व्यंग लेख

रवीन्द्र त्रिपाठी
कभी “विश्व की सबसे बड़ी पार्टी” होने का दम भरने वाली भारतीय जनता पार्टी आजकल कुछ ज्यादा ही बेचैन दिखाई दे रही है। हालत ऐसी है जैसे मोहल्ले का वह पहलवान, जो बरसों तक सबको पटकनी देता रहा हो, और अब खुद सीढ़ी उतरते समय घुटनों में दर्द ढूंढ रहा हो।
कहते हैं सत्ता बहुत सुंदर चीज़ होती है। पहले नेता जनता को देखकर मुस्कुराते हैं, फिर कुर्सी देखकर। लेकिन जब कुर्सी बहुत दिनों तक साथ रह जाए तो आदमी को लगता है कि अब जनता तो बस बैकग्राउंड म्यूजिक है। शायद यही वह क्षण होता है जब “नज़र” लगती है।
भाजपा की हालत इन दिनों बिल्कुल उस छात्र जैसी लग रही है जिसने लगातार टॉप किया हो और अब पहली बार रिपोर्ट कार्ड में दो नंबर कम आते ही पूरा खानदान ज्योतिषी ढूंढने निकल पड़ा हो। कोई कह रहा है गठबंधन की नज़र लग गई, कोई महंगाई की, कोई बेरोजगारी की, कोई सहयोगियों की नाराज़गी की। उधर विपक्ष भी ऐसे मुस्कुरा रहा है जैसे बरसों बाद क्रिकेट मैच में पहली बार विकेट मिली हो।
सबसे दिलचस्प दृश्य टीवी चैनलों पर दिखाई देता है। कल तक जो एंकर विपक्ष को “अस्तित्वहीन” बताते थे, अब बड़ी गंभीर मुद्रा में पूछ रहे हैं — “क्या भाजपा को आत्ममंथन की जरूरत है?” यानी वही लोग जो कल तक कहते थे “सब चंगा सी”, अब पूछ रहे हैं “आख़िर गड़बड़ कहाँ हुई?”
भाजपा समर्थकों की हालत भी कम दिलचस्प नहीं। सोशल मीडिया पर पहले हर सवाल का जवाब “विकास” होता था। अब जवाब बदलकर “लेकिन पहले क्या था?” हो गया है। जनता पूछ रही है — “भैया, टमाटर इतने महंगे क्यों?” जवाब आता है — “लेकिन 70 साल…”
जनता कहती है — “रोज़गार?”
जवाब “लेकिन विपक्ष…”
यानी सवाल वर्तमान का और उत्तर इतिहास का।
उधर विपक्ष भी अचानक आत्मविश्वास से भर गया है। जो दल कल तक ईवीएम को देखकर रोते थे, अब लोकतंत्र बचाने के भाषण दे रहे हैं। राजनीति में हार से बड़ा कोई मोटिवेशनल स्पीकर नहीं होता।
भाजपा की असली परेशानी शायद विपक्ष नहीं, बल्कि अपेक्षाएँ हैं। जनता ने उसे इतना बड़ा बना दिया कि अब हर समस्या का समाधान भी उसी से चाहिए। सड़क टूटी तो सरकार जिम्मेदार, बारिश आई तो सरकार जिम्मेदार, गर्मी बढ़ी तो सरकार जिम्मेदार। अब जनता यह नहीं मानती कि “कुछ नहीं हो सकता”, क्योंकि उसे बरसों तक बताया गया कि “सब कुछ संभव है।”
यही राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य है जब विपक्ष कमजोर हो, तब सरकार को सबसे बड़ा खतरा खुद अपनी घोषणाओं से होता है।
अब पार्टी के भीतर भी बैठकें हो रही हैं। कोई कह रहा है संगठन मजबूत करो, कोई कह रहा है कार्यकर्ताओं को साधो, कोई कह रहा है जनता से संवाद बढ़ाओ। लेकिन असली समस्या शायद यह है कि जनता अब भाषण नहीं, हिसाब मांग रही है।
हालत यह हो गई है कि नेता मंच से कहते हैं — “देश बदल रहा है।”
जनता नीचे से पूछती है “लेकिन हमारा मोहल्ला कब बदलेगा?”
राजनीति में नज़र बहुत जल्दी लगती है। कभी अहंकार की, कभी अति-आत्मविश्वास की, कभी चाटुकारों की। क्योंकि सत्ता के महलों में सच बोलने वालों की एंट्री अक्सर पीछे वाले गेट से भी बंद कर दी जाती है।
फिलहाल भाजपा की राजनीति बिल्कुल उस मोबाइल फोन जैसी लग रही है जिसमें ऐप तो हजार हैं, लेकिन बैटरी तेजी से उतर रही है। चार्जर ढूंढा जा रहा है कहीं राष्ट्रवाद में, कहीं योजनाओं में, कहीं नए नारों में।अब देखना यह है कि पार्टी “नज़र उतारने” के लिए क्या करती है —
जनता के सवालों का जवाब,
या फिर एक और नया नारा।
