राठ सीएचसी : अधीक्षक की हिटलर शाही?स्टाफ की रंगबाजी?मरीजों की मुसीबत!आइए आप भी इलाज करवाने….


रियल मीडिया नेटवर्क
राठ-।स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) राठ की स्थिति में सुधार की तमाम कोशिशें अधीक्षक के मनमाने रवैये के चलते विफल होती नजर आ रही हैं। जबकि यहां पर्याप्त संख्या में योग्य चिकित्सक तैनात हैं, फिर भी अस्पताल में अव्यवस्था और मरीजों की उपेक्षा की स्थिति बनी हुई है।
वर्तमान में सीएचसी में सबसे वरिष्ठ चिकित्सक के रूप में डॉ. नेहा यादव तैनात हैं, लेकिन उनसे कनिष्ठ डॉ. अखिलेश को केंद्र का अधीक्षक बना दिया गया है। बताया जाता है कि डॉ. अखिलेश मरीजों की नियमित जांच से परहेज करते हैं, जबकि शासन के निर्देशानुसार अधीक्षक को प्रतिदिन कम से कम 40 मरीजों का उपचार करना आवश्यक होता है। इसके विपरीत, वे अधिकतर स्वास्थ केंद्र में प्रशासनिक दबाव और अनुशासनात्मक कार्रवाई की रणनीति में ही व्यस्त रहते हैं।
चिकित्सकों में डॉ. सुप्रिया पटेल (पैथोलॉजी विशेषज्ञ), डॉ. चंद्रशेखर, डॉ. माजिद अली, डॉ. कनिष्क माहुर और हाल ही में नियुक्त डॉ. राघवेंद्र प्रताप सिंह अपनी सेवाएं दे रहे हैं। डॉ. सुप्रिया विशेष रूप से पैथोलॉजी विभाग में कार्यरत हैं, वहीं अन्य चिकित्सक भी अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।
हालात इतने खराब हैं कि डॉ. सुरभि यादव जैसी योग्य दंत चिकित्सक को भी उनके सहायक नवनीत पाल के माध्यम से लगातार परेशान किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि अधीक्षक द्वारा एक तदर्थ वार्ड बॉय को अनौपचारिक रूप से पूरे अस्पताल के प्रशासनिक कार्यों का इंचार्ज बना दिया गया है। जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि महिला चिकित्सालय में प्रसव के दौरान प्रत्येक प्रसूता से ₹300 बतौर “सुविधा शुल्क” वसूला जा रहा है। यदि यह आरोप सही है, तो यह न केवल निंदनीय है बल्कि स्वास्थ्य विभाग की नीति के खिलाफ भी है।
सीएचसी में बिजली आपूर्ति बाधित होने पर जनरेटर का तत्काल उपयोग नहीं किया जाता। एक्स-रे या अन्य आपातकालीन सेवाओं के लिए मरीजों और तीमारदारों के शोरगुल के बाद ही वैकल्पिक बिजली व्यवस्था की जाती है। वहीं, स्टोर में मरीजों के लिए जरूरी सामग्री मौजूद होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं किया जाता।
स्थानीय नागरिकों और स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि अगर समय रहते जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा जांच नहीं की गई, तो यह अराजकता और गहराएगी। शासन को चाहिए कि वह अस्पताल की व्यवस्था को पारदर्शी, उत्तरदायी और मरीज-केंद्रित बनाने के लिए कड़े कदम उठाए।

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