विधायिका के धूमिल हुए प्रोटोकॉल को फिर प्रतिष्ठित करने की मुहिम के अगुवा बने स्पीकर सतीश महाना

स्पेशल रिपोर्ट

उप्र के विधान भवन, विधानसभा को बना दिया रोल मॉडल
हर विधायक व चुने जनप्रतिनिधि के सम्मान, कर्तव्य व अधिकारों की पुनर्बहाली की मुहिम का पूरे देश में किया जा रहा अनुकरण
पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ। यूपी विधानसभा के लिए 22 अक्टूबर 1997 का दिन भी विधानसभा में हुई हिंसा के नाम दर्ज हो गया। उस वक्त कल्याण सिंह को विश्वास मत साबित करना था। इस दौरान विधानसभा में जमकर जूते चले और माइक फेंके गए। विधायकों के बीच हुई हिंसा इस कदर बढ़ी जिसमें कई विधायक घायल भी हुए थे। ये वाक्या यूपी के सामान्य लोगों के दिमाग में 2017 के पहले तक पूरी तरह स्पष्ट था और यह एक मिसाल बन गया था। कई बार विधायकों को उनके इस आचरण के लिए लोग सार्वजनिक तौर पर दोषी ठहरा देते थे। वाकई में विधायिका के लिए यह काला दिन था। और भी ऐसी घटनाएं हुई जब विधायिका शर्मसार हुई। फिर धीरे धीरे ऐसी नौबत आ गई कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि का सम्मान मिट्टी में मिलने लगा। लेकिन कोई था जिसके मन में यह कसक थी कि विधायिका का खोया सम्मान फिर बुलंदी तक पहुंचाना है और यह कसक जुनून बन गई जो अब भी जारी है। कोई नहीं यह शख्स हैं विधायक और उप्र विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना। जिन्होंने विधानभवन को ई विधानसभा बनाने समेत उसे दर्शनीय पर्यटन स्थल बना दिया। भवन और कार्यप्रणाली तो आधुनिक हो गई लेकिन उसके अंदर मौजूद विधायिका रूपी अंतरआत्मा को भी शुद्ध करने, पवित्र बनाने के लिए लगातार बूस्टर डोज दे रहे हैं। लोकतंत्र की तीन बुनियाद हैं न्याय पालिका, कार्य पालिका और विधायिका। सन 1952 से भारत में शुरू हुई निर्वाचन प्रणाली से चुने जाने वाले जनप्रतिनिधि चाहे वह सांसद हो, विधायक हो अथवा अन्य पदनाम वाले लोग। विधायिका की परिभाषा में यही सब आते हैं। मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं कि कानपुर देहात के एक विधायक कानपुर शहर में बैठने वाले जिलाधिकारी के कार्यालय पहुंचे। जिलाधिकारी को बताया गया कि विधायक जी आए हैं। जिलाधिकारी सब काम छोड़कर उठे और तेजी से बाहर आ गए। सम्मान पूर्वक विधायक जी को लेकर अपने चेंबर में पहुंचे और बगल में कुर्सी लगवाकर उन्हें बैठायां उनसे बात की। गेट तक वापस छोड़ने आए। दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया और जो कहा वह उल्लेखनीय है। वाक्य यह था कि विधायक जी आप यहां तक आने की तकलीफ न किया करें मुझे बुला लिया करें। विधायक ने कहा अरे नहीं, आप भी जनता के लिए काम कर रहे हैं और मैं भी। आपका समय भी कीमती है सेवा करने के लिए मैं चला आया। वक्त बदलता गया, सामाजिक मूल्यों में क्षरण होतो गया। मान मर्यादाएं, आदर, अपमान, पद की गरिमा सब के तौर तरीकों में बदलाव आया, कार्यपालिका व्यर्थ के अहंकार में डूबती गई और विधायिका में ऐसे लोग चुनकर आने लगे जिनकी छवि आम तौर पर ठीक नहीं थी। मगर लाखों लोगों ने उन्हें चुना यह तो सच था। ऐसे में चुने हुए लोगों को भी लगने लगा कि अब वह पावरफुल हो गए हैं। लीडर बन गए है तो वे भी अपनी सीमा रेखाएं भूल गए। अब हालत यह हो गई कि विधायिका और कार्यपालिका में इतनी ठन गई कि कोई किसी को मौका मिलने पर कमतरी का अहसास कराने में चूकता नहीं। लिहाजा माहौल एकदम गड्डमड्ड हो गया और न विधायिका का