
जगदीश श्रीवास्तव
राठ हमीरपु जनपद की राजनीतिक स्थिति आज भी कई सवाल खड़े करती है। कभी जिस भूमि ने बड़े नेताओं को परास्त कर इतिहास रचा था, आज वही क्षेत्र विकास की दृष्टि से उपेक्षित है। वर्षों से लंबित समस्याएं जस की तस बनी हैं और स्थानीय जनता अब हर सवाल का जवाब सिर्फ विधायक से ही चाहती है, जबकि सांसद की भूमिका पूरी तरह से चर्चा से गायब है।
इस क्षेत्र की ऐतिहासिक राजनीतिक विरासत भी कम गौरवशाली नहीं रही है। स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता को मौदहा उपचुनाव में राठ निवासी दीवान शत्रुघ्न सिंह की धर्मपत्नी रानी राजेंद्र कुमारी ने शिकस्त दी थी। मगर इसके बाद से क्षेत्र में ऐसा कोई नेतृत्व नहीं उभरा, जो यहां के बहुआयामी विकास को गति दे सके।
राठ क्षेत्र में रेलवे लाइन की मांग कई दशकों से चली आ रही है, लेकिन यह अब भी सिर्फ मांग बनकर रह गई है। यह विषय सीधे तौर पर केंद्र सरकार के अधीन आता है और वर्तमान में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सांसद अजेन्द्र सिंह की इस मुद्दे पर निष्क्रियता को लेकर जनता के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं हैं।
पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत और राजनारायण बुधौलिया ने अपने कार्यकाल में राठ क्षेत्र के लिए रेलवे लाइन के सर्वे, आरक्षण केंद्र की स्थापना जैसे ठोस प्रयास किए थे। यहां तक कि तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से अनुरोध कर राठ में कंप्यूटराइज्ड रेलवे आरक्षण केंद्र भी विषम परिस्थिति में खुलवाया गया था। यह प्रयास यह दर्शाने के लिए था कि यदि प्रस्तावित रेलवे लाइन बने तो कितनी यात्री संख्या और राजस्व संभावनाएं बन सकती हैं।
बीते दिनों जब रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने औरैया से भोगनीपुर तक नई रेल लाइन निर्माण की बात कही, तब भी महोबा से उरई होते हुए राठ को जोड़ने की योजना कहीं नजर नहीं आई। राठ को भोगनीपुर से जोड़ना भी तकनीकी रूप से संभव और लगभग 60-65 किलोमीटर की दूरी में सुलभ है, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई गंभीर पहल नहीं हुई है।
ऐसे हालात में सांसद की निष्क्रियता का बोझ विधायक मनीषा अनुरागी के सिर डाल दिया गया है। विडंबना यह है कि हर छोटी-बड़ी समस्या को लेकर जनता सीधे विधायक से सवाल करती है, और जब समाधान नहीं मिलता, तो आलोचना का पूरा केंद्र वही बन जाती हैं।
विपक्षी दलों से इतर, स्वयं उनकी पार्टी के कुछ लोग भी भीतर ही भीतर उनके खिलाफ सक्रिय दिखते हैं। संगठन के भीतर की महत्वाकांक्षाएं, स्थानीय गुटबाजी और अंदरूनी राजनीति भी विधायक को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या विधायक को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि यह विधानसभा क्षेत्र सुरक्षित सीट के अंतर्गत आता है? या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति है जिसमें सांसद को आलोचना से मुक्त रखकर सारा दबाव विधायक पर डाल दिया जाता है?
जनता को यह भी समझना होगा कि सांसद को भी उन्हीं के वोटों से चुना गया है और वे भी क्षेत्र के विकास के समान रूप से जिम्मेदार हैं। संसद में आवाज उठाने, योजनाएं स्वीकृत कराने और केंद्रीय फंड लाने की जिम्मेदारी विधायक की नहीं बल्कि सांसद की होती है।
राठ क्षेत्र की जनसमस्याएं तभी हल होंगी जब जनता दोनों जनप्रतिनिधियों से समान रूप से जवाबदेही की मांग करेगी। जब तक सांसद की निष्क्रियता पर भी उतना ही सवाल नहीं उठेगा, तब तक सारा बोझ विधायक के सिर डाल देना न केवल राजनीतिक अन्याय है, बल्कि क्षेत्रीय विकास के साथ भी अन्याय होगा।
