रियल मीडिया नेटवर्क
भरुआ सुमेरपुर। सत्तावनी समर में वीरों और वीरांगनाओं की भूमिका के मद्देनजर वर्णिता संस्था के तत्वावधान में विमर्श विविधा के अन्तर्गत जिनका देश ऋणी है के तहत सत्तावनी समर की एक बेजोड़ शेरनी महारानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि पर संस्था के अध्यक्ष डा. भवानीदीन ने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि रानी लक्ष्मीबाई सही मायने में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की एक बेमिसाल वीरांगना थी। इनके योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। इनका जन्म मोरोपंत और भागीरथी बाई के घर 19 नवम्बर 1828 को बनारस में हुआ था। इनकी परवरिश बिठूर में हुई थी। इनका वास्तविक नाम मणिकर्णिका था, प्यार में इन्हें मनु और छबीली भी कहा जाता था। इनकी शादी झांसी के राजा गंगाधर राव से मात्र 14 की उम्र में 1842 में हो गयी थी। 1853 में गंगाधर राव का निधन हो गया था। इनके एकमात्र पुत्र की कम उम्र मे मौत हो गयी थी। फिर दामोदर राव को दत्तक पुत्र के रूप में गोरी सरकार ने मान्यता नहीं दी और हड़प नीति के तहत लार्ड डलहौजी ने झांसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। तब रानी ने उदघोष करते हुए कहा था कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।इसी कथन में उनके भविष्य का कार्य क्षेत्र छिपा था। अपने मात्र तीन दशक के जीवन में शौर्य, साहस, बुद्धि और रणनीति के क्षेत्र में रानी विश्व में अमर हो गयी। गोरों से विकट संघर्ष के बाद ग्वालियर के निकट कोटा के सराय में 18 जून 1858 को यह वीरगति को प्राप्त हुई। इस कार्यक्रम में अशोक अवस्थी, रमेशचंद्र गुप्ता, संतोष, प्रेम, प्रिन्स, सागर, बाबूलाल, महावीर, आशुतोष, विकास, भोलू सिंह, रामलखन, बउवा आदि शामिल रहे।