सम्मान बचा न ही कार्यपालिका का विश्वास। जब यह हालत हो गई तो यूपी विधानसभा से विधायिका के संवैधानिक अधिकार, कर्तव्य और कार्यप्रणाली को लेकर चिंतन शुरू हुआ। यह चिंतन शुरू किया 18वीं विधानसभा के विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने। सतीश महाना ने सबसे पहले छह महीने के अंदर ही सर्वप्रथम विधान भवन का हुलिया बदलना शुरू किया। भवन को शानदार बनाना, दर्शनीय बनाना प्रारम्भ किया और पूरा का पूरा नजारा बदल दिया। आधुनिक तकनीक से लैस कराया और विधान भवन को ऐसा बना दिया कि बाहर से लोग इसे देखने आने लगे। इसी बीच निर्वाचित होकर आए विधायकों के साथ इस तरह के प्रयोग किए जो पूरे देश में कहीं भी अब तक नहीं किए गए थे। जैसे कि विधायकों की विशेषज्ञता की कैटेगरी बनाई। जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, आइआइटीयन, लेखक, साहित्यकार, कवि, पीएचडी उपाधि धारक विधायकों को उनकी विशेषज्ञता की सेवा लेने के लिए माहौल बनाया। महिला विधायकों को सदन में बोलने, सवाल उठाने और क्षेत्र की समस्याओं को प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित व जागरूक किया। वरिष्ठ विधायकों को सम्मान देने और पहली बार चुने गए विधायकों को विधायिका कामकाज समझने की व्यवस्था शुरू की। दरअसल तब किसी को आइडिया नहीं था कि सतीश महाना के मन में क्या चल रहा है। बिल्डिंग को शानदार बनाना तो बात समझ में आती थी लेकिन बाकी चीजों का मकसद तब क्लीयर हुआ जब 3 मार्च 2023 को सदन में विधायक सलिल विश्नोई की पिटाई करने के मामले में एक सेवानिवृत्त आईएएस समेत पांच पुलिसकर्मियों को एक दिन के कारावास की सजा सुनाई गई। इन सभी को विशेषाधिकार हनन का दोषी पाया गया। सजा सुनाते हुए विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक उदाहरण बनेगा। इस प्रकरण में नेता विरोधी दल अखिलेश यादव समेत का कहना था कि यह परम्परा ठीक नहीं है। यहां तक कि सत्तापक्ष के एक वरिष्ठ मंत्री सूर्य प्रताप शाही तक ने एतराज जाहिर किया लेकिन विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना अपनी बात पर दृढ रहे सजा सुना कर माने। देश के लोगों को इस तरह के प्रकरण की न तो आदत थी न कभी किसी ने ऐसा होते देखा था तो विरोध के स्वर बहुत उठे लेकिन आज इस प्रकरण से यह मैसेज लिया जा रहा है कि विधायिका पावरफुल है और उसका अपना संवैधानिक दायित्व कर्तव्य है तो अधिकार भी सशक्त हैं। विधान भवन को सर्वश्रेष्ठ भवन बना देने के बाद उसके अंदर बसने वाली अंतरआत्मा को जगाने का काम बड़ा मुश्किल है लेकिन सतीश महाना विधायिका के धूल धूसरित सम्मान को पुन स्थापित करने के प्रयासों में लगातार जुटे हुए हैं। विधानसभा की जो समितियां जिनका की लोकतंत्र में बहुत महत्व है उन सभी का गठन करके लगभग सभी विधायकों को उसमें जिम्मेदारी देकर जिम्मेदारी का अहसास कराया और उसके अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे है। अब हालत यह हो गई है कि पूरे देश की विधासभाओं में न केवल हलचल है, जागरूकता है, बल्कि सतीश महाना और उप्र विधानसभा रोल माडल की तरह स्वीकार की जा रही है। उप्र विधान सभा देश की सबसे बड़ी विधानसभा है लेकिन यहां के लोग महावीर हनुमान की तरह अपना बल भूल बैठे थे जिसे का चुप साधि रहा बलवाना की भूमिका में आकर विधानसभा अध्यक्ष ने विधायिका रूपी हनुमान को उसके बल का स्मरण करा दिया है। जो कि भारत के विधायी इतिहास में मील का पत्थर, एक नजीर और