक्ति पर अकबरपुर ब्लॉक में बाबूगिरी कर रहे हैं। 8वीं के बाद 38% बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। क्यों? क्योंकि 10वीं के बाद क्या करना है, यह बताने वाला कोई करियर कैंप, कोई सेमिनार आज तक इस विधानसभा में नहीं लगा। यह विधानसभा 91% छोटे और सीमांत किसानों की है। औसत जोत 0.78 हेक्टेयर। पिछले रबी सीजन में खाद के लिए 3 दिन तक लाइन में लगना पड़ा। एक किसान रामसनेही ने बताया, “खाद लेने अकबरपुर जाओ, तो कहते हैं रनिया जाओ, रनिया जाओ तो कहते हैं कल आओ।” फसल बिकी तो कहाँ? पूरी विधानसभा में एक भी सरकारी विपणन केंद्र (मंडी) नहीं। आलू और सरसों बेचने के लिए किसान को 45 किलोमीटर दूर चौबेपुर या कानपुर जाना पड़ता है। MSP पर खरीद का बोर्ड तो लगा है, खरीद नहीं होती। NTPC का विशाल थर्मल प्लांट अकबरपुर में है, बिजली के खंभे हर खेत तक हैं, पर किसान को सिंचाई के लिए आज भी डीजल इंजन पर 400 रुपये रोज खर्च करने पड़ते हैं। इस विधानसभा का जातीय समीकरण देखिए – ब्राह्मण 9%, ठाकुर 8%, लोधी 6%, यादव 12%, कुर्मी 8%, कुशवाहा 7%, पासी 11%, कोरी 7%, मुस्लिम 7%। कोई भी जाति 15% से ज्यादा नहीं। मतलब, यहाँ कोई भी नेता अकेले जाति के दम पर नहीं जीत सकता। फिर भी, पिछले 20 साल से यही जाति, चुनाव जीतने का हथियार बनी हुई है। मॉडल क्या है? गांव के एक-दो दबंग लोगों को पकड़ो, उनके शादी-ब्याह में जाओ, फोटो खिंचवाओ और पूरे गांव का वोट पक्का समझ लो। गांव के भोले-भाले लोगों को इतना जातिवाद के गर्त में धकेल दिया गया है कि वे अपने ही नेता की जिंदाबाद को अपना अधिकार समझने लगे हैं। एक युवा ने बहुत सटीक कहा – “हम बदलाव चाहते हैं, पर बदलाव की शुरुआत कौन करे? सब इसी कॉकस में फंसे हैं।” गांव के लोग अपने विधायक की एक चौपाल के लिए 10 साल से तरस रहे हैं। विधायक को अपने ही क्षेत्र के 10 आम लोगों के नाम नहीं पता। वह आज तक किसी आम आदमी के दरवाजे पर नहीं ठहरी। ऐसे में प्रतिनिधित्व का क्या मतलब? प्रदेश में एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, डिफेंस कॉरिडोर बन रहा है। पर अकबरपुर-रनिया में आज तक एक भी राज्य स्तरीय खेल टूर्नामेंट नहीं हुआ। एक भी बड़ा रोजगार मेला नहीं लगा। ITI में 240 सीटें हैं, फॉर्म 3000 भरते हैं। युवा बेरोजगारी 17.3% है, जो प्रदेश के औसत से 6% ज्यादा है। सवाल सीधा है – जनप्रतिनिधि का समय कहाँ जाता है? हजारों की भीड़ में किए गए वादों का क्या हुआ? यदि जनता उन वादों की डायरी बना ले, तो शायद उसे अपने रहनुमा की असलियत समझ आ जाए। तो पुनरुद्धार कैसे होगा?
विमर्श के लिए 5 सूत्रीय ब्लू प्रिंट इस विधानसभा को अब भाषण नहीं, एक मॉडल चाहिए।
- किसान सेवा मॉडल: हर ब्लॉक में एक ही छत के नीचे खाद, बीज, मिट्टी जांच और MSP पंजीकरण। रनिया में एक मिनी एग्रो-मंडी, जहाँ किसान की फसल की सीधी प्रोसेसिंग हो।
- अस्पताल-स्कूल मॉडल: विधायक महीने में 2 दिन CHC में बैठे। दवा की लिस्ट व्हाट्सएप पर सार्वजनिक हो। हर स्कूल में महीने में एक बार एक फौजी, एक अफसर, एक लोक कलाकार क्लास ले। अकबरपुर में 1000 क्षमता वाला स्किल हब।
- चौपाल मॉडल: हर शनिवार एक गांव में खुली चौपाल। कोई माला नहीं। सिर्फ 3 सवाल – क्या काम हुआ, कितना पैसा आया, क्या अटका? जनता के पास वादों की डायरी हो।
- खेल और प्रतिभा मॉडल: अकबरपुर डिग्री कॉलेज के मैदान को स्टेडियम बनाओ। हर साल “कानपुर देहात प्रीमियर लीग” कराओ। तभी यहाँ से अफसर और खिलाड़ी निकलेंगे।
- जाति से मुक्ति मॉडल: SHG की 12,000 महिलाओं को मंडी और स्कूल कैंटीन का ठेका दो। जब महिला अर्थव्यवस्था संभालेगी, तो पुरुषों का जातीय कॉकस अपने आप टूटेगा।
अंत में अकबरपुर-रनिया थकी हुई विधानसभा नहीं है, इसे थकाया गया है। बुर्जुआ और जातिवादी नेताओं ने इसे थकाया है। यहाँ की जनता को अब किसी जाति के नेता की नहीं, अपने बेटे जैसे नेता की तलाश है, जो अस्पताल में दवा की, स्कूल में पढ़ाई की और खेत में खाद की बात करे। यदि प्रबुद्ध वर्ग इस आवाज को उठाता है, तो यह सिर्फ एक लेख नहीं होगा, यह 432 गांवों के 4.20 लाख लोगों के इंतजार का अंत होगा।