स्वर्णाक्षरों से लिखित दस्तावेज बन गया है। एक बात और कि विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के ही कार्यकाल में यूपी को नया विधान भवन मिलने का कीर्तिमान बनने जा रहा है। इस संबंध में कानपुर के विधायक सुरेंद्र मैथानी का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नेतृत्व वाली 2017 से 2027 के बीच गठित विधानमंडल यूपी के इतिहास का सबसे सुनहरा काल बन गया है। विधायिका के मान सम्मान को पुन प्रतिष्ठित करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किए जा रहे सारे के सारे प्रयास लाजवाब हैं। कामकाज के लिहाज से देखें तो न्याय पालिका का अपना कार्य है। कार्य पालिका का अपना कार्य है। विधायिका का अलग कार्य है। इनमें विधायिका इसलिए उपयोगी है क्योंकि लाखों लोग वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। चाहे वह सत्तापक्ष का हो या विपक्ष का हो सब का महत्व एक स्थान पर बराबर है। सतीश महाना जी विधायकों के मान सम्मान के लिए रातदिन कार्यरत हैं। यह बहुत बड़ी बात है। न केवल यूपी के बल्कि गैर प्रांतों के भी विधायक सांसद, पार्षद, प्रधान विभिन्न संस्थाओं के सदस्य सब के सब प्रसन्न और उत्साहित है। मैथानी ने कहाकि जब जनप्रतिनिधि की मान्यता, सम्मान और प्रोटोकाल नहीं रहेगा तो यह तो उस क्षेत्र के मतदाताओं का भी अपमान माना चाहिए।


ऐतिहासिक है यूपी विधानभवन
यहां पर यह बता दें कि 1967 तक विधानसभा के 431 सदस्य थे, लेकिन अब सीधे एंग्लो-इंडियन समुदाय से 403 सदस्य और एक मनोनीत सदस्य शामिल हैं। विधान परिषद में 100 सदस्य हैं. 1928 में निर्मित, इस भवन को मूल रूप से काउंसिल हाउस कहा जाता था। यह 1937 से विधायिका का घर है, साथ ही सरकार के अन्य महत्वपूर्ण कार्यालय भी हैं। 1928 में निर्मित, इस भवन को मूल रूप से काउंसिल हाउस कहा जाता था। यह 1937 से विधायिका का घर है, साथ ही सरकार के अन्य महत्वपूर्ण कार्यालय भी हैं। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में, उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी अब इलाहाबाद थी, 1922 में राजधानी लखनऊ को स्थानांतरित करने और वहां विधानसभा भवन बनाने के लिए एक भवन का निर्माण करने का निर्णय लिया गया। 15 दिसंबर 1922 को, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल, स्पेन्सर हारकोर्ट बटलर ने विधान भवन की नींव रखी।इमारत शमूएल स्विंटन जैकब और हीरा सिंह द्वारा डिजाइन की गई थी; सिंह ने इमारत का खाका भी गिराया। बटलर ने बाद में भवन के निर्माण की निगरानी की.ख्5, की लागत से यह भवन पांच वर्षों में पूरा हुआ 21 लाख (न्ै$30,700) (1922 लागत मुद्रास्फीति के लिए समायोजित नहीं) और 21 फरवरी को उद्घाटन किया गया था 1928। विधान भवन का निर्माण 15 दिसंबर 1922 से शुरू हुआ और इसे पूरा होने में पाँच साल से अधिक का समय लगा। यह भवन नक्काशीदार हल्के भूरे रंग का बलुआ पत्थर मिर्जापुर से बना है। अंदर के कई हॉल, दीर्घाएँ और बरामदा एस आगरा और जयपुर से संगमरमर से बने हैं। प्रवेश द्वार के दोनों ओर वृत्ताकार संगमरमर की सीढ़ियाँ चलती हैं और सीढ़ियों की दीवारें चित्रों से सुशोभित हैं। इमारत का मुख्य कक्ष गुंबददार छत के साथ अष्टकोणीय है। ऊपरी सदन के लिए एक अलग कक्ष का निर्माण 1935 और 1937 के बीच किया गया था। दोनों सदनों के भवन बरामदे से जुड़े हुए हैं और दोनों ओर कार्यालय हैं।

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